अनतस की इशवरीय शक्तियों जागती है चकों पर ध्यान से
सबसे ऊपर सहार चक है। उसके बाद वह चक ह जिसे आप मतिक के दोनों आखों के बीच कुिटि कहें, भकुटि कहते है, जहा आप तिलक लगाते हयह आपका आज्ञा चक है। यहा यान करने से य अपना मालिक बनता है। अपने को आज्ञा देने वाला बनता है। अपनी आदतों का गुलाम हर कोइ है । अदर की आदतें हमारे मन आर अतथल मे बनी हुइ है। हम कितनी भी कसमें खायें कि हम गुसा नहीं करेंगे, लेकिन फिर भी गुसा होगा। हम चाहेंगेे कि हम अछे ही माग पर चलें, बुरे पर नहीं चलें, लेकिन आदतें खींच कर ले जायेंगी। जिस दिन आप यान करते हए आज्ञा चक में अपनी श का जागरण करने में सफल हो गये, उस दिन आप वय को हम देने वाले बनेंगे, अपने मालिक बनेंगे।
कठ भाग में अगर आप थोडा सा दबाकर देखें तो एक अगूठा भर का हकासा गा दिखाइ देता है। जहा से कठ शु होता है, यह भी चक हजिसे विशु चक कहा जाता है। जहा यान करने से य की वाणी में समोहकता पदा होती है। ऐसा य सबका यि हो जाता है। यान करने से कहा जाता ह कि जो वर फूटने लगते है, वह परमामा को अपनी वेदना सुनाने का मायम बन जाता है। उसके बाद अनाहत चक हदय से जुडा है । नाभि से जुडा हआ मणिपुर चक आर इसके बाद दो चक आर आते ह। एक का नाम वाधािन चक आर छठा चक जिसको आप मूलाधार कहते है। वाधािन आर मूलाधार के बीच में ही वह श बठी है जिसको आप कुडलिनी श कहते है। विचि बात तो यह है कि ऊजा ससार की तरफ बह रही ह, वासनाआें की तरह बह रही ह। हम ऊपर उठाने की कोशिश करते ह,लेकिन ससार का भी अपना भाव है।
एक ऐसा विफोट अदर होता हयह आपकी जो रीढ की ही है, इससे इसमें ऐसा लगेगा कि जसे एक टयूबलाइट जल गयी हो। ऐसी अनुभूति होने लगती ह कि जसे बिजली का करट अदर वाहित होने लगा है आर उस समय किसीकिसी य की तो यह हालत हो जाती है कि वह चाबीस घटे के लिये, कुछ लोग छाीस घटे, कुछ अडतालीस घटे के लिए यानम हो जाते है। उनका आर कहीं यान जाता ही नहीं , एक ही तरफ यान रहता ह कि बस जो आनद मिल रहा ह, वहा बठे रहेंगे, हिलेंगे भी नहीं। कोइ हिलायेडुलाये तो उहें अछा नहीं लगता।
उनको एक ही थान पर बठेबठे बहत आनद आता ह। उसके बाद किसी की थिति यह होती ह कि जसे ही यान वहा से हटेगा तो ऐसा लगता है कि जसे शरीर शहीिन हो गया हो लेकिन सात दिन के बाद फिर से शरीर में नइ श का उदय होता है। य ढूढता है कि उस आनद को फिर से लिया जा सके आर अनोखी बात यह ह कि ससार के सारे भोग उनके सारा सुख आर सारे भोजन आर भोय पदाथा] के रसों का सुख, ससार के सगीत का सुख आर जितने भी तरह के सुख हो सकते ह। सबको एक जगह जोड दीजिये आप। ऐसा सुख अगर आप लेना चाहते ह तो केवल अपने अदर की श जगा लेने से पाइयेगा। इसलिए यह अनोखी श है। पुराने खजानों के बारे में ऐसा वणन मिलता ह कि जब भी कोइ पुराना, किसी किले का खजाना खोदा गया तो हर खजाने के ऊपर कोइ ढन आर उस ढन के ऊपर कोइ सपिणी, नाग या नागिनी बठे मिले।
परमामा ने भी कुछ ऐसा ही कर दिया। आपके अदर जो दवी खजाना है, उसके ऊपर एक कूमष कछुए की पीठ जसा ढन बनाया आर उस ढन को इतजार रहता ह कि कोइ आये पा, कोइ योय य आये, यान करतेकरते यहा आकर खडा हो तो जसे खजाने का मालिक आ जाय तो सप अपने आप उठकर दूर चले जाते ह ऐसे ही वह श फुफकार कर उठती ह, ऊपर की तरफ चलनी शु होती ह। एक बार श का गमन ऊपर की ओर होना शु हो जाये, उसके बाद अदभुत शयाि य के अदर आती है।
कोइ सफल चिकार, कोइ सफल लेखक, कोइ सफल वज्ञानिक ह तो यह मानो कि उनके अदर कहींनकहीं कोइ श का एक अश ही सही, जर जागत हआ ह। किसीनकिसी चक की एक श जागत हइ आर अगर सपूणता से आप अपने आपको जागत कर लें फिर तो कहने की या? इसलिए ऐसा माना जाता ह कि जब कोइ य अपनी कुडलिनी श को जागत करने के लिए तपर हो तो उसे इन चकों को थोडा छेडना चाहिये।
इन चकों को नियम से जागत करना चाहिये। साधना के आसन पर बठकर एकएक चक पर थोडीथोडी देर के लिए यान किया जाता ह। यादा देर इसलिये यान नहीं कराते योंकि अदर बहत उणता आने लग जाती है। गर्मी आने लग जाती है आर उसको य साधारण प से सभाल नहीं पाता। जसेजसे थोडाथोडा यान करता जाता ह तो अदर कुछ शयाि जागनी शु हो जाती है।
सबसे पहले य को मूलाधार चक से यान कराने के साथसाथ यादा बल आज्ञाचक पर दिया जाता ह आर बहत सारे योगी तो सीधे यह घोषणा करते ह कि आर सारे चक को बाद में जगाना, पहले आज्ञा चक पर यान दो। आज्ञाचक को बहत महव दिया गया ह। यह आपका वह थान ह जहा आप तिलक लगाते ह। यह आर कोइ चीज नहीं ह यह आपका तीसरा ने ह। भगवान शिव के पास जो तीसरा ने ह, वह आपके पास भी ह । उस ने को खोलने के लिए या उस श को जगाने की आज भी हमारी परपरा ह।
हम लोग मतक पर तिलक लगाते आ रहे है। आर सदव से लगाते आ रहे ह कि यह हमारा वह थान, यहा से हमें अपने आपको जागत करना ह। हर य के माथे के बीच में तिलक लगाने वाला थान थोडासा अलग होता ह। इसे केवल गु ही देखता ह। आपको इतनी पहचान बता देते ह कि आप अपनी यह अनामिका अगुली लेकर माथे के बीचोंबीच लगाना शु करें।
जहा कहीं आपको हका सा गा अनुभव हो तो समझ लेना कि यह आपका वह थान है, जहा आपको तिलक लगाना चाहिये। किसी य की पिछले जम में, किसी नकिसी जम में जाकर उसने कुछ साधना की होगी। साधना करतेकरते जो उसका आज्ञाचक वाला भाग हउसका तीसरा ने कहीं से जागत हआ होगातीसरा ने खुलने का मतलब यह नहीं कि आपके माथे के बीचोबीच कोइ एक आख पलकर उठाकर खुल जायेगी। इसका सीधा सा मतलब ह आपके अदर वाली श जागत हो जायेगी, दिय चक्षु खुल जायेंगे। आप जो देखना चाहोगे, वह देखोगे। योगी लोग ऐसी शयाि अपने अदर उजागर कर लेते है।
