हर बच्चे को बौद्धिक प्रशिक्षण से गुजरना जरूरी है
किसी ने ओशो से पूछा कि आत्मज्ञान की यात्रा में बुद्धि जब इतना ब़डा अवरोध ख़डा करती है, तो क्या बुद्धि को प्रशिक्षित करना और निखारना व्यर्थ ही नहीं है? क्या ऐसा संभव नहीं है कि बच्चों की सरलता अबाधित रखने के लिए उनको बुद्धि का प्रशिक्षण दिए बिना,सीधा ही ध्यान में उतारा जाए?
जवाब में ओशो ने कहा कि, विचारणीय है, महत्वपूर्ण भी। और प्रश्न सहज ही उठता है कि अगर बुद्धि इतना ब़डा अवरोध है, तो बुद्धि को प्रशिक्षित ही क्यों किया जाए? बच्चों को हम उसकी सरलता और भोलेपन में ही ध्यान क्यों न दे दें, बजाय विश्वविद्यालय भेजने के। उनका तर्क, उनका विचार नियोजित करने की बजाय, शिक्षित करने की बजाय, हम सीधा ही उन्हें ध्यान की सरलता और निर्दोषता में क्यों न डुबा दें? बुद्धि अगर बाधा है, तो बाधा को ब़ढाएं क्यों? ब़ढाने के पहले ही नष्ट क्यों न कर दें?
बुद्धि अगर सिर्फ बाधा ही होती है, तो यह बात ठीक थी । बाधा स़ीढी भी बन सकती है। रास्ते पर आप सोचकर कि रास्ता बंद है। अगर आप पत्थर पर च़ढ जाएं, तो एक नए रास्ते का उद्गम होता है। जो नासमझ है, वह पत्थर को बाधा मानकर लौट आएगा। जो समझदार है, वह पत्थर को स़ीढी बना लेगा।
और समझदारी, विजडम, जिसे हम बुद्धि कहते हैं, उससे ब़डी भिन्न बात है। बुद्धि के प्रशिक्षण के बिना बच्चे जंगली जानवरों की भांति रह जाएंगे, ज्ञानी नहीं हो जाएंगे। बुद्ध और महावीर और कृष्ण और क्राइस्ट नहीं हो जाएंगे, जंगली जानवरों की भांति रह जाएंगे। बाधा तो नहीं है उनके पास, लेकिन च़ढने का कोई साधन भी नहीं है। बाधक पत्थर भी नहीं है, साधक स़ीढी भी नहीं है।
इसलिए हर बच्चे को बौद्धिक प्रशिक्षण से गुजरना जरूरी है। और जितना सुघ़ड यह प्रशिक्षण हो, जितना तीक्ष्ण यह प्रशिक्षण हो, यह बुद्धि का पत्थर जितना मजबूत और जितना विराट और ब़डा हो, उतना अच्छा है। क्योंकि वह उतनी ही ब़डी ऊंचाई पर ख़डे होने का उपाय है। इस पत्थर के नीचे दबकर जो मर जाए, वह पंडित, इस पत्थर के ऊपर जो ख़डा हो जाए, वह ज्ञानी। इस पत्थर के पहले ही डर के कारण पत्थर के पास ही न आए, वह अज्ञानी। अज्ञानी की बुद्धि प्रशिक्षित नहीं हुई। पंडित की बुद्धि प्रशिक्षित हुई, लेकिन वह बुद्धि के पार न हो सका। ज्ञानी की बुद्धि प्रशिक्षित भी हुई, वह बुद्धि के पार भी गया।
बचने से कुछ भी न होगा। पार जाना है। और जिस अनुभव से भी हम गुजरते हैं, वही अनुभव हमें सघन कर जाता है, सतेज कर जाता है। बुद्ध या कृष्ण असाधारण रूप से बौद्धिक पुरुष हैं। मोहम्मद प़ढेलिखे नहीं हैं, लेकिन बौद्धिक रूप से असाधारण पुरुष हैं। थ़ोडा सोचो, मोहम्मद जैसे गैर प़ढेलिखे आदमी ने कुरान जगत को दी और कुरान ने करीबकरीब एक तिहाई मनुष्यता को आंदोलित किया और प्रभावित किया। और कुरान का वचन मुसलमान के लिए आज भी जीवन का सूत्र है। यह आदमी गैर प़ढालिखा भले रहा हो, इसकी बुद्धि की तीक्ष्णता अनूठी है। और इसने जो नियम बनाए, वे आज भी कारगर हैं और लाखों कऱोडों हृदय उनसे आंदोलित, संचालित होते हैं।
और इसने जिस ढंग से कुरान को व्यवस्था दी, उस ढंग की व्यवस्था न तो बाइबिल में है, न उपनिषद में है, न गीता में है। कुरान एक अर्थ में सर्वांगीण है। वह सिर्फ धर्म नहीं है, वह समाजशास्त्र भी है। वह सिर्फ समाजशास्त्र नहीं है, राजनीति भी है। मोहम्मद ने जीवन को सब तरफ से पूरा का पूरा अनुशासित करने की कोशिश की। जीवन की क्षुद्रता से लेकर ब्रह्म की विराटता तक सबको कुरान में समा लिया।
इसलिए कुरान इस्लाम के लिए अकेला शास्त्र काफी है। इसलिए मुसलमान कहते हैं, एक ही अल्लाह है और उस एक अल्लाह का एक ही पैगंबर है। एक पैगंबर काफी है।
यह आदमी रहा तो बहुत बुद्धिमान होगा। इसकी बुद्धि में तो कोई शक नहीं कर सकता। बेप़ढालिखा था, लेकिन बेप़ढेलिखे होने से बुद्धि के होने न होने का कोई संबंध नहीं है। क्योंकि प़ढेलिखों को हम देखते हैं और बुद्धि नहीं पाते। प़ढेलिखे से बुद्धिमत्ता का क्या संबंध है? बुद्धिमत्ता तो जीवन के अनुभव से सार को निच़ोड लेने का नाम है।
तो बच्चे की बुद्धि तो प्रशिक्षित करनी होगी, उसके तर्क पर धार रखनी होगी, उसका तर्क तलवार जैसा हो जाए। फिर तलवार से वह खुद को काटेगा, आत्महत्या करेगा, या किसी के जीवन को बचाएगायह बुद्धिमत्ता पर निर्भर है।
