धवनी के केंन्द्र में सनान करो
वनियों के साथ एक बडी विशेषता है जब भी कोइ वनि होगी, तुम उसके कें होओगे। सभी वनिया तुहारे पास आती है सब तरफ से, सब दिशाआें से। के साथ, आखों के साथ यह बात नहीं है। रेखाब है। म तुहें देखता है तो मुझसे तुम तक एक रेखा खिंच जाती है। लेकिन वनि वतुलाकार है, वह रेखाब नहीं है। सभी वनिया वतुल में आती है आर तुम उनके कें हो। तुम जहा भी हो, तुम सदा वनि के कें हो। वनि के लिए तुम सदा परमामा होसमत बाड के कें। येक वनि वतुलाकार में तुम तक आ रही है, तुम तक गति कर रही है।
यह विधि कहती है वनि के कें में नान करो। यदि तुम इस विधि का योग कर रहे हो तो तुम जहा भी हो वही आखें बद कर लो आर भाव करो कि सारा बाड वनियों से भरा है। अनुभव करो कि येक वनि तुहारी ओर गति कर रही है आर तुम उसके कें हो। यह भाव भी कि तुम कें हो, तुहें एक गहरी शाति से भर देगा। सारा बाड परिधि बन जाता है आर तुम उसके कें रहते हो। आर येक चीज, येक वनि तुहारी तरफ बढ रही है।
मानो जलपात के सतत नाद में नान करते हो। यदि तुम किसी जलपात के किनारे बठे हो, तो आखें बद कर लो आर अपने चारों ओर की वनि को महसूस करो आर उसे सब ओर से अपने ऊपर बरसता हआ अनुभव करो आर यह अनुभव करो कि तुम उसके कें हो।
अपने को कें समझने पर यह जोर यों ह? योंकि कें पर कोइ वनि नहीं है। कें वनिशूय है, यही कारण है कि तुहें वनि सुनाइ पडती ह अयथा तुम उसे नहीं सुन सकते। एक वनि दूसरी वनि को नहीं सुन सकती। अपने कें पर वनिशूय होने के कारण तुहें आवाजें सुनाइ पडती है।
कें तो बिकुल ही मान ह, शात है, इसी कारण तुम वनि को अपनी ओर आते, अपने भीतर वेश करते, अपने को घेरते हए अनुभव करते हो।यदि तुम खोज लो कि यह कें कहा है, तुहारे भीतर वह क्षे कहा ह जहा सब वनिया बह कर आ रही है, तो अचानक सब वनिया सुनी जाती ह तो अचानक चेतना थानातरित हो जाती है। एक क्षण तक तुम वनि से भरे ससार को सुनोगे आर दूसरे ही क्षण तुहारी चेतना भीतर की ओर मुड जाएगी आर तुम निवनि को, मान को सुनोगे जो जीवन का परम कें ह। आर एक बार तुमने उस वनि को सुन लिया , तो कोइ भी आवाज तुहें विचलित नहीं कर सकेगी। वह तुहारी ओर आती ह, लेकिन वह कभी तुम तक पहच नहीं पाती। एक बिदु ह जहा कोइ वनि वेश नहीं कर पाती,वह बिंदु तुम हो। बीच बाजार में इस विधि का योग करो। बाजार जसा कोइ दूसरा थान नहीं है वह शोरगुल से, पागल शोरगुल से खूब भरा रहता ह। लेकिन इस शोरगुल के सबध में सोचना शु मत करो, यह मत कहो कि यह वनि अछी है, यह बुरी ह, यह उपव पदा करती है, यह सुदर आर लयपूण है। वनियों के सबध में तुहें सोचविचार नहीं करना है। तुहें केवल कें का बोध रखना है।
