इच्छाआें का ज्वालामुखी
हमें आश्चर्य होता है कि आत्मा के ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम तरहतरह के उपाय अपनाते हैं। हम न केवल आसन, प्राणायाम आदि करने पर बल देते हैं, बल्कि ध्यान में भी उतरते हैं। इसकी कुछ खास वजह है।
दार्शनिक और ऋषि मुनियों आदि को देखते हैं कि उन्होंने भी स्वयं को जानने के लिए योगासन और ध्यान का सहारा लिया। उन्होंने सबसे पहले बाहरी दुनिया का भलीभांति अनुसंधान किया। बाद में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बाहरी दुनिया की किसी भी वस्तु का रहस्य हमारी आत्मा में ही छुपा हुआ है। दुनिया की सच्चाई जानने में वे आजकल के वैज्ञानिकों की तरह थे। वे हमेशा बाहरी जगत का विश्लेषण भौतिक, रासायनिक और जैविकीय दृष्टि से करते थे। विचारों की भूमिका हमारे दार्शनिक और ऋषि मुनियों ने मानवों के क्रियाकलापों का अध्ययन किया। यदि हम एकाग्रता के साथ ध्यान देंगे, तो पाएंगे कि किसी भी कार्य क्षेत्र में दो व्यक्तियों का व्यवहार एकसा नहीं होता है। हमारे ऋषियों ने इस पर काफी शोध किया और पाया कि हमारे काया] का सीधा संबंध हमारे विचारों से है। जैसे हमारे विचार होते हैं, वैसे ही हम करते हैं।
विचारों की प्रकृति पर ही कर्म का स्वरूप और गुण निर्भर करता है। यदि हम मन में कोई विचार ही न लाएं, तो कोई भी कार्य करना कठिन हो सकता है। जैसा कि हम देखते हैं कि गहरी नींद में सोया दुराचारी व्यक्ति कभी अपराध नहीं कर पाता। यदि कोई व्यक्ति संत है, तो वह सोई अवस्था मेेेेेेेेें समाजसेवा जैसा कार्य नहीं कर पाता है। यदि हमारे दिमाग में विचार आने बंद हो जाएं , तो हम काम करना भी बंद कर देते हैं। सकारात्मक इच्छा का यहां प्रश्न यह उठता है कि हमारे अंदर विचारों का ऐसा क्या हैं? दरअसल, हमारे विचार सीधे हमारी इच्छाआें पर निर्भर करते हैं। इच्छाओं का भंडार उस ज्वालामुखी के समान है जहां से विचारों का लावा फूटकर निकलता है।
बाद में हम अपने विचारों के आधार पर अपना कर्म करते हैं। यदि हमारी इच्छाएं सकारात्मक है, तो हमारे विचार भी अच्छे होंगे और साथ ही कर्म भी अच्छा होगा ! इसके विपरीत यदि हमारे विचार बुरे हैं तो हमारा कर्म बुरा ही होगा ! जिम्मेदार है अज्ञानता ऋषिमुनियों के अनुसंधान के अनुसार, हमारी गलत इच्छाआें के लिए कहीं हमारी अज्ञानता भी जिम्मेदार है।
ऋषि मुनियों के अनुसंधान के अनुसार हमारी गलत इच्छाआें के लिए कहीं हमारी अज्ञानता भी जिम्मेदार होती है। यदि हम अपने वास्तविक स्वरूप यानी जिस महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम देने हमारा जन्म हुआ है, को भूल बैठे हैं, तो आध्यात्मिक भाषा में वह अविद्या कहलाएगी। सच तो यह है कि कभीकभी कुछ अपने शरीर , मन और बुद्धि पर अहंकार करने लगते हैं। वास्तव में यह उनकी अज्ञानता होती है। ऐसे व्यक्ति यदि अपनी आत्मा में झांकने का प्रयास करें, तो उसे सही ज्ञान मिलता है।
यह सच है कि ज्यादातर लोग अपने जीवन में सब कुछ पा लेना चाहते हैं। अज्ञानी लोगों में यह प्रवृत्ति धनसंग्रह, सांसारिक सुखों के भोग आदि रूपों में हो सकती है। लेकिन हमें इस बात का ध्यान हमेशा रखना चाहिए कि संसार की सीमित वस्तु संग्रह कर कोई भी व्यक्ति सब कुछ संग्रह नहीं कर सकता है। जीवन के सभी दुःखों का यही एकमात्र कारण है। इसलिए दुखों से बचने के लिए हमें अपने भीतर से अपनी अज्ञानता को सदा के लिए निकाल फेंकना चाहिए। यदि यह हमारे मन में बैठ जाएं, तो यह आत्मदर्शन या आत्मअनुभव कहलाता है।
