धर्मं-दर्शन-अध्यात्म

मानव जीवन को गढता है अत्यात्मिक वातावरण

मानव जीवन को गढता है अत्यात्मिक वातावरण आयामिक वातावरण अपने आपमें बल प्रेरक शक्ति है। इसे उतरीय ेरणाआें का ऊजाघर भी कह सकते है। यहा से हर समय श्रे ेरणाओ का वुित वाह उफनता आर उमगता रहता है। इसके सपक में आने वाले लोग इन ेरणाआें के वुितपश से अपने जीवन के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए ेरित होते है।

दर्पण बन जाता है संबंद

दर्पण बन जाता है संबंद प्रेम महवपूण है, सीखने के लिए एक अछी परिथिति , लेकिन केवल सीखने के लिए। एक पाठशाला काफी है, तीन पाठशालाए अधिक हो जाएगी। आर तीन याेिं से तुम अधिक न सीख पाओगे, तुम मुसीबत में फस जाओगे। एक के साथ रहना बेहतर है ताकि तुम समगता से उसके साथ जी सको

वेद समत वाणी का प्रबाव

वेद समत वाणी का प्रबाव वाणी की देवी वीणावादिनी मा सरवती है । कहते है कि श्रे विचारों से सप य की जुबान पर मा सरवती विराजमान रहती है। बोलने से ही सय आर असय होता ह। अछे वचन बोलने से अछा होता ह आर बुरे वचन बोलने से बुरा, ऐसा हम अपने बुजुगो से सुनते आए है।

भगवान श्रीकृष्ण का प्रकटे और आदर्श मधुर चरित्र का स्मरण

भगवान श्रीकृष्ण का प्रकटे और आदर्श मधुर चरित्र का स्मरण शरीर पर दिय पीताबर सुशोभित ह, जिसकी काति तपाये हए सुवण की सी है। आर जिसके कारण उसका श्रीविगह सादामनीयु घनघटा की दिय शोभा धारण किये है। मुखमडल झूलती हइ नील अलकावली से आवत है। शरीर से फूटती हइ रमियों ारा वह परम सुदर एव

प्रेमी समाप्त होते हैं, प्रेम नहीं

प्रेमी समाप्त होते हैं, प्रेम नहीं प्रेम रिश्ता नहीं है। प्रेम ज़ुडता तो है लेकिन संबंध नहीं बनाता। संबंध वह है जो समाप्त हो गया। संबंध संज्ञा है, पूर्ण विराम आ गया । अब कोई आनंद न रहा, कोई उत्साह नहीं रहा, सब कुछ समाप्त हो गया।

भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप और अवतार के हेतु

भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप और अवतार के हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला में इन तीनों ही प्रयोजनों को भलीभांति सम्पन्न किया। भगवान ने मधुर व्रजलीला में वात्सल्यसख्यमधुर आदि विभिन्न रसवाले प्रेमीजनों को दिव्य प्रेमरससुधा का आस्वादन कराया और किया। यहां बीचबीच में ऐश्वर्यभाव का

शीतला माता की पूजा का माहात्म्य

शीतला माता की पूजा का माहात्म्य शीतला माता का व्रत व पूजा चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी व अष्टमी को की जाती है। जहां कुछ लोग इसे सप्तमी को करते हैं वहीं कुछ अष्टमी को भी करते हैं। इस तरह यह दोनों तिथियां मुख्य मानी गयी है किंतु स्कन्द पुराण के अनुसार इस व्रत को चार महीनों में करने

सौन्दर्य की शत्रुशीतला

सौन्दर्य की शत्रुशीतला शीतला की भी जयंती मनायी जाती हैवही शीतला जिसे आम आदमी चेचक के नाम से जानता रहा है और यह सुनकर आपको ऐसा नहीं लगता कि भारतवासियों का अंधविश्वास सचमुच अपनी सीमाआें को पार कर चुका है? लेकिन किसी रोगऔर खासतौर पर एक ऐसे रोग

अपने भीतर बैठे हुए परमतमा से संबाद सथापित करो

अपने भीतर बैठे हुए परमतमा से संबाद सथापित करो श्रीमदभागवत महापुराण में भु की सता ा करने के लिए कुछ उपाय बताए गए है। वसे आप यह अवय समझ लेना कि भगवान कभी किसी पर अस नहीं होते। वे तो सदासवदा आनदवप है, कणाकर है, दयालु ह आर परमकपालु है। पर यहा की सता से तापय है उनकी

कंजूस साचचा प्रेमी नही हो सकता

कंजूस साचचा प्रेमी नही हो सकता प्रेम बडेसेबडा धन है। जिसने ेम को पा लिया, उसे धन मिल गया। वह अपनी गरीबी में भी हीरेजवाहरातों का मालिक है। लेकिन जिसने प्रेम नहीं पाया,उसके लिए फिर एक ही राता है कि वह धन इका करे, ताकि थोडासा आवासन तो मिले कि मेरे पास भी कुछ है।