गुजकोक संसद की भावना के विपरीत : चिदंबरम
नई दिल्ली। गृहमंत्री पीचिदंबरम ने आज कहा कि वह गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक (गुजकोक) के लिए मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकते, क्योंकि यह संसद की वर्तमान भावना के विपरीत है और इसके प्रावधान पोटा के जैसे हैं, जिसे पहले निरस्त किया जा चुका है। उन्होंने कहा, ‘पुलिस अधिकारी के समक्ष इकबालिया बयान को मान्यता नहीं दी जा सकती।
पुलिस अधिकारी के समक्ष इकबालिया बयान को संसद की मान्यता भी नहीं है। इसी प्रकार संसद इस बात को भी मान्यता नहीं देता कि न्यायाधीश के फैसले की अपेक्षा किसी लोक अभियोजक के कार्य को अधिक महत्व दिया जाए।
’ चिदंबरम ने कहा, ‘संसद को यह स्वीकार्य नहीं है कि किसी व्यक्ति को बिना जमानत के और बिना आरोपपत्र के सीआरपीसी में प्रावधान की गयी अवधि से अधिकसमय के लिए बंद कर रखा जाए। आंतरिक सुरक्षा पर आज यहां हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक में मोदी द्वारा फिर से यह मांग किए जाने पर गृहमंत्री पीचिदंबरम ने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री गुजकोक को मंजूरी दिए जाने के लिए बारबार यह दलील दे रहे हैं कि जब महाराष्ट्र में मकोका को अनुमति दी जा चुकी है, तो गुजरात के ऐसे कानून को केंद्र अनुमति क्यों नहीं दे रहा।
चिदंबरम ने कहा कि जब मकोका को अनुमति मिली थी, उस समय देश में पोटा लागू था अत: वह उस समय की संसद की भावना के अनुरूप था, लेकिन चूंकि अब संसद पोटा को रद्द कर चुकी है, तो वैसे कानून को मंजूरी देना संसद की वर्तमान भावना के विपरीत होगा। इसलिए केंद्र राष्ट्रपति से इसपर हस्ताक्षर करने की सिफारिश नहीं कर सकता।
गृहमंत्री ने कहा कि गुजकोक में लोक अभियोजन के जज से ऊपर होने और अदालत में पेश किए बिना अभियुक्त को लंबी अवधि तक जेल में रखने के प्रावधान है। ऐसे प्रावधान पोटा में थे। ऐसे ही प्रावधानों के कारण पोटा को संसद ने निरस्त किया है, अत: संसद की वर्तमान भावना के विपरीत केंद्र अब किसी राज्य में वैसे ही प्रावधान बनाने को मंजूरी कैसे दे सकता है। गौरतलब है कि हाल ही में २८ जुलाई को गुजरात विधानसभा से चौथी बार पारित किये गये गुजकोक विधेयक पर गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति को हस्ताक्षर नहीं करने की सिफारिश की थी। इस पर मोदी ने आज की बैठक में और उसके बाद संवाददाताआें से बातचीत के दौरान सख्त नाराजगी जताई।
