कोपेनहेगन : असफलता के बीच सफलता के सूत्रों
मौसम में बदलाव की समया के समाधान हेतु सयु रासघ ारा आयोजित करीब दो सताह का विव समेलन बिना किसी आपचारिक समझाते के समात हो गया। कोपेनहेगन (डेनमाक) ‘केबेला सेंटर’ में दुनिया के १९३ देशों के अधिकारी, मी व शासनायक्षों ने लबी माथापी की, लेिकन विकसित व िवकासशील देशों के बीच गहरे मतभेद के कारण कोइ सवमाय फसला नहीं हो सका। ७ िदसबर को शुरु हए इस समेलन मेंारभ से ही यह आशका हावी थी िक िवकिसत व विकासशील देशों के बीच यात मतभेद इस समेलन में सुलझने वाले नहीं। मेजबान देश डेनमाक के रवये ने इस आशका को आर बढा दिया था। उसने समेलन शु होने के पहले ही कुछ धनी देशों के िवदेशमयाेिं को बुलाकर उनके साथ इस समेलन में रखे जाने वाले ताव के ाप पर गुत विचारविमश किया। इससे िवकासशील देशों का चिढना वाभाविक था। लेकिन अमेिरका, भारत, चीन व फास जसे देश चाहते थे कि इस समेलन पर पूरी तरह विफलता का ठपा न लगे आर किसी न किसी तरह की आमसहमितअवय कायम की जाए।
१७१८ दिसबर को जब वहा दुनियाभर के शासनायक्षों का जमावडा था, इसकी पूरी कोशिश की गइ लेकिन कोइ बात नहीं बन सकी। अत में रासघ की ओर से फिर अपील की गइ जिस पर भारतअमेरिका आदि के शासनायक्षों ने अपनी वापसी याा टालकर फिर सिर खपाना शु किया। अत में शुकवार की रात अमेरिका, भारत, चीन, बाजील व दक्षिण अफीका के राायक्षों ने एक आम सहमति का फामूला तयार किया। यह कोइ आपचारिक समझाता नहीं मा सहमति का एक दतावेज था। लेकिन इसे भी इस समेलन की एक उपलधि माना गया, योंकि इसके बिना तो इस पूरे समेलन को एक निरथक यायाम करार दे दिया जाता।
इस समझाते या सहमति प का मुय बिंदु यह ह कि सभी देश पवी के तापकम को अधिकतम २ िडगी सेसीयस से ऊपर न बढने देने के लिए सभी वज्ञानिक तरीकों को अपनाएगे। यानी वे वेछया ऐसा कुछ करेंगे जिससे कि धरती का तापमान २ डिगी सेसीयस से अधिक न बढने पाए। धनी देश इसके लिए अगले वष से २०१२ तक तिवष पिछडे देशों को ३० अरब डालर की सहायता देंगे। यह सहायता २०२० के बाद १०० अरब डालर तिवष हो जाएगी।
समझाते के मूल ाप तापकम व की सीमा १५ िडगी सेसीयस (सेंटीगेड) रखी गइ थी, लेकिन बाद में उसे २ डिगी सेसीयस कर दिया गया। इसी तरह मूल ाप में कहा गया था कि २०५० तक दुनिया के काबनडाइ आसाइड उसजन में ८० तिशत की कटाती की जाएगी, लेकिन वीकत ाप से इसे भी हटा दिया गया था। इसमें विकासशील देशों ारा अपने यहा काबन उसजन की कटाती की वत जाच या अतराीय पु जसी कोइ बात भी शामिल नहीं की गइ ह।
इस समझाते को अगले दिन (१९ दिसबर)को होने जा रही आम सभा (लेनरी सेशन) में रखे जाने के पूव २५ देशों के तिनिधियों को दिखाया गया। भारत के धानमी डा मनमोहन सिंह तथा अमेरिकी रापति बराक ओबामा यह देखने के लिए वहा नहीं के कि आम सभा में इस समझाते को वीकति मिलती ह या नहीं। वे उपयु देशों की सहमित के बाद अपनेअपने देशों के लिए रवाना हो गये। उनका कहना था ि यह कोइ आपचारिक समझाता नहीं ह इसलिए आम सभा इसे अपनी वीकति देती ह या नहीं देती ह इससे कोइ फक नहीं पडता ।
निकचय ही इस समेलन से यादातर धनी व पिछडे दोनों देशों को निराशा हइ होगी, योंकि इसमें न वह हो सका जो धनी देश चाहते थे आर न वह हो सका जो पिछडे देश चाहते थे। १८ नवबर को ११५ देशों की करीब दिन भर की चचा में ८ नये ाप बनाये गये आर पेश किये गये तब भी जब कोइ सहमति नहीं हो सकी तो समेलन ने इसकी जिमेदारी अमेरिका के रापित बराक ओबामा आर चीन के धानमी वेन जियाबाओ पर छोड दी कि वे कोइ राजनीतिक समझाता करने का यास करें। इस गतिरोध की थिति में भारत, चीन, बाजील तथा दक्षिण अफीका के शासनायक्षों ने अलग से बातचीत करने का निचय किया। अत में उस बठक में रापति बराक ओबामा भी पहच गये आर फिर वह ढीलाढाला समझाता हो सका जिसे ओबामा ने ‘एक साथक व अभूतपूव समझाते’ की सज्ञा दी ह। यिप उहोंने स्वीकार िकया िक यह गितपयात नहीं ह फिर भी कुछ नहीं से कुछ तो बेहतर ह ही।
वातव में काबन उसजन में कटाती का यह मसला ही ऐसा ह कि इस पर कोइ कानूनन बायकारी समझाता हो पाना मुकिल ह। आाेगीकरण का रथचक पीछे लाटाया नहीं जा सकता। आगे बढना ह तो इधन का जलना घटने के बजाए आर बढना ही ह। इसलिए दुनिया के देशों के बीच केवल इतनी बात पर सहमति ह कि ‘मासम का बदलाव तेज हो रहा ह, धरती का तापमान बढ रहा ह इसलिए अब समय आ गया ह कि इसे रोकने के लिए कुछ किया जाय।’ बस सहमति का वर यहीं समात हो जाता ह। या किया जाए, कसे किया जाए यहा से असहमति शु हो जाती ह।
वातव में विकसित देश पिछले योटो समझाते (योटो ाेटोकाल) से पिंड छुडाना चाहते ह, योंकि उसमें काबन उसजन की दर कम करने की जिमेदारी धनी आाेगिक देशों पर डाली गइ ह। विकासशील देशों को उसके अतगत अपना काबन उसजन बढाने का अधिकार मिला हआ ह, योंकि यह उनका पिछडापन दूर करने के लिए आवयक ह। यदि धनी देश पिछडे देशों के अपने विकास करने के अधिकार को वीकार करते ह तो यह उनका दायिव ह कि वे अपना उसजन तर कम करें। इस योटो समझाते की सीमा २०१२ तक ह। इसलिए धनी देशों की चिंता ह कि इस सधि या समझाते की अवधि समात होने के पहले कोइ नया समझाता हो जाए जो विकसित व िवकासशील दोनों तरह के देशों लिए समान प से बायकारी हो। पिछडे देश इसके लिए कतइ तयार नहीं ।
बडीबडी बातें करने वाले धनी देशों को अब तक यह समझ में आ गया ह कि बातें करना तो आसान ह, कितु उसको कायावित करना बहत मुकिल ह। ‘योटो ाेटोकाल’ के साथ यही हआ ह। तय तो हआ था ये धनी देश अपना उसजन तर कम करेंगे कि १९९० से २००६ के बीच उनका काबन उसजन तर १४५ तिशत आर बढ गया। यहा तक कि यूरोप के पयावरणवादी देश (गीन कटीज) भी अपने शदों को कारवाइ में नहीं बदल सके। इसलिए कोपेनहेगन के इस पूरे समेलन के दारान धनी देशों की पूरी ताकत केवल इस काय में लगी रही कि किसी तरह ‘योटो ाेटोकाल’ को र कर दिया जाए जो धनी देशों के लिए काबन उसजन की बायकारी सीमा तय करता ह। वे एक ऐसा कमजोर सा वकपिक समझाता चाहते थे जिसमें अधिक जिमेदारी पिछडे देशों पर डाल दी जाए। इसके लिए उहें आथिक सहायता का लोभन देकर पटाने की भी कोशिश की गइ। धनी देशों ने इसके लिए अतराीय मीडिया का भी सहारा लिया। यूरोप आर अमेरिका के मीडिया में लगातार यह छाया रहा कि धरती को विनाश से बचाने के लिए आाेगिक देशों की एक इमानदार कोशिश को भारत आर चीन बबाद करने पर आमादा ह। मेजबान देश डेनमाक की पहल पर धनी देशों के तिनिधियों ने तावित समझाते का जो गुत ाप तयार किया गया था वह पिछले गुवार को लीक हो गया। उसकी तिया मीडिया के कइ लोगों के हाथ आ गइ। इसमें धरती के तापमान में २ डिगी व की सीमा को बढाकर ३ डिगी करने तथा सभी देशों के काबन उसजन में समान प से ३० तिशत की कटाती करने (१९९० को आधार वष मानकर) तथा कटाती की पु के लिए अतराीय जाच यवथा कायम करने का ताव था।
िपछडे देशों में तमाम छोटे देश ऐसे ह जिनकी पयावरण दूषण में यूनतम भागीदारी ह, लेकिन उससे उप होने वाली ाकतिक आपदा के वे सवाधिक शिकार ह। विकासशील देशों में चीन, भारत, बाजील, दक्षिण अफीका आदि ऐसे देश ह जो तेजी से विकास की दिशा में बढ रहे ह इसलिए उनका काबन उसजन तर बढ रहा हो, कितु ति य काबन उसजन के पमाने पर यदि देखें तो ये देश विकसित देशों से बहत पीछे ह। भारत का उसजन दर तो अमेरिका के मुकाबले बेहद कम ।
पयावरण के मामले में कठिनाइ यह ह कि दूषण फलाने का काम कोइ भी देश करे, लेकिन उसका परिणाम पूरी पवी को भोगना पडेगा। देशों की धरती अलगअलग जर ह, लेकिन उनका आसमान साझा ह। धरती के वातावरण को देशों की सीमा में नहीं बाधा जा सकता। धरती के लगातार घूमते रहने के कारण उसके वायुमडल में एक अलग ही तरह की गति होती रहती ह। अमेरिका ारा उसजित काबन पूरी दुनिया में फलता रहता ह। काबनिक गसों जसे काबनडाइ आसाइड व काबन मोनो आसाइड के कारण धरती के पयावरण का गुण वप बदलता जा रहा ह। कहीं अतिव तो कहीं अति सूखा। धुवों की बफ पिघल रही ह आर सहारा में बफ पड रही ह। लेशियरों के पिघलने से समुतल के बढने के साथसाथ तमाम नदियों के सूखने का खतरा पदा हो गया।
इससे िनचय ही धनी व गरीब देश समान प से भावित होंगे। लेकिन गरीब देश एकतरफा तार पर कुछ नहीं कर सकते। वे अपने विकासकम को तिलाजलि देकर भी पयावरण की रक्षा करना चाहें तो भी नहीं कर सकते, योंकि धनी देशों का काबन उसजन न केवल जारी ह, बकि बढता भी जा रहा ह। धरती की रक्षा की जिमेदारी निचय ही सबकी ह, लेकिन उसकी अधिक ह जो उसे सवाधिक तिक्ष पहचाने में लगा ह। आचय ह कि ये धनी देश अभी भी यह मानने के लिए तयार नहीं ह कि उनके ारा किया जा रहा अधाधुध ऊजा उपभोग ही धरती के इस सकट का मूल कारण ।
िवकासशील देश तो ‘यूनकाबन अथयवथा’ (ऐसी अथयवथा जिसमें काबन उसजन तर कम से कम हो) वीकार करने के लिए तयार ह, लेकिन इसके लिए आवयक तकनीकी व आथिक सहायता धनी देशों को ही उपलध करानी होगी। हर देश वछ ऊजा के साधनोत ात करना चाहता ह, लेकिनउसके लिए न तो उसके पास आवयक तकनीक ह आर न आथिक साधन। इसलिए कोपेनहेगन में यदि दुनिया के छोटे, गरीब या पिछडे देश अपने को ठगा हआ महसूस कर रहे हों तो इसमें उनका कोइ दोष नहीं ।
ऐसा नहीं कि धनी देशों को ‘गीन हाउस गसों’ (काबनडाइ आसाइड आदि) के भाव की जानकारी पहले नहीं थी। लेकिन उहोंने इसकी परवाह नहीं कि आर अपने विकास के लिए कति का निमम दोहन करने में लगे रहे। अपने धन व टेनोलाजी के नशे में वे समझते रहे कि अपनी रक्षा का कोइ न कोइ उपाय वे निकाल ही लेंगे। लेकिन अब उहें इसकी सीमा का भी अहसास होने लगा ह। अब वे देख रहे ह कि एशिया, अफीका व दक्षिण अमेरिका के देशों का भी आाेगीकरण हो रहा ह आर उनका भी पेटोलियम आर कोयले का उपभोग बढ रहा ह। यपि इन पिछडे देशों का कुल समिलित उसजन भी उनके अपने उसजन तर से अभी बहत कम ह, लेकिन वह निरतर बढता जा रहा ह। इसलिए वे पयावरण रक्षा के लिए अपना राता बदलने के बजाए इन विकासमान देशों के काबन उसजन पर ढन लगाना चाहते ह। कितु अब एकतरफा तार पर यह सभव नहीं ह। आज पिछडे देशों पर धनी देशों की कोइ धासपी चलने वाली नहीं ह। वे किसी समझाते को तभी वीकार करने के लिए तयार होंगे, जब वह यायपरक हो आर जिसमें उनका अपना विकास का अधिकार सुरक्षित हो। योंकि खतरा चाहे कितना भी बडा हो, लेकिन कोइ भी पिछडा देश अगडे देश की बराबरी पर आये बिना अपना आाेगिक िवकास नहीं रोक सकता।
यहा यह उलेखनीय ह कि मासम में बदलाव पर आयोजित इस अतराटीय समेलन को चाहे सफल कहा जाए या विफल, किंतु भारत ने इस समेलन में निचय ही अपनी एक अलग छाप छोडी ह। जब सारे समूह विफल हो गये, तो भारत, बाजील, चीन आर दक्षिण अफीका का सगठन (बेसिक) सामने आया आर धनी देशों के तिनिधि अमेरिका के साथ एक ढीलाढाला ही सही, लेकिन एक कारगर सादा करने में कामयाब रहा। निचय ही इससे न तो धनी देश सतुट होंगे आर न पिछडे देश, लेकिन समेलन को पूण विफलता से बचाने का इसके अलावा कोइ चारा नहीं था। भारत के धानमी डा मनमोहन सिंह ने पहले ही यह अपील की थी कि कोइ कानूनन बायकारी समझाता करने के बजाए यह सभी देशों के अपने विवेक पर छोड दिया जाए कि वे अपने यहा काबन उसजन में कितनी कटाती कर सकते ह। समेलन में कोइ समझाता करने से अधिक यह आवयक ह कि वे पयावरण को हो रही क्षति की गभीरता को समझे आर उन कारणों को दूर करने का यास करें, जिनसे धरती का तापमान बढ रहा ह आर मासम में अयाशित बदलाव आता दिखायी दे रहा ह। इस काय में सबसे बडी भूमिका धनी देशों की ह, योंकि मासम में बदलाव लाने वाले पयावरण दूषण के लिए वे ही सवाधिक दोषी ह। अब यदि वे पिछडे देशों को भी ‘यूनतम उसजन’ वाली अथयवथा पर लाना चाहते ह, तो इसके लिए उहें उन देशों की आवयक तकनीक व धन से सहायता करनी चाहिए।
समेलन समात हो गया ह, लेकिन आशा की जानी चाहिए कि धरती को बचाने की किया अब नये सिरे से शु होगी। भारत तथा अय विकासशील देश पिछले ‘योटो ाेटोकाल’ की कितनी भी दुहाइ यों न दें, लेकिन वह सच कहें तो मर चुका ह। यदि कोइ विकसित देश उसे मानने के लिए ही तयार नहीं ह, तो उसे नारे की तरह दोहराते रहने से या फायदा। अभी उसकी अवधि समात होने में करीब तीन वष का समय ह। इस बीच दुनिया के देश चाहें तो एक यायपूण ऐसा समझाता तयार कर सकते ह, जिसे विकसित व विकासशील दोनों वगा] केे देश निठा से कायावित कर सकें।
आज यह उपदेश देने का कोइ अथ नहीं ह कि लोग अपना उपभोग तर घटाए, पचिमी विकास की मगमरीचिका के पीछे न भागे तथा ाकतिक जीवन जीने की कोशिश करे, योंकि आज का मनुय इसे वीकार नहीं कर सकता। इसलिए आज की थिति में उार का राता भी नइ तकनीक के नय वज्ञानिक उपायों में ही निहित ह। हमें ऊजा के व छाेत ातिपर सवािधक यान देना चाहिए। सूरज के ताप व काश, वायु की गति, जल की धाराआें तथा समुी लहरों की ऊजा को हम अपनी जरत की ऊजा का ाेत बना सकते ह। लेकिन इससे भी पहले जरी ह कि विकसित व विकासशील देश इमानदारी से एकदूसरे की जरतों को समझकर परपर सहयोग का ऐसा माग तलाशें, जिससे बिना अपने जीवन तर से कोइ अवाछित समझाते किये जीवन तथा मनुयता के लिए अयावयक धरती के पयावरण की रक्षा की जा सके।
