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श्री कृष्णचरित्र की उच्चवलता

Swatantra Vaartha  Wed, 24 Feb 2010, IST

श्री कृष्णचरित्र की उच्चवलता

श्री श्री वजसुदरियों को निबिड अरूय में छोडकर आनदकद वजेनदन श्रीकणच अतधान हो गये। वे सब विरह के आवेश में अपने ाणयितम को खोजने लगीं। खोजतेखोजते श्रीकणमय बन गयी। तदनतर श्रीकणदशनलालसा से कातर होकर लाप करने आर फूटफूटकर रोने लगीं। ठीक इसी समय यामसुदर उनके बीच में मधुरमधुर मुकराते हए कट हो गये। उनका मुख कमल मद मुकान से खिला हआ था। पीताबर धारण किये हए थे। गले में दिय वनमाला थी। उनका सादय समत विवाणियों के मन को मथने वाले, कामदेव के मन को भी मथने वाला था। वे ‘साक्षात’ ममथ ममथ’ थे। करोडों कामदेवों से भी सुदर मधुर मनोहर यामसुदर को अपने बीच में पाकर वजसुदरियों के ाणहीन शरीरों में मानो दिय ाण लाट आये। उनके ने आनद आर ेम में खिल उठे। हठात यितम के ाकटय से उनके दय में नवीन फूति आ गयी। उनके एकएक अ में नवीन चेतना जाग उठी। उहोंने अपनेअपने मन के अनुसार यितम की आवभगत कीकिसी ने उनके कोमल करकमलों को अपने हाथों से पकड लिया, किसी ने चरणारविद का आलिन किया, किसी ने चरण पकडकर अपने दय पर रख लिया, किसी ने उनका चबाया हआ पान गहण किया, किसी ने णयकोप से विल होकर यारी चढाकर दूर से ही भकुटिपूण कटाक्षपात किया आर कोइकोइ निनिमेष नेाें के ारा उनके मनोहर मुखकमल का मधुर मकरद पान करने लगीं। उनका रोमरोम खिल उठा। इस कार विरहताप शमित होने पर वे अपने पाणधन यामसुदर को घेरकर बठ गयी। अब फिर हाय कातुक आरभ हुआ।

आनदकद श्रीकणच बडे निठुर हबडे छलिया ह, यह बात उहीं के मुख से कहलाने के लिये वजसुदरियों ने मानो एक पहेली सी रखकर उनसे पूछा

भजतोऽनुभजयेक एक एतपिययम।

नोभया भजयेक एतो बूहि साधु भो।।

(श्रीमा १०। ३२। १६)

‘यामसुदर ! कुछ लोग तो ऐसे होते ह, जो भजनेवालों को ही भजते हेम करनेवालों से ही ेम करते ह, कुछ लोग न भजनेवालों को भजते हेम न करने वालों से भी ेम करते ह। तीसरे कार के कुछ लोग ऐसे भी होते ह, जो भजनेवालों को भी नहीं भजतेेम करने वालों से भी ेम नहीं करते, फिर न करनेवालों से न करें, इसमें तो बात ही कान सी ह। यितम ! बताआें, इन तीनों में तुहें कानसा अछा लगता ह?’ वजसुदरियों के कहने का तापय यह था कि इन तीनों में तुम किस श्रेणी के होयह प कहो। इसके उार में आनदकद नदनदन यामसुदर ने कहा

मिथो भजति ये सय वाथकातोमा हि ते।

न त साद धम वाथाथ त नायथा।।

(श्रीमा १०।३२।१७२२)

भगवान ने कहा , ‘मेरी यि सखियो ! जो भजने पर ही भजते ह ेम करने पर ही ेम करते ह, उनका तो सारा उम ही सवथा वाथपूण ह, उनके न साहाद ह आर न तो धम ही। निरा बनियापन हलेनदेन ह, वाथ के अतिरि उनका आर कोइ भी योजन नहीं ह। जो लोग भजन न करने पर, ेम न करने पर भी ेम करते ह, जसे वभाव से ही कणामय सान आर मातापिता, उनका दय साहाद से भरा होता ह। उनका ेम सचमुच निमल ह आर वहा धम भी ह। जो लोग भजन करने पर भी नहीं भजते, ेम करने पर भी ेम नहीं करते, फिर वे ेम करने पर ेम का करने का तो कोइ न ही नहीं ह, ऐसे उदासीन लोग चार कार के होते ह आमाराम, आमकाम, अकतज्ञ आर गुाेही। सखियो! यदि तुम मेरे सबध में पूछती हो तो म इन तीनों (सापेक्ष, निरपेक्ष आर उदासीन) में से कोइ सा भी नहीं ह। म यदि ेम करने वालों से कभी वसा ेम का यवहार नहीं करता तो इसका अथ यह नहीं ह कि म उनसे ेम नहीं करता। म ऐसा इसीलिये करता ह कि उनकी चािवा मुझमें लगी रहे। म मिलकर फिर जब छिप जाता ह, तब भों की वा मुझमें साय ा कर लेती ह। जसे किसी निधन मनुय को बहत सा धन मिल जाय आर फिर खो जाय तो उसका दय धन की चिंता करते करते धनमय हो जाता ह, वह सब कुछ भूलकर उसी में तमय होजाता ह, वसे ही मेरे छिप जाने पर भ मुझमें तमय हो जाते ह। यािओ ! तुमलोगों ने अपनी समत वायों को मुझमें अपण करके मेरे लिये लोकमयादा, वेदमाग आर अपने आमीय वजनों को भी छोड दिया ह। यहा म इसीलिये छिप गया था कि तुहारे मन में अपने सादय आर सुहाग की बात न उठ सके, तुहारा मन केवल मुझमें ही लगा रहे। म पयक्ष में नहीं दीखता था, पर था तो तुहारे बीच में ही। तुहारे ेम की सारी दशाए देख रहा था। तुहारे ेम में निम हो रहा था। अतएव तुम मुझ पर दोषारोपण मत करो। तुम सब मुझे बडी यि हो आर म भी तुहारा यारा ह। तुहारा ेम सवथा निमल हइसमें कहीं भी वाथ की गध नहीं ह। तुमने मेरे लिये गहथी की उन बेडियों को तोड डाला ह, जिहें बडेबडे समथ लोग भी नहीं तोड सकते। यदि म देवशरीर से अमर जीवन से अनत कालतक भी तुहारे ेम, याग आर सेवा का बदला चुकाना चाह तो नहीं चुका सकता। म सदा के लिये तुहारा ऋणी ह। तुम अपने साय वभाव से ही मुझे ऋण कर सकती हो। म तो ऋण चुकाने में असमथ ही है ।’

श्रीवजसुदरियों के ाणधन भगवान लेनदेन करने वाले यापारी नहीं ह। ाद को वर का लोभन देने पर ाद ने श्रीभगवान नसिंहदेव से कहा था‘जो सेवक आपसे अपनी कामनाए पूण करना चाहता ह, वह सेवक नहीं, निरा यापारी ह (न स नय स व वणिक) आर जो सेवक से सेवा कराने के लिये, उसका वामी बनने के लिये उसकी कामनाए पूरी करता श्री कणचरि की उवलता

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