आवश्यकता है धेयय को पहचानने की
मानवशरीर परमाटमा की पाप्ति के लिये ही मिला है । परमातामा की पाप्ति को ही जीवमु, तवज्ञान, मोक्षा, ेमा,पूणताा आर कतकयता आदि नामों से अभिहित किया जाता है । थूलप से मानव आर मानवेतर ाणियों में कोइ अतर नहीं ह। सभी के शरीर पा#ाभातिक है। उनमें शरीरधारी जीवमा एक परमेवर के ही अश है, चिमय ह‘ममवाशो जीवलोके’। योनिया दो कार की होती हभोगयोनि,कमयोनि। मानवयोनि कमयोनि है। मानवयोनि की यह महाा है कि इसी योनि में किये गये कमा] के अनुसार मु अथवा देवयोनि, थावरयोनि,पशुपक्षीकीट पतगादि योनिया ा होती है। मनुययोनि में किये हए कमा] के अनुसार ही भोगों का विधान होता है। मानवयोनि में कम करने की पूण वतता है। अय योनियों में जीव अपने पूवकत शुभाशुभ कमा] के अनुसार ा हुए सुखदुखादि भोगों को भोगता हआ ससारचक में घूमता रहता है।
अय योनियों में जीव को कम करने की वतता न होने से वहा उसकी मु के माग अव रहते है। जीवमा पर अकारण नेह रखनेवाले भगवान सर्वेर कपा करके जीव को सदा के लिये दुखपरपरा से छुटकारा पाने के हेतु पयन करने का अवसर देने के लिये मनुययोनि दान करते है।
कुछ लोगों का कहना ह कि मानव को अपने जीवन का एक येय बनाना चाहिये। येय बनाने से तदनुसार चो होगीकिया होगी। उनका यह कथन ठीक ही है, परतु विचार करने से ज्ञात होता है कि भगवान नेे पहले से ही मानवजीवन का येय निचित कर दिया ह। भगवान पहले जीव के लिये येय निचित करते ह, तदनतर उ येय की सि के निमाि उस जीव को मानवशरीर की ा कराते है। अत मानव को कोइ नूतन येय बनाने की आवयकता नहीं ह। आवयकता ह पूवनिचित येय या लय को पहचानने की। भगवान ने इसी उेय से मानव जम दिया है। उहोने यह विचार करके कि ‘यह जीव अपना कयाणसाधन करे’ उसे मनुययोनि में भेजा ह तथा उसके लिये मु या उार के समत साधन इस योनि में जुटा दिये है ऐसे साधन जो अयत सुलभ, सरल आर सवथा महवपूण है।
अब यहा न उठता है कि ‘जब मनुय एक निचित येय लेकर उप होता है, तब वह उ येय को न पकडकर अय दिशाआें में यों भटकने लगता है? जब वह परमामा की ा के पुनीत लय को लेकर आता है, तब उस लय की ा के साधनों में ही यों नहीं लगता? उस येय के वि किया उसके ारा यों सपादित होने लगती ह?’ इन नों का एकमा उार यह ह कि वह अपने येय को अपने पूवनिधारित लय को भूल बठता ह, उसे उसकी विमति हो जाती ह। इस विषय को अजुन का उदाहरण सामने रखकर समझा जा सकता है। जब भगवान श्रीकण ने अजुन से पूछा‘अजुन ! या तुमने गीता का उपदेश एकाग होकर सुना? या तुहारा अज्ञान जनित मोह न हो गया? तब अजुन ने हषविफारित नेाें से भगवान की ओर देखकर इस कार उार दिया‘भगवन! मेरा मोह न हो गया। मुझे मति ा हो गयी। यह सब आपके साद से हआ ह। अब म अपनी पूवथिति में आ गया ह।’ यहा मति का अथ न तो ‘अनुभव’ ह आर न ‘नूतन ज्ञान’ ही । पहले कभी कोइ अनुभूति हइ थी, कोइ ज्ञान हआ था, पर वह मोह के आवरण से आछादित होकर विमत हो गया था। भगवान के ज्ञानोपदेश से वह मोह का आवरण न हो गया आर पूव चेतना पुन काशित हो उठी भूली हइ बात याद आ गयी।
अजुन लय को भूल गया था। उस लय की विमति में धान कारण था ‘मोह’, जिसके लिये ही भगवान ने ‘कदिज्ञानसमोह नते धनजय।’ कहकर न किया था।
‘मोह’ शद का योग तो आर भी प प से उपयु भाव की पु करता ह याकरण के अनुसार ‘मोह’ शद ‘मुह वचिये’ धातु से बना ह। ‘वचिये’ पद पर यान देने से यह पता चलता ह कि ‘विचेतनताविगतचेतनता’ का नाम ही ‘वचिय’ है, अत यह सि होता है कि पहले अजुन को चेत रहा ह आर बाद में वह मोह से गत होता ह। मोह छूटने का अथ हपूवचेतना की ा। जब तक उसकी बु मोह के कलिल से यतितीण नहीं हइ, तब तक वह भगवदाज्ञापालन के लिये वा नहीं होता। गीता में भगवान ने ‘यदा ते मोहकलिल बुयितित रियति’ कहकर इसी ओर अजुन को सकेत किया है। पूणत मोह निवा होने पर ही सयकपेण चेतना की ा होती है।
उपयु विवेचन से पता चलता ह कि जीवन का लय, उेय अथवा येय तो पहले से बनाबनाया ह, उसको बनाना नहीं ह। केवल उसे पहचानने की आवयकता ह। पहचानने पर उसकी ा का साधन सरल हो जाता ह। कठिनाइ तो पहचान करने तक ही ह। मोह की ऐसी बल महिमा ह कि मानवजीवन ा करने के अनतर सचेत रहकर मु के लिये यन करने वाले मनुय को भी कभी असावधान पाकर वह धर दबाता ह।
भगवान श्रीकण ने अजुन के इस दुधष मोह की ‘लेय’, ‘कमल’ आदि शदों से तथा ‘अनायजुम’ ‘अवयम’, अकीतिकरम’ आदि पदों से उसके भयकर परिणामों को देखकर निंदा की। किंतु अजुन पर मोह का ऐसा गहरा रग चढा था कि उसने अपने भावों को ही श्रे माना आर पुन कुछ बोलकर उहीं का पिपेषण किया। पु माणों से अपने वचनों पर जोर देते हए कहा‘पूजा के योय पितामह भीम आर आचाय ाेण को बाणों से कसे मारा जा सकता ह? मारने पर गुजन हिंसा के जघय अपराध के बाद हमें उनके र से सने हए केवल अथ काममय भोग ही तो ा होंगे। धम अथवा मु तो मिल नहीं जायेगी? अत मेरे विचार से यु का कोइ आचिय नहीं है। इस कार अजुन पर मोह ने ऐसा अधिकार जमा लिया कि वह कतयविमुख हो गया। अनत भगवान ने गीताज्ञान का महान उपदेश देकर उसके मोह को निवा किया। अत गीता येक मोहगत मानव के मोहनिवारण का अमोघ आषध है।
मानव जब तक अपने लिये सुनिचित येय की पूति की ओर अगसर नहीं होता, तब तक वह अय सामाय जीवयोनियों से विशि कोटि में नहीं पहचता। अत मनुय को अपने उार या कयाण की से अपनी विमत चेतना की पुन ाति के लिये यनरत होने में ही मानवता की साथकता समझनी चाहिये। जिस काय के लिये यह दुलभ मनुयशरीर ा हआ ह, उसका साधन न करके मानव शरीर, इयि आर ाणों की मुयता मनाने के कारण कुटुब एव भोगसामगियों से आस होकर उसे भूल गया है। जनसाधारण की ऐसी ही थिति ाय देखने में आती है। वतुत यान से देखा जाय तो ज्ञात होगा कि मनुय की जितनी कियाशीलता इस विरोधी दिशा में है, उतनी ही विवेकपूण कियाशीलता से मु अथवा उार का माग भी शत हो सकता ह। पर हो या रहा ह? मानव अपने लिये कभी वग की, कभी अथ की कभी योग की आर कभी यश की ा के लिये नाना कार की योजनाए बनाने में मत ह। वह समझता ह कि जीवन का मूय इतना ही है। इस कार पुन अपनेआपको आवागमनचक में डालने का कुचक वह वय ही रच लेता है।
भगवान ने गीता में बताया हमनुय वय ही अपना उार करे, अपने आपको अवनति के गत में न गिरने दे। वह वय ही अपना बधु तथा वय ही अपना शु है।
आज का मानव आमा के उार के लिये यन न करके वय ही अपने ति शुता कर रहा है। कहा तक उेख किया जाय, आज जिसको भातिक समान ा ह, वह आर अधिक समान की खोज में ह। धनिक आर अधिक धन की तलाश में है। गथकार मयु के बाद अमर कीति की अभिलाषा में डूबा ह। बडेबडे भवनों का निमाता अपनी भातिक कीति को चिरथायी बनाने के वन देखता ह आर धर्मोपदो अपनी सि का वातावरण बनाने में सल हआदिआदि। इस कार मानव का सारा यन येय की पा के लिये न होकर उससे उलटी दिशा की ओर जाने के लिये हो रहा है। परिणाम यह ह कि इस दिशा में जितनी ही विशेषता की उकट आकाा की जाती है, मानवता के वातविक लय से उतनी ही अधिक दूरी होती जा रही है, योंकि ये सारी बातें यवि को हटाकर वहा अपने वप की ताि करे। उसका सारा यन चिमयता की ा के लिये होना उचित है।
जसे कोइ मनुय तीथनान को जाता है, वहा मेले से दूर किसी धमशाला में ठहरता है आर धमशाला के थान को अपने लिये उपयोगी बनाने, रसोइ का सुदर बध करने तथा अयाय सुखोपभोग के सामान जुटाने आदि में इतना तमय हो जाता है कि तीथनान, देवदशन, तीथदशन, मेला महोसव और साधुसमागम आदि कोइ काय नहीं कर पाता। ऐसे मनुय को तो हम उपहासापद ही बतायेंगे। इसी कार मनुय आया तो है भगवा के लिये, किंतु लग गया सगह आर भोग भोगने आदि में आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास।
भोगों की ा हमारा लय नहीं ह, पर यन उसी के लिये होता ह। भगवान की ा ही मानव जीवन का मुय लय है, किंतु उसके लिये कोइ यन नहीं हो रहा है। शरीर, इयि, ाण, मन, बु, धन, वभव, भोग आदि पदाथ साधन मा है, किंतु उहें साय बना लिया गया है जो वातविक साय है, उसकी सवथा उपेक्षा कर दी गयी है।(जारी)
वामी रामसुखदासजी
