कलश क्यों है मंगलसूचक?
वरुण और अग्नि को साक्षी देवता माना जाता है। वरुण का प्रतीक कुंभ है। कुंभ को देखते ही समुद्रमंथन स्मरण होता है। घट के साथ ही ज़ुडी है श्रीकृष्ण की बाल लीला और समुद्र मंथन का प्रसंग। मोहिनी देवअसुरों के बीच अमृत बांटने की कथा स्मरण हो आती है। शास्त्रों में कलश दर्शन को देवदर्शन के समकक्ष माना गया है।
कलश स्थापना के समय जिन श्लोकों का उच्चारण और जो भावना व्यक्त की जाती है उसी से स्पष्ट है कि कलश क्यों मंगलसूचक है। कलश की स्थापना और उसके पूजन के समय पुजारी शास्त्र सम्मत कुछ करते हैं। कलश मुखे विष्णुः कंठे रुद्रः समाश्रित। मूल तस्य, स्थिति ब्रह्म मध्ये मातृगणः समाश्रितः।। में श्री विष्णु विराजमान हैं।
हमारे यहां हर पूजा में सबसे पहले कलश की स्थापना करके उसकी पूजा करके देवताआें का आह्वान किया जाता है । माना जाता है कि कलश में स्वयं देवता विराजमान होते हैं और कोई भी पूजा बगैर कलश की स्थापना के अधूरी मानी जाती है चाहे फिर वह नवरात्र की देवी पूजा हो या फिर गणेशजी की स्थापना ही क्यों न हो। कलश स्थापना के लिए सर्वप्रथम तांबे का कलश यानी लोटा लिया जाता है और फिर उसे शुद्ध जल से भरकर उसके नीचे चांवल या गेहूं के दाने रखकर उस पर कलश यानी लोटा रखा जाता है। फिर इस कलश में पान के पत्ते और बगैर छीला हुआ नारियल रखकर इसे स्थापित किया जाता है और फिर इसकी पूजा करके इस पर फूल वह नैवेद्य च़ढाया जाता है। इस पूजा में देवताआें का आह्वान किया जाता है और उसके बाद ही देवी की पूजा या जिस किसी देवता की पूजा हो वह शुरू की जाती है। इस तरह किसी भी पूजा में सर्वप्रथम कलश स्थापना आवश्यक है क्योंकि इसे मंगलसूचक भी माना जाता है।
