मानवमात्र की सेवा के लिए तत्पर रहो
भगवत्कृपा का प्रकाश विविध रूपों में हुआ करता है, कभी वह ब़डे सौम्य स्वरूप में अपने दर्शन देती है तो कभी बहुत ही भीषण रूप में ! जो उसे पहचानता है वह उस भीषण मूर्ति के अंदर भी उसकी त्रिताप का नाश करने वाली शांतिसुधामयी छवि को देख पाता है, वह सभी अवस्थाआें में भगवान् की कृपा का अनुभव करता है। प्रत्येक आघात में वह अपने एकमात्र प्रियतम का कोमल करस्पर्श पाकर पुलकित हो उठता है और अपने को परम सौभाग्यवान् और सुखी समझता है, परंतु जो नहीं पहचानते, वे रोते और दुःखी होते हैं, परंतु वे भी विपत्ति में सम्पत्ति पाते हैं, दुःख में भगवान को कहीं अधिक सच्चे हृदय से पुकारते हैं !
संसार में कुछ भी अनियमित नहीं होता। सभी कुछ सत्य, न्याय और दया से सनी हुई भागवती शक्ति के नियमाधीन होता है जो जीवों के कर्मवश विविध भांति से उनके शरीरों का सृजन, पालन और संहार करती हुई उन्हें सतत कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करना चाहती है और करती रहती है। जैसे सृजन और पालन का कार्य सर्वत्र सतत नियमित चल रहा है, इसी प्रकार संहार का भी चल रहा है, परंतु किसी अज्ञात नियम के अनुसार जब एक ही जगह एक ही समय में अधिक संहार होने लगता है, तब हम उसे कोई असाधारण घटना समझकर सिहर उठते हैं और समझते हैं मानो सर्वनाश हो गया, परंतु ऐसी बात नहीं है।
जब बारबार बिजली कौंधती है, बादल गरजते हैं, आंधी आती है और साथ ही मूसलधार वर्षा होने लगती है, तब भीगा हुआ राह का मुसाफिर ज़ाडे से कांपता हुआ सोचता है, न मालूम यह प्रलयवृष्टि बंद होगी या नहीं, परंतु थ़ोडी ही देर में बादल हट जाते हैं, आकाश निर्मल हो जाता है, सूर्य की किरणें सब ओर अपना प्रकाश फैला देती हैं और पथिक सुखी होकर अपने गन्तव्य स्थान की ओर चल देता है।
यही तो संसार का स्वरूप है। इसमें उतरावच़ढाव होता ही रहता है, प्रतिक्षण परिवर्तन, रूपान्तर, मरण और सृजन हो रहा है। इस सारी लीला में वस्तुतः एक लीलामय ही खेलता है, वह विधाता ही विधान का स्वाँग धारण करता है ! उसकी कृपा उससे अभिन्न है। हम उसे पहचानते नहीं , यही हमारा मोह है। भक्त और ज्ञानी उसे पहचानते हैं, इसीलिये वे सदा सुखी रहते हैं, महान् सेमहान दारुण दुःख भी उनको उस सुखमयी स्थिति से विचलित नहीं कर सकता
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।
तथापि जहां पर जैसी लीला होती है, उसी के अनुसार सब पात्रों को अभिनय करना प़डता है और करना चाहिये भी। इसी से ज्ञानी और भक्तगण भी दुःखियों के दुःख को देखकर रोते हैं और उनके दुःखनाश के लिये तनमन धन से जतन करते हैं। वस्तुतः ज्ञानी और भक्त ही सबका दुःख दूर करना चाहते हैं, क्योंकि उनके अंतःकरण का स्वभाव ही ‘सर्वभूतों के हित में रत रहना’ और ‘सबके प्रति द्वेषरहित होकर सबके अकृत्रिम मित्र और दयालु होना’ है।
जिनका हृदय दुःखियों के दुःख को देखकर द्रवित नहीं होता, जिनको पी़डतों की करुण पुकार पी़डत नहीं करती, उन मनुष्यों का ज्ञानी और भक्त बनना तो दूर रहा, मनुष्यत्व तक पहुंचना भी अभी नहीं हो सकता है। जो लोग पाप का फल बतलाकर किसी दुःखी जीव से उदासीन रहते हैं, जिनको अपने धन और पद के अभिमान में दुःखियों के दुःख से द्रवित होने का अवकाश ही नहीं मिलता, वे मनुष्य अभागे हैं और उनके द्वारा प्रायः पाप का ही संचय होता है। अतएव सबको यथासाध्य दुःखी प्राणियों की तनमनधन से सेवा करने के लिये सदा तैयार रहना चाहिये।
जिसकी जैसी शक्ति हैं, वह अपनी शक्ति के अनुसार ही सेवा करे। सेवा करके कभी अभिमान न करे और न यह समझे कि मैंने जिनकी सेवा की है, उन पर कोई कृपा की है, वे मुझसे नीचे हैं, मैंने उनका उपकार किया है, उनको मेरा कृतज्ञ होना चाहिये या अहसान मानना चाहिये। बल्कि यह समझे कि‘सेवा का सौभाग्य और बल प्रदान करके भगवान ने मुझ पर ब़डी कृपा की, मेरे द्वारा किसी को कुछ सुख मिला है, इसमें उसका भाग्य ही कारण है, उसी के लिये वह वस्तु आयी है और भगवान ने मेरे द्वारा उसे वह चीज दिलवायी है, मेरा अपना कुछ भी नहीं है, मैं तो निमित्तमात्र हूं। मेरे लिये अभिमान करने का कोई भी कारण नहीं है।’
बात भी यही है कि हमारे पास विद्या, बुद्धि, तन, मन, धन, जो कुछ है, सब भगवान की धरोहर है, उनकी चीज है। उनको जहां जिस वस्तु की आवश्यकता हो वहां उस वस्तु को आदरपूर्वक प्रसन्न मन से उनके समर्पण कर देना ही हमारा धर्म है। जहां अकाल है, वहां वे अन्न मांगते हैं , जहां सूखा है, वहां जल चाहते हैं, जहां ब़ाढ में सब कुछ बह गया, वहां वे अन्नवस्त्र और आश्रय चाहते हैं। ऐसी अवस्था में हमारे पास उनका जो कुछ भी हो, तुरंत देकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करनी चाहिये। उन्हीं की चीज से उनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार जो भगवान की पूजा के भाव से दुःखी जीवों की सेवा करता है, उसे मुनिजनदुर्लभ साक्षात् भगवान की या भगवान के प्रेम की प्राप्ति होती है। और बुद्धिमानों को इसी भाव से सेवाकरनी चाहिये। जो अपनी क्रिया का ऊंचेसेऊंचा फल प्राप्त कर सके, वही तो बुद्धिमान है।
यहां पर एक प्रश्न होता है कि तब क्या संसार में दैवी संकटों का आना किसी प्रकार रुक नहीं सकता? इसका उत्तर यह है कि जब तक संसार है, तब तक इनका सर्वथा नष्ट होना तो असम्भव है, परंतु ये कम जरूर हो सकते हैं। जिस काल में दैवी संकट कम होते हैं, उसी को सत्ययुग कहते हैं और उसका कारण है हमारे अपने कर्म।
महर्षियों ने कहा है कि ‘जब देश,नगर और ग्रामों के शासक तथा उनकी देखादेखी प्रजाजन अधर्म में रत हो जाते हैं, काम, क्रोध, लोभ और अभियान के वश होकर असत्य, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, शिष्टों का अपमान और शास्त्र की अवहेलना करने लगते हैं, तब देवता उनकी रक्षा न करके उन्हें त्याग देते हैं। इसी से ठीक समय पर वर्षा नहीं होती, होती है तो कहीं अनावृष्टि और कहीं अतिवृष्टि। वायु ठीक नहीं बहता, भूमि विकारयुक्त हो जाती है, जल सूखा जाता है, औषध अपना स्वभाव छ़ोड देती है। लोभ और क्रोध की वृद्धि के कारण परस्पर भयानक युद्ध छ़िड जाते हैं, लोगों की आजीविका नष्ट हो जाती है, भूकम्प, वज्रपात और जलप्रलय आरम्भ हो जाते हैं।
धर्मविहीन मनुष्य धर्मभ्रष्ट होकर गुरु, वृद्ध, सिद्ध, ऋषि और पूज्यों का अपमान करके अहित साधन करते हैं और अन्त में उन गुरुआें के अभिशाप से भस्म हो जाते हैं।’
सच पूछिये तो आजकल यही हो रहा है। ऐसे संकट से बचने के लिये शास्त्रों में जो उपाय बतलाये गये हैं, उनका साररूप निम्नलिखित दस बातें हैं सत्य का पालन, दुःखी प्राणियों पर दया, तन, मन, धन से सात्विक दान, देवताआें की यथाविधि पूजा, सदाचरण, ब्रह्मचर्यपालन, शास्त्र और जितात्मा महर्षियों की आज्ञा का पालन, धर्मात्मा और सात्विक पुरुषों का सङ्ग, गोसेवा, गायों के लिये गोचरभूमि की व्यवस्था करना और भगवान् के नामरूपी मंत्रों के द्वारा आत्मरक्षा।
