आत्मदर्शन ः अपनी सच्चाई का अन्वेषण
आत्मदर्शन माने किसी काल्पनिक आत्मा का दर्शन नहीं। आत्मदर्शन माने स्वदर्शन, सत्यदर्शन। अपने बारे में जो सच्चाई है, उसका अन्वेषणअनुसंधान। यह एक ऐसी विद्या है, जिसके सहारे साधक अपने भीतर शरीर एवं मन के क्षेत्र में निरंतर बदलते ऐन्द्रीय अनुभवों को देखतेदेखते, इंद्रियों के परे, नित्य, शाश्वत ध्रुव परम सत्य को देखने के मार्ग पर प्रशस्त होने का अभ्यास करतेकरते अपने मन पर प़डे विकारों से सहज ही छुटकारा पा लेता है। विपश्यना साधना सीखने के लिए कम से कम एक दस दिवसीय शिविर में भाग लेना होता है। केंद्र पर ही सबके आवास, भोजनादि की समुचित एवं पूर्णतः निशुल्क व्यवस्था रहती है। केंद्र पर साधक सर्वथा मौन का पालन करते हुए विपश्यनाचार्य सत्यनारायण गोयनकाजी के ऑडियो वीडियो सीडी के माध्यम से, शिविर संचालक सहआचार्य के साथ इस ध्यान विधि का सक्रिय अभ्यास करते हैं।
हम जानते हैं कि एक निर्मल बालक अपने जन्म के समय पाई निर्मलता शनैःशनैः उम्र ब़ढने के साथसाथ कैसे खोता चला जाता है। हम स्वयं अपने ऊपर मैल च़ढाते हैं तो उन्हें धोने, उनसे छुटकारा पाने की जवाबदारी भी तो हमारी ही है। कुछ ऐसे ही अनुभवों से दोचार हुए साधकों के उद्गार यहां प्रस्तुत हैं।
जावरा से विपश्यना सीखने आए कैलाश मोदी कहते हैं, ‘जीवन को हर पल जीने का सही तरीका यहां ब़डे मनोयोग से अद्भुत व्यवस्थाआें के बीच सीख पाया।’ तरुण मेहता को दुर्व्यसनों से पीछा छ़ुडाना थाकहते हैं, ‘इस साधना को सीखकर मुझे मेरे उद्देश्य की प्राप्ति में ब़डी सहायता मिलेगी।’
शिक्षिका एवं व्याख्याता श्रीमती पुष्पलता ने कहा, ‘एक सर्वथा नवीन एवं पूर्णता प्राप्त साधना विधि पाकर मैं खुश हूं। व्यवस्थापकों का कार्य सराहनीय रहा।’
सिंडिकेट बैंक में कार्यरत अशोक तुकाराम अपने उद्गार कुछ ऐसे व्यक्त करते हैं, ‘विपश्यना शिविर में आकर शांति का अनुभव किया, सबके अपनाने योग्य इस ध्यान साधना का अनुभव विधि को ब़डे संतुलित तरीके से, कुशल व्यवस्थाआें के साथ सिखाया गया। हर समय सजग रहने का अभ्यास नया अनुवाद दे गया।’
श्रीमती यशोदा शर्मा भवानीपुर कॉलोनी इंदौर कहती हैं, ‘जैसे साधना के दौरान ब़ाढ सी आई और सारे मनोविकार बहा ले गई। जीवन बीमा निगम में अधिकारी विजय वर्मा इंदौर इस साधना विधि को पाकर अभिभूत हैं एवं कहते हैं , ‘अब तक केवल सुना थाअब अनुभव पर उतारा। शिविर के आरंभ में आई शारीरिक प़ीडाएँ , ३४ दिनों के बाद समाप्तप्रायः हो गईं एवं अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त हुए।’
ब़डवानी से पधारे अनिलकुमार मगनलाल सोनी कहते हैं, ‘धर्म के सही स्वरूप की जानकारी जनजन तक फैलाना चाहिएशिविर के दौरान मन में जागे विकारों का दर्शन करते हुए उनसे छुटकारे का मार्ग हाथ लगा।’फार्मास्युटिकल सलाहकार अरविंद ग़ाडे कहते हैं, ‘घुटने के दर्द की वजह से शिविर के प्रथम २३ दिन में ठीक से ध्यान नहीं कर पायापरंतु बाद में मुझे थ़ोडी सफलता मिलती गई। उत्तम अनुशासन एवं समय की पाबंदी, अनुकूल व्यवस्थाआें के चलते ध्यान में सहायता मिलीऔर अधिक लोगों को इस विषयक जानकारी मिलेयही कामना है।’ विपश्यना ध्यान पाकर सभी शिविरार्थी प्रसन्न थे। अब तक वे जान चुके थे कि मन में गांठें स्वयं हमने बांधी हैं। अतः स्वयं को ही खोलनी प़डेंगी। इस कार्य में प्रकृति खूब मदद करेगी। ऋतु खूब मदद करेगी।
