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संभव है परिवर्तन

Swatantra Vaartha  Mon, 22 Feb 2010, IST

संभव है परिवर्तन

हम व्यवहार की चर्चा करें, उससे पहले यह समझने का प्रयत्न करें कि व्यवहार का संचालन कौन कर रहा है? हम बैल को, घ़ोडे को या कार को पहले न पक़डें, पहले देखें कि ड्राइवर कौन है? सारथी कौन है? चलाने वाला कौन है? हमारे व्यवहार का संचालन कौन करता है? उसे समझे बिना व्यवहार को समझ नहीं सकते हैं और उसे बदले बिना व्यवहार को बदल भी नहीं सकते। व्यवहार तो सामने आता है, पर भीतर कौन बैठा है? उसे देखें तो फिर समस्या का समाधान हो सकता है। इस क्षेत्र में एक सोंठ का गांठिया लेकर भी पंसारी बना जा सकता है। यदि हम भावशुद्धि का अभ्यास करें, तो हमारा सारा व्यवहार बदल सकता है। मुख्य है भावशुद्धि का अभ्यास। हमारा भाव परिष्कृत है, निर्मल है, तो व्यवहार अपने आप अच्छा होगा।

यदि सत्यनिष्ठा है, सत्य के प्रति समर्पण है, तो व्यवहार प्रमाणिक होगा। जिस व्यक्ति में सत्यनिष्ठा नहीं है और हम उपदेश दें, उसे समझाने का प्रयत्न करें कि व्यवहार प्रामाणिक होना चाहिए, अप्रामाणिक व्यवहार अच्छा नहीं है, तो वह सुन लेगा। कहने वाला कहेगा, सुनने वाला सुन लेगा, पर होगा वही, जो चल रहा है। यह सबसे ब़डी समस्या है कि जो दिखाई देता है, सामने आता है, उसे पक़डने का प्रयत्न करते हैं, उसकी आधारभूमि को नहीं पक़डते।

हमारेे पुराने साधुसाध्वियां, जो मित्र दिखाकर जनता को संबोध देते थे, उसमें यह था कि एक व्यक्ति को दुःख दिया जा रहा है, वह नारकीय दुःख भोग रहा है और उससे कहा जाता कि ‘‘जिणरा ढांढा मारिया, तिण रा फल तू देख’’ तूने पशुआें को मारा था, अब उसका फल तुझे मिल रहा है। पशुआें को कैसे मारा? प़डोसी से अनबन हो गई। एक प़डोसी शक्तिशाली है, दूसरा कमजोर। जो कमजोर है, वह बदला ले नहीं सकता, क्योंकि सामने वाला शक्तिशाली है। वह प्रतिकार या प्रतिशोध की बात सोच नहीं सकता, तो फिर वह क्या करेगा? उसकी जो गायें, भैंसें, बकरियां हैं, मौका मिलने पर वह उनकी पिटाई करता है। किसी ने पूछा कि इन्हें क्यों मार रहा है? वह कहेगा कि इसके मालिक ने मुझे मारा था। मालिक ने तुझे सताया तो उसको पीटो, उसकी गाय को क्यों पीट रहे हो? पीट इसलिए रहा है कि वह तो समर्थ है, उससे प्रतिकार कर नहीं सकता, इसलिए उसके पशुआ से बदला ले रहा है।

हमारे व्यवहार में ऐसा ही होता है। कोई अप्रमाणिक व्यवहार करता है, तो कहा जाता है कि यह कैसा आदमी है जो अप्रमाणिक व्यवहार कर रहा है, इसमें विनम्रता नहीं है, उद्‌दंड व्यवहार कर रहा है, उच्छृंखल व्यवहार कर रहा है। हमारे सामने आता है, तो हम उसे बुरा भी मान लेते हैं, किन्तु इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि वास्तव में समस्या का समाधान करना है, तो प्रामाणिक व्यवहार, विनम्र व्यवहार होना चाहिए। इस उपदेश की भाषा के पीछे हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि उस व्यक्ति के अहंकार का विलय कैसे हो? वैसा प्रयोग करें। यदि अहंकार का विलय होगा तो व्यवहार अपने आप बदल जाएगा। उसमें सत्यनिष्ठा पैदा करने का प्रयत्न करें। यदि सत्यनिष्ठा है, ऋजुता है, तो उसका व्यवहार अपने आप प्रामाणिक बन जाएगा।

ब़डी कठिनाई है कि जिसे बदलना चाहते हैं, वहां तक हम पहुंचते नहीं और पहुंचते वहां हैं, जहां बदलता नहीं है। इस समस्या का समाधान करना है, हल खोजना है। योग की भाषा में इसका समाधान है अनुप्रेक्षा। जिस व्यक्ति को हम बदलना चाहते हैं, उसके भीतर तक बात नहीं जाएगी, तब तक परिवर्तन नहीं होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया है कि बात भीतर तक जाए। अनुप्रेक्षा के द्वारा किसी की आदत को बदलने का हम प्रयत्न करते हैं तो एक शब्दावली का निर्माण करते हैं और उस शब्दावली को एकदो बार नहीं सौ बार दोहराते हैं, बारबार दोहराते हैं, उसके साथ भावना का प्रयोग करते हैं, संकल्प करते हैं, अपने आपको सुझाव देते हैं। यह सुझाव की प्रक्रिया, पुनरावृत्ति की प्रक्रिया बारबार दोहराने की प्रक्रिया चलती रहती है, फिर वह बात भीतर तक चली जाती है और व्यक्ति बदल जाता है। पानी की एक बूंद या एक धार से आंगन गीला नहीं होता। बूंद गिरतेगिरते एक क्षण ऐसा आता है कि आंगन गीला हो जाता है।

पके घ़डे को अभी आवां से निकाला। आवें से निकालते समय वह अत्यधिक गरम था। उस पर पानी की एक बूंद डालें तो क्षण मात्र में वह गायब हो जाती है। दूसरी बूंद डाली, तीसरी बूंद डाली और यह सोच लें कि घ़डा तो गीला होता नहीं, तो घ़डा सचमुच कभी गीला नहीं होगा। उस पर निरतंर पानी की बूंदें डालते जाएं तो एक क्षण ऐसा आएगा, जब हम देखेंगे कि घ़डा गीला हो गया। क्या यह मान लें कि पानी की अंतिम बूंद से घ़डा गीला हुआ? नहीं, ऐसा मानने पर बहुत ब़डी भ्रांति होगी। घ़डे को गीला करने में पहली बूंद का भी बहुत ब़डा योगदान रहा है। पहली बूंद ने उसे गीला करना शुरू किया और अंतिम बूंद में घ़डा गीला हो गया।

व्यवहार बदले, ऐसी प्रक्रिया को हम कहां अपनाते हैं? प्रयत्न को असफल मान लेते हैं। एकदो बार सीख दी और मान लेते हैं कि यद तो बदलने से रहा, क्या फायदा असफल प्रयत्न करने से? धैर्य तो बदलने वाले में होना चाहिए। निरंतर बूंदें गिरती रहे, प्रयत्न लगातार होता रहे तो निश्चित ही एक क्षण ऐसा आता है कि व्यक्ति बदल जाता है।

इसी बात को हम मानसशास्त्र, शरीरशास्त्र या मस्तिष्क विद्या की दृष्टि से समझने का प्रयत्न करें, तो निष्कर्ष यह होगा कि उपदेश देने वाला उपदेश देता है, सुनने वाला सुनता है, वह बात उसके मस्तिष्क तक चली जाती है। एक इम्प्रेशन, एक हल्कासा आघात उस पर होता है, किन्तु थ़ोडी देर बाद वह बात विस्मृत हो जाती है। स्मरण कब रहेगा? विज्ञान की भाषा में जब काेेई बात हम करते हैं और वह केवल कॉंशियस माइंड तक ही रहती है, तो उसका प्रभाव स्थायी नहीं होता। इसीलिए उपदेश का, सीख का प्रभाव स्थायी नहीं होता। इस सच्चाई को हम मान कर चलें। इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि मैंने सीख दी और उसने मान ली। अगर ऐसा मानते हैं, तो यह हमारी भ्रांति है। वही बात जब बहुत गहरे में चली जाती है, अनकॉंशियस माइंड तक जाती है, मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो अचेतन या अवचेतन मस्तिष्क तक चली जाती है तब आदमी बदलता है, परिवर्तन आता है। परिवर्तन के सारे तत्त्व अंतःकरण में हैं, बाहर में नहीं हैं। बाहर में तो केवल उपचार होता है। अनुप्रेक्षा ध्यान का एक प्रयोग है। जब हम अनुप्रेक्षा के स्तर तक पुनरावृत्ति करते हैं, बारबार अभ्यास करते हैं, बारबार दोहराते हैं, तो धीरेधीरे एक क्षण ऐसा आता है, जब वह बाहर की बात भीतर तक चली जाती है और जो बदलने का स्थान है, वहां तक पहुंचती है और परिवर्तन शुरू हो जाता है।

इसलिए जो लोग चाहते हैं कि बदलाव हो, उन्हें भी गहराई से चिंतन करना है, जो चाहता है कि बदलूं, उसे भी गहराई तक ले जाना जरूरी है। पांचपांच हाथ के कुएं खोदने से पानी कभी नहीं निकलेगा। कुआं खोदने का आदेश था। पचास हाथ खोदने पर पानी निकलेगा, यह बात निश्चित थी। कुआं खोदने वालों ने पांचपांच हाथ की गहराई तक दस कुएं खोद डाले, पानी का नामोनिशान नहीं। अधिकारी के पास गए। उसने पूछा‘‘कुआं खोद डाला?’’ ‘‘हां, खोद डाला।’’ ‘‘पानी निकला?’’ ‘‘ एक बूंद भी नहीं निकला।’’

अधिकारी ने जाकर देखाएक नहीं दस कुएं खोदे गए हैं। मजदूरों की नासमझी उसकी समझ में आ गई। पांचपांच हाथ के दस नहीं दस हजार कुएं भी खोद डालो, पानी नहीं निकलेगा। वही ऊर्जा एक ही कुआं खोदने में लगाई होती, पचास हाथ गहरा एक ही कुआं खोदा होता तो पानी निकल आता।

हम इस बात पर विचार करें कि जिस गहराई में जाने पर परिवर्तन होता है वहां तक हम नहीं पहुंचे तो हमारा व्यवहार कैसे बदलेगा? कभी नहीं बदलेगा। इसलिए जो परिवर्तन चाहता है, उसे भी गहराई में जाना होगा और परिवर्तन लाना चाहते हैं, उन्हें भी गहराई में जाना होगा। केवल सतही चिंतन से काम नहीं होगा।

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