इस युग को कृष्ण की जरुरत है
इस युग को कृष्ण की जरुरत है
इस युग को कण की जरत है। अहकार पक गया है। सकप पगाढ हआ है। मनुय के हाथ में बडी ऊजा है। यह ऊजा नक को ले जाएगी। यह ऊजा पवी को हिरोशिमा आर नागासाकी में बदल देगी। अगर जदी ही इस ऊजा का पातरण न हआ, अगर यह ऊजा सकप से हटकर
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कृष्ण कर्मयोगी या क्रन्तिकारी
कृष्ण कर्मयोगी या क्रन्तिकारी
मै जब कभी कण का रासलीला वाला चरि देखता है, माखन चुराने, खानेखिलाने वाला, गोपिया छेडने वाला, ढिठाइ, छिछोरापन करने वाले कण तो मन में अनायास न उठता हयों नहीं, उनका महाभारत वाला प, कूटनीतिज्ञ, वािन, राजनेता आर वाेिही याेा वाला
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श्री क्रुश्नावातर का उद्देश
श्री क्रुश्नावातर का उद्देश
सपूण पवी दुाें एव पतितों के भार से पीडित थी। उस भार को न करने के लिए भगवान विणु ने एक मुख अवतार गहण किया जो कणावतार के नाम से सपूण ससार में सि हआ। उस समय धम, यज्ञ, दया पर राक्षसों एव दानवों ारा आघात पहचाया जा रहा था।
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योगेशवर कृष्ण की ऐतिहासिकता
योगेशवर कृष्ण की ऐतिहासिकता
या गीता को हमारे देश में अधिकारिक प से राीय गथ घोषित किया जा सकता है ? हम गीता यों पढे ? या योगीराज श्रीकण का हमारी सकति में इतना महवपूण थान ह कि उनका आदश हम सबके लिए अनुकरणीय है? या वतमान समय में उनके जीवन की वााि,
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कभी योगी तो कभी छलिया
कभी योगी तो कभी छलिया
कहया, कण, पीताबर, देवकी नदन, वासुदेव,यशोदानदन, जो मर्जी कहिये पर कण सिफ कण है। सारी दुनिया के लिये एक कभी भी खम न होने वाला आकषण। ऐसा आकषण, जो हर पल हर प में पूरापूरा सुख देता ह। कण कभी कमयोगी लगते है तो कभी छलिया,
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न कल, न पल की चिंता केवल हरिचिंतन करिये
न कल, न पल की चिंता केवल हरिचिंतन करिये
चिंता चिता के समान है। चिंता तो मुर्दे को जलाती है, लेकिन चिंता जिंदा इसान को जलाती है। यह ऐसी दीमक है जो एक बार लग जाए तो य को चाटकर ही छोडती है। चिंता य की मानसिकता पर बुरा भाव डालती ह, मन की पविता समा हो जाती है, अपविता आ जाती है।
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परमात्मा तक पहुचाती है मैत्री
परमात्मा तक पहुचाती है मैत्री
भिक्षु उतर आया रथ से आर कहने लगा कि महाराज! यह रथ है? महाराज ने कहा, रथ है। भिक्षु ने कहा,घोडे छोड दिये जायें रथ से। घोडे छोड दिये गये आर वह भिक्षु कहने लगा, ये घोडे रथ है? महाराज ने कहा , नहीं, घोडे रथ नहीं है। घोडों को बिदा कर दो। चाक निकलवा
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गीता में परमात्मा प्राप्ति के सन्देश
गीता में परमात्मा प्राप्ति के सन्देश
मनुय को ऐसे चिंतन आर ऐसे विचार से अपने को दूर रखना चाहिए, जिससे उसकी अपनी आथा में भटकाव हो जाए। मनुय इस दुनिया में उस परमामा को ा करने के लिए आया है, जिसे ा कर लेने के बाद फिर कुछ ा करने की इछा नहीं रह जाती।
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परमात्मा के मार्ग का सबसे बडा अवरोधक तव है अहकार
परमात्मा के मार्ग का सबसे बडा अवरोधक तव है अहकार
बहत समय के बाद नारद फिर उसी राते से लाटे, तब उस साधु ने आतुरता से पूछा, ‘बताइये, भगवान ने मेरे लिए या कहा ?’ नारदजी ने कहा , ‘भगवान ने कहा ह कि तुहें चार जम के बाद दशन देंगे। हे! चार जम ! इतना तप करने के बाद भी चार जम आर? कितने निदयी है
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भगवान और भोग
भगवान और भोग
मनुय का सहज वाभाविक लय हपरम शाति आर आयतिक सुख की । वह चाहे इस लय को य न कर सके, पर उसका पयेक विचार आर यन होता है इसी के लिये। यह होते हए भी वह परम शाति के थान पर दाण अशाति आर आयतिक सुख के थान पर पाता हघोर दुख।
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