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बन्धन से मुक्ति की ओर

Swatantra Vaartha  Sat, 27 Feb 2010, IST

बन्धन से मुक्ति की ओर

हे प्रभु! मुझे मृत्युबंधन से छ़ुडा, अमृतत्व से नहीं। यह टेक जिस मंत्र की है उसे वैदिक साहित्य में ‘महामृत्युंजय मंत्र’ नाम दिया है। इसके जप से मत्यु बंधन से विमुक्ति मिलती है, ऐसी आस्था है। मंत्र का पूर्ण स्वरूप यजुर्वेद ३/६० में है।

ऊॅं त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्‌ मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌।। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः।।

इस मंत्र के दो विभाग हैं पहले में भक्त की पुकार है तो दूसरे के प्रथम चरण में पतिवेदनम्‌ और द्वितीय चरण में ‘इतोर्मुक्षीयमामृतात्‌’ से मालूम होता है कि कोई कन्या पति का लाभ (पतिवेदनम्‌) कराने वाले त्र्यम्बकं अर्थात परब्रह्म अथवा आचार्य से कह रही है कि मुझे यहां से अर्थात पितृ कुल, मातापिता, भ्राता आदि के बन्धन से छ़ुडा, पति कुल से नहीं क्योंकि पति बन्धन मेरे लिए अमृत है, सौभाग्यप्रद है।

इसी प्रकार भक्त को यह समझना है कि मृत्यु बंधन, पितृबन्धन के जैसा और अमृत बन्धन पति बन्धन के समान है। जिस प्रकार कन्या को पति बन्धन नहीं अखरता, उसी प्रकार भक्त को मृत्यु बन्धन नहीं अखरना चाहिए। जिस प्रकार कन्या के लिए पति लाभ सौभाग्य का हेतु है उसी प्रकार भक्त के लिए अमृत लाभ परम आनन्द का हेतु है।

भक्त को जहां यह बात ध्यान में रखनी होगी वहां यह भी समझना होगा कि उसे यहां से मुक्त अवस्था से यदाकदा लौटना भी होगा। जैसे कोई कन्या कभीकभी पति गृह से पितृगृह का फेरा डालती है। कन्या फेरा डालने आती है सर्वथा रहने नहीं। उसका कर्तव्य पूरा होते ही पतिगृह को वापिस चली जाती है। उसी प्रकार मुुक्त जीव को भी कर्तव्य पालन के लिए जगत में आना होगा। धर्म संस्थापना का कर्तव्य पूरा होते ही वापिस चलना होगा। उसका असली डेरा वही है, यह दुनिया नहीं है। यह कर्मभूमि है, वह फल भूमि है। उसे यहां ठहरना नहीं, रुकना नहीं, आगे ब़ढना है।

मंत्र में जहां मृत्यु बन्धन से छूटने की प्रार्थना है वहां अमृत से ज़ुडे रहने की भी प्रार्थना है। इससे स्पष्ट होता है कि कोई बंधन ऐसा भी है जिससे ज़ुडे रहना है, पूर्ण मुक्त नहीं होना। जीव का देह धारण करना जैसे एक बंधन है वैसे ही ब्रह्म से बंधना भी बंधन है। अंतर इतना है कि प्रथम बन्धन सुःखदुःख का मिलाजुला रूप है जबकि दूसरा बन्धन शुद्ध आनन्द ही आनन्द है।

भक्त की सहज प्रार्थना है कि मुझे मृत्यु से छ़ुडा दो, अमृतत्व से नहीं। अब बन्धन दो प्रकार का हुआ, एक मृत्यु का दूसरा अमृत का। अक्सर देखने में आता है कि भवन निर्माण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि हर द्वार पर अंदर बाहर दोनों ओर सांकल, चटखनी लगी हो। एक अंदर से बंद करने के लिए एक बाहर से बन्द करने के लिए। अंदर की सांकल अपने हाथ में तो बाहर की दूसरे के हाथ में। अब इस अन्दर बाहर की सांकल का जो अंतर है वही अंतर मृत्यु और अमृत के बंधन में है। मृत्यु बंधन की सांकल अपने हाथ में नहीं, दूसरे के हाथ में है। अमृत बंधन की सांकल अपने हाथ में है। यह बात भवन के अंदर बाहर की सांकल के उदाहरण से स्पष्ट होती है।

लेकिन एक भवन ऐसा भी है जिसके द्वार पर सांकल एक ओर ही होती है। केवल बाहर की ओर इसे हवालात या जेल की कोठरी कहते हैं जो केवल जेलर की मर्जी से ही खुलती है। अपराधी की मर्जी से नहीं। ऐसा न हो तो उसे जेल कौन कहेगा? जो अंतर कारागार व घर में है। वहीं अंतर इहलोक और परलोक में है, संसार और मोक्ष में है। भक्त कहता है मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। मुझे मृत्यु बन्धन से मुक्त करो और अमृत बंधन से बांध दो।

इस पुकार को सुन परमात्मा कहते हैं कि ऐ भक्त! तेरे बंधन की सांकल किसी और के हाथ में न होकर तेरे प्रिय सखा, हितचिंतक, मातापिता, आचार्य और तेरे सर्वस्व प्यारे प्रभु के हाथ में ही है। यह मृत्यु का बंधन भी तेरे प्रिय सखा का ही दिया हुआ है। यदि अमृत तत्व उसकी छाया है तो मृत्यु भी उसकी छाया है। ‘यस्य छायामृतं तस्य मृत्युः। भक्त कहता है कि मृत्यु बंधन में कौनसा हित है? उपदेष्टा ने समाधान किया कि तूने प्रार्थना में कहा कि मुझे मृत्यु बंधन से ऐसे छ़ुडा दो जैसे खरबूजा अपनी डाल से छूटता है। इस उपमा को जितनी अच्छी प्रकार समझा जा सके उतना ही उत्तम है। फिर तो मृत्यु भी वरदान प्रतीत होगी।

आइए ! खेत पर चले जहां किसी ने खरबूजे लगा रखे हैं, देखे बेलों को, टटोलें, कुछ समझें, वह देखो सामने वाला खरबूजा डाल से स्वयं ल़ुढककर अलग हो गया, किसी ने छ़ुडाया नहीं है, हाथ भी नहीं लगाया, जब पक जाता है खरबूजा स्वयं सहज ही बेल से छूट जाता है। ऐ भक्त तू ! जान ले कि समय आने पर तू भी ऐसे ही मृत्यु बंधन से अनायास ही छूट जाएगा।

छूटने के लिए पकाना आवश्यक हैकच्ची अवस्था में न डाल छ़ोडती है न खरबूजा छूटता है। बन्धन इतना क़डा होता है कि हाथ से त़ोडना या छुरी से काटना मुश्किल होता है। डाल बेल के साथ चली जाती है, खरबूजा ल़ुढक कर अलग हो जाता है, मुक्त हो जाता है। ऐ भक्त! यदि तू मुक्त होना चाहता है तो पकना आरंभ कर।पकने के लिए ज़ुडना आवश्यक है। यह स्पष्ट है कि छूटने के लिए पकना आवश्यक है तो यह भी निश्चित है कि पकने के लिए ज़ुडना। जहां बिना पके छूटना असंभव है वहां बिना ज़ुडे पकना असंभव है। निष्कर्ष यह निकला कि मुक्ति के लिए बंधना आवश्यक है। एक बन्धन पकने से पहले का तो दूसरा पकने के बाद, पहला पकने के लिए तो दूसरा मुक्ति के लिए। यह विश्व एक मर्त्य बेल है। मनुष्य उर्वारुक फल है। इन मनुष्य रूप फलों को बेल से ज़ोडती है वासना नामक डाल। त्रिगुणात्मक प्रकृति ही विश्व बेल की ज़ड है, ज़ड को जमाने के लिए ‘त्र्यम्बकम्‌’ भूमि है। विश्व बेल के मूल में त्रयम्बक है और डाल में उर्वारुक है। बेल है, मूल है, फल है, डाल और भूमि है। यह बेल सदा हरीभरी रहती है, उसकी ज़डें अमर भूमि में हैं जिसका रस अक्षय है, जहां से रस सदा प्रवाहित होता रहता है। आश्चर्य है कि फल आते हैं, पकते हैं , मुक्त होते हैं, शेष व्यवस्था वैसे ही वैसे ही रहती है।

संसार की रचनाआें में बंधन का चमत्कार दिखाई देगा। भवन ख़डे हैं उनकी एकएक ईंट एक दूसरे से बंदी हैं, एक दीवार दूसरे से ज़ुडी है। दीवारों पर छत प़डी है तभी इसका सौन्दर्य है। जहां बंधन ढीले हुए कि भवन धराशायी।

परिवार का प्रत्येक सदस्य एक दूसरे से बंधा है?। एक कुल दूसरे कुल से। सब कुल मिलाकर ग्राम, नगर व राष्ट्र को जन्म देते हैं। इनकी ईकाई है। व्यक्ति अलग हो जाए तो न तो परिवार है, न राष्ट्र, न समाज है, न राष्ट्र, न समाज है, न विश्व। यह सब बन्धन का ही परिणाम है।

प्रभु हमसे बंधे हुए हैं इसलिए वह हमारे बंधु हैं। ‘स नो बन्धुर्जनिता स विधाता’ दोनों का बन्धुत्व तभी सार्थक है जब जीव ब्रह्म से बंधकर पूर्णत: पक जाए।

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