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भगवान की कृपा का आश्रय ग्रहण कर लो

Swatantra Vaartha  Mon, 22 Feb 2010, IST

भगवान की कृपा का आश्रय ग्रहण कर लो

नित्य तथा पूर्ण सुख एकमात्र भगवान या ब्रह्म में ही है। इसीलिए जब तक भगवद्दर्शन या ब्रह्म से संस्पर्श नहीं हो जाता, तब तक नित्य पूर्ण सुख मिल ही नहीं सकता। सुख सभी चाहते हैं और सभी नित्य तथा पूर्ण सुख चाहते हैं, परंतु भूल यह होती है कि वह सुख खोजा जाता हैजागतिक विषयों, परिस्थितियों और वस्तुआें में। जगत में ऐसा कोई भी विषय, परिस्थिति और वस्तु नहीं है, जो नित्य हो तथा पूर्ण हो।

विषय, परिस्थिति और वस्तु में जो सुख देखा या पाया जाता है, वह वास्तव में सुख है ही नहीं। सुख वह है, जो नित्य हो, पूर्ण हो। इसीलिये भारत के ऋषिमुनियों ने सुदीर्घ समाधि तथा ध्यानलब्ध दृष्टि से सुख का अनुसंधान किया और उसे पाया एकमात्र नित्य सत्य सनातन पूर्ण भगवान में या ब्रह्म में। इसी से उन्होंने एकमात्र भगवत्प्राप्ति या ब्रह्म संस्पर्श को ही सुख माना और उसी की प्राप्ति के लिये साधनों की शिक्षा दी, और इसीलिये भारतीय मानवसमाज ने अपना लक्ष्य भोग न मानकर भगवान को माना।

मिथ्या भ्रमवश मनुष्य की भोगों मेंपरिस्थिति और पदाथा] में सुख की आस्था हो रही है और उन्हीं की प्राप्ति, रक्षा तथा उत्तरोत्तर वृद्धि में वह अपना जीवन खो रहा है। कभीकभी जो आंशिक तथा क्षणस्थायी सुखसा दीखता है, उसी को वह ब़ढाना चाहता है, पर वह ब़ढता तो है ही नहीं, उसका दीखना भी बंद हो जाता है। तथापि मनुष्य भोगों से सुख की आशा नहीं छ़ोडता और नित्य नये प्रयास करने मेंं नित्य नयी अशान्ति,क्षोभ, दुःख तथा पाप की उपलब्धि करता रहता है। यही उसका मनोहार है।

एकमात्र भगवान ही यथार्थ एवं नित्य सत्य सुखस्वरूप हैं यह मानकर, इस पर विश्वासकर जीवन को भोगों से हटाकर भगवान की ओर म़ोडो। एकमात्र भगवान के ही शरणापन्न होकर भगवान में ही सुख देखो, उन्हीं से मांगों और उन्हीं को मांगो। भगवान देंगे, अवश्य देंगे। उनसे ही और उनमें ही हमें शाश्वत सुख मिलेगा।

भगवान में विश्वास होने पर दुःख नाम की वस्तु का ही अभाव हो जायेगा। फिर तो प्रत्येक परिस्थिति में उनके दर्शन तथा उनका संस्पर्श प्राप्त होता रहेगा। इससे वह अनंत सुख मिलेगा, जो कभी मिटेगा नहीं, घटेगा नहीं, उत्तरोत्तर ब़ढता ही रहेगा।

मोहग्रस्त मनुष्य ही भगवान को छ़ोडकर भोगों में रचापचा रहता है, अपने सारे बुद्धिबल, शरीर बल में ही लगाये रखता है। इसी से वह मानवजीवन के एकमात्र परम लाभ भगवत्प्राप्ति से व#ात रहता है। इसीलिये वह जीवनभर नयीनयी अनंत चिंताआें, उद्वेगों तथा दुःखों से ग्रस्त दिनरात भयत्रस्त और दिन रात शोकविवाद का अनुभव करता हुआ भोगप्राप्ति, भोगरक्षण तथा भोगवृद्धि के लिये नरक के द्वारस्वरूप काम क्रोध लोभ का आश्रय लेकर नयेनये पापकमा] में प्रवृत्त रहता है। इस प्रकार दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ तथा अनर्थमय काया] में लगाकर वह उसे केवल नष्ट ही नहीं करता, बहुत ब़डेब़डे भावी संकटों का निर्माण कर लेता है।

जीवन के मूल्यवान क्षण बीते जा रहे हैं। अतएव शीघ्र विचार करो और भगवान को ही जीवन का एकमात्र परम लक्ष्य बनाकर उनके सम्मुख हो जाओ। भगवान की कृपा का आश्रय लेकर सभी प्राप्त सामग्रियों तथा परिस्थितियों को केवल भगवान की प्राप्ति के साधन बना दो तथा सावधानी और शीघ्रता के साथ उनकी ओर अग्रसर होते चले जाओ।

भगवान की ओर अग्रसर होने का अभिप्राय हैमन का उत्तरोत्तर अधिकसेअधिक भगवान के स्मरण में लगना। फिर भगवान को कहीं से आना नहीं प़डता , वे सर्वदा वर्तमान है, जब किसी को अपने लिये अनन्य साधनपरायण तथा परम आतुर देखते हैं, तभी उसे अपना दर्शन तथा मङ्गलमय संस्पर्श प्रदान कर कृतार्थ कर देते हैं।

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