ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

आरक्षण पर केरल हाइकोट की सलाह

Swatantra Vaartha  Sat, 16 Jan 2010, IST

आरक्षण पर केरल हाइकोट की सलाह

केरल हाइकोट ने िपछडी जाितयों को सलाह दी है िक अब वे आरक्षण कोटे का भरोसा छोडे तथा शिक्षा व नोकिरयों में खुली ितपधा का माग अपनाए। मुय यायाधीश एसआर बूरमठ तथा यायाधीश एके बशीर की खडपीठ ने कहा िक अब समय आ गया है िक जाित आधारित आरक्षण यवथा की समीक्षा की जाए, योंकि शिक्षा तथा यवसाय के क्षे में श्रेत्र करने के लिए तिपधामक वातावरण की जरत होती है। पीठ ने केरल मुलिम जमात कासिंल की एक याचिका को खारिज करते हए यह टिपणी दी।

कासिंल ने कोट में केरल सरकार के उस निणय को चुनाती दी थी, जिसके अतगत ऊची जातियों के गरीब तबके को भी नातक व परानातक (डिगी एड पोट गेजुएट) पाठयकमों में आरक्षण की सुिवधा दी गयी है। याचिकाकताआ की दलीलों को अवीकाय बताते हए जजों ने कहा कि ऊची जातियों के गरीबों को दिये गये आरक्षण से पिछडी जातियों के अधिकार किसी भी तरह भावित होने वाले नहीं ह, साथ ही यह भी टिपणी की कि भूमि सुधारों के लागू होने के बाद अगडे समझे जाने वाले समुदाय के बहत से लोग भी खिसककर पिछडों की थिति में आ गये ह। यायालय का कहना ह कि आरक्षण के कारण पिछडी जातियों की सामाजिक आथिक थिति में कातिकारी बदलाव आया है, इसलिए अब समय आ गया ह कि वे अब आरक्षण कोट पर निभर रहना छोडे आर खुली तिपधा के मायम से शक्षिक सथाआें में वेश तथा नाकरियों का अधिकार करें।

अब सवाल ह कि या सरकारें व राजनीतिक दल अदालत की इस तरह की सलाहों पर गार करेंगी। जहा तमाम सरकारें सर्वो यायालय का ५० तिशत की आरक्षण सीमा का निर्देश मानने के लिए तयार नहीं है आर उसे बढाना चाहती है, वहा वे आरक्षण को समा करने पर भला कसे तयार हो सकती ह। लेकिन केरल उ यायालय की यह सलाह निचय ही विचारणीय ह कि विभि पिछडी कही जाने वाली जातियों की आरक्षण पर निभरता समा करने पर सोच विचार को आगे बढाया जाए। सामाजिक याय तथा आथिक समानता के लिए आवयक ह कि विशेष सरकारी सुविधाए देने का आधार आथिक व शक्षिक पिछडेपन को बनाया जाए, न कि जातियों को। यदि लोकताकि यवथा को जातीय भेदभाव से मु करना हैह, तो किसी भी राजकीय सुविधा को जातियों से नहीं जोडना चाहिए। वतता ा के बाद की नइ राजनीतिक व सामाजिक यवथा भी ६० वष से अधिक आयु की हो गयी है, अब उस पर निचय ही नइ आवयकताआें के अनुसार वज्ञानिक ढग से विचार किया जाना चाहिए।

सच यह है कि जातीय आधार पर दी जाने वाली सुविधाए अब देश के वातविक पिछडों व गरीबों के माग की बाधा बन रही ह। विभि पिछडी जातियों के जो लोग सरकारी सुविधा का लाभ उठाकर आगे बढ गये ह, वे अगले वग में पहचने के बावजूद पिछडों को ा होने वाली सुविधाए हडपते जा रहे ह। इसलिए अब जातीय समानता के लिए ही सामाजिक याय के लिए भी यह आवयक िक सुविधाआं के अधिकार को आथिक तर से जोडा जाए आर जहा श्रे काशल के चयन का पन हो वहा खुली तिपधा को श्रय दिया जाए। यह सही ह कि निहित वार्थी राजनीतिक दल तथा जातीय सगठन इसे तकाल वीकार नहीं करेंगे, लेकिन कम से कम वचारिक तर पर तो ऐसी चचा की शुआत की ही जानी चाहिए।

महगाइ पर देर से चेती सरकार

के सरकार को आखिरकार महगाइ पर भी चिंता करने का समय मिल गया। बुधवार को कीमतों से सबधित ममिडलीय समिति (कबिनेट कमेटी आफ ाइसेस या सीसीपी) की बठक में बढती कीमतों, विशेषकर खानेपीने की चीजों चीनी, चावल, दाल, तेल आदि की छलाग लगाती कीमतों पर विचार किया गया आर उहें नियति करने के लिए कुछ निणय भी लिये गये। कहा गया कि ८१० दिन में इनकी कीमतें घटना शु हो जाएगी। धानमी ने तमाम जिंसों की थोक व खुदरा दरों में भारी फक पर भी चिंता य की आर जमाखोरी रोकने के लिए राय सरकारों का आहवान किया। उहोंने आवयक वतु अधिनियम के कायावयन की समीक्षा करने का भी वायदा किया। बठक में धानमी ारा मुयमयाेिं की बठक बुलाने का भी फसला किया गया। इसके लिए २७ जनवरी की तिथि निधारित की गइ। जमाखोरी व मुनाफाखोरी रोकने का यादा दायिव राय सरकारों का है, इसलिए मुयमयाेिं की बठक में धानमी उहें झकझोरना चाहते ।

बठक के बाद पकारों को उसके निणयों की जानकारी देते हए कषि मी शरद पवार ने चीनी की बढती कीमतों पर विशेष चचा की। बाजार में चीनी की उपलधता बढाने के िलए उहोंने की चीनी के सकरण नियमों में कुछ ढील देने के साथ दिसबर २०१० तक बिना किसी शुक के चीनी आयात सुविधा देने की घोषणा की। उार देश में चीनी सकट के लिए उहोंने मायावती सरकार को दोषी ठहराया आर कहा कि मिलों ारा आयातित की चीनी को राय में लाने पर लगाइ गइ रोक के कारण करीब ९ लाख टन चीनी बदरगाहों पर पडी बबाद हो रही ह। अब पवार साहब से कान कहे कि नियमों में जिस ढील की घोषणा उहोंने अब की ह, उसे सकट गहराने के पहले ही कर दिये होते, तो चीनी की महगाइ इस तर तक न पहच पाती। पुराने नियमों के अनुसार जो मिले की चीनी का आयात करती ह, उहें करो की छूट तभी ा थी, जब वे अपने ही यहा उनका सकरण (ासेसिंग) काय पूरा करें। मायावती ने किसानों के हितों को यान में रखकर इस आयातित चीनी के आगमन पर रोक लगाइ। ऐसी थिति में पवार साहब के अछे बधन का तकाजा था कि वह मिलों को यह अनुमति दे देते कि वे राय के बाहर कहीं भी उस चीनी की ‘ासेसिंग’ करा सकते ह। यही नहीं, कषि मालय का इतना सारा तामझाम इसीलिए ह कि वह समयाआें का आकलन करके उसके निराकरण की पहले से योजना बना सके, कितु वतमान सकट इस बात का माण ह कि कषि मालय का सकट पूव बधन पर कोइ यान नहीं रहता।

इस देश में कोइ आथिक सकट पदा हो या कीमतों की समया बढे, तो इसके लिए सीधे धानमी को दोषी ठहराया जाता ह, योंकि वह एक सि अथशाी ह, लेकिन देश की राजनीतिक थिति ऐसी ह कि सरकार धानमी के नियण में काम नहीं करती। सरकार के सुचा सचालन के लिए भावी राजनीतिक नियण आवयक होता ह, लेकिन गठबधन सरकार होने के कारण अपने मयाेिं पर भी उनका कोइ राजनीतिक नियण नहीं ह। कषि मी कोइ धानमी के अनुगह से मी नहीं ह, बकि सरकार के बहमत में अपने पार्टी के योगदान की श के बल पर मी ह। धानमी नाराज होकर भी उनका कुछ नहीं बिगाड सकते। खर, अब से सही, आशा की जानी चाहिए कि कीमतों का घटना शु होगा। यपि यह आशा करना यथ ह कि महगाइ का पूरा चक पीछे की ओर लाट पडेगा, कितु चीनी, दाल आर खा तेलों की कीमत में कुछ कमी की आशा अवय की जा सकती है।

आपकी राय