नक्सल बगावत ! समया ओर िनदान
भारतीय गह मंत्रालय के अनुसारि हंदुतान के तकरीबन दो सा पचास िजलों में नसल समया का कहर बरपा है । भारत के धानमी महोदय असर फरमाते ह कि नसल समया वतन की सबसे अहम आतिरक सुरक्षा यवथा समया है। सभवतया मनमोहन िसंह साहब इसे जेहादी आतकवाद से भी बडी मुसीबत करार देने में जुटे । उनसे आगे बढकर देश के गहमी साहब नसल समया का अित िवकत निपण करने में यत ह। ऐसी मनथिति में आखिरकार किस तरह से उन यवहारिक आथिक नीतियों का सजन हो सकता ह, िजसके बलबूते पर नसल समया का पूणत िनराकरण िकया जा सके ? गहमी िचदबरम ने तो नसल समया को सय ताकत के दम पर कुचल डालने का दमखम दिखाना भी ारभ कर दिया ह। तकरीबन एक लाख से अधिक सुरक्षा बलों को नसल इलाको में तनात कर दिया गया ह आर अब जिनकी मदद वायुसेना के हेलीकाटर भी करेंगे। यह एक यक्ष न ह कि दरअसल नसल समया आखिरकार इतनी भयावह कसे हो उठी है ?
सन १९९१ में मनमोहन सिंह की लोबल मार्केट नीतियों के आगाज के बाद से भारत के किसानों के हालात निरतर बिगडते ही चले गए। भारत में अभी तक तकरीबन दो लाख किसान आमहया कर चुके ह। किसान पधान देश में सबसे अधिक उपेक्षित ही रहे ह, तो केवल किसान ! विगत बीस सालों में कें में कितनी ही सरकारें बनी। भारत के करोडों किसानों का दमन आर उपीडन रोके बिना नसल समया से निजात नहीं पाया जा सकता। अभी तो दडकारणय इलाके के माा १५ करोड आदिवासी किसान ही नसल बागियों के ति कुछ सहानुभूति पूण डोलने लगा तो नसल बागियों की कूवत को आकना बहत ही कठिन हो जाएगा। अयत समपित आर बलिदानी सायवादी युवकों ने नसल नेतव का निमाण किया ह। यह ठीक ह कि उनका राता कदाचित उचित नहीं ह आर वह विगत ४२ वषा] से भयावह तार पर सदव ही अतिहिंसक रहा ह आर उसकी तीखे आलोचना भी की जानी चाहिए, किंतु इसका मतलब यह नहीं कि जिन किसानों के लिए वो हिंसा की परवी कर रहे ह, उन करोडो किसानों की तकलीफों को दूर किए बिना नसल समया से निजात पा की जा सकती ह। अयत कडे भूमि सुधारों के आभाव में आर किसानों का उनकी पदावार के लिए उचित मूयों के आभाव में नसल समया का निदान कतइ मुमकिन ही नहीं ह। कहीं गर आदिवासी किसानों का मन भी उनके पति कुछ, किंतु उनकी कारपोरेट परत सरकारी नीतियों में कतइ कोइ परिवतन नहीं आया। ऐसे हालात में नसल भावित क्षेाें का वितार न होता तो फिर आर या होता ?
तकरीबन बयालीस साल पूव सन १९६७ में बगाल के सिलीगुडी जिले के नसलवादी इलाके में पहली बार इस समया का दीदार हआ था। जबकि कयुनिट लीडर चा मजूमदार आर कानू सायाल की कयादत में वहा के बेहद गरीब कािसनों ने हथियार उठाकर हकुमत को हथियारबद चुनाती पदान की थी। नसलवादी किसान वाेिह को उस व तो वहा कुचल दिया गया था, किंतु कुछ अतराल के पचात इसकी वाेिही चिंगारियों ने आध के श्रीकाकुलम जिले में अपनी हिंसक वस का एहसास कराया। कोलकाता की गलियों आर सडकों पर नसल वािथियों आर पुलिस के बीच जबदत खूनी झडपों में आखिरकार बगाल के तकालीन मुयमी सािथ की पुलिस के हाथों जीत की बाजी रही। सकडों की तादाद में नसल नाजवान मारे गए आर हजारों की सया में गिरतार हए। बाद के दार में नसल गढों में एक ताकतवर गढ के तार पर बिहार का भोजपुर इलाका उभरा जहा कि विनोद मिश्र के नेतव में दलित किसानों ने बहत बरसों तक अपने हिंसक बगावत का परचम लहराया था। आखिरकार विनोद मिश्र आर उसके कामरेडो ने हिंसक सघष का राता परियाग करके ससदीय राजनीति का दामन थाम लिया। वतुत आध का तेलगाना क्षे नसल बगावत का सबसे ताकतवर आधार इलाका बना। जहा किसान वाेिह की पुरानी परपरा रही ह। भारतीय कयुनिटों की थम बगावत का कें भी तेलगाना इलाका रहा था, जो कि निजाम की सामती यवथा के बरखिलाफ ारभ हइ थी। नसल पीपुस वार गुप (पीडलूजी) का गठन भी तेलगाना की वाेिही धारा पर ही हआ था। जिसका अतत माओवादी कयुनिट पार्टी में विलय हो गया। पूर्वी बिहार में कहाइ चटर्जी के नेतव में माओवादी कयुनिट सेंटर( एमसीसी) की बुनियाद पढी आर एमसीसी का भी माओवादी कयुनिट पार्टी में विलय हो गया।
माओवादी कयुनिटों की हिंसक ताकत दडकारणय के आदिवासी इलाको में इस कदर बढ चुकी ह कि इसका अदाजा भी राजधानी व साा गलियारों में विराजमान होकर नहीं लगाया जा सकता। हिंदुतान के २३ रायों में २५० जिलों के तकरीबन ढाइ हजार थाना क्षेाें में नसल वाेिह वितार पा चुका ह। सिफ सन २००९ की ही बात करें, तो दो हजार से अधिक हिंसक वारदातें नसल वादियों ने अजाम दे डाली ह। आखिर इस सबका या कारण रहा ह ? बगाल की धारा पर निरतर ३२ सालों तक नसल वाेिह को जिस मासवादी कयुनिट पार्टी (सीपीएम) के नेतव ने बाकायदा काबू में रखा हआ था। वह भी अब उनके समक्ष हतभ आर असहाय सा तीत हो रहा ह। बगाल के मेहनतकश किसानों ने सीपीएम को अविरल समथन दान किया, किंतु तेजी के साथ आागिकरण की बढती चाहत ने किसानों की जमीनों के साथ जो खिलवाड सीपीएम ने ारभ किया उसका परिणाम विगत लोकसभा चुनाव में मासवादी दल ने भुगत ही लिया ह। आने वाले विधानसभा चुनाव में भी मुमकिन ह कि सीपीएम को शमनाक पराजय का सामना करना पडे। बगाल का मिदनापुर इलाका तो माओवादी नसलों का एक दुग बन ही चुका ह।
अब मनमोहन सिंह मूलत एक आथिक सामाजिक समया को कानून आर यवथा की समया करार दे रहे ह। नसल समया मूलत एक किसान समया ह आर इसे एक गभीर आथिक सामाजिक समया वीकार किया जाना चाहिए। इसका निदान केवल सरकारी राइफल की नली में खोजना यायोचित समझदारी नहीं ह। फिर तो माओवादी नसल वाेिहियों में आर एक जाताकि सरकार में अतर ही या रह जाएगा, जो कि भारत के किसानों की हर समया का निदान चालीस सालों से माओसेतुग की बदूक की नली में ढूढ रहे ह, जो ाय कहा करता था कि साा का जम बदूक की नली से होता ह।
