श्री कृष्णदर्शन की साधना
इसमें कोई संदेह नहीं कि इन नेत्रों की सफलता नित्य अतृप्तरूप से उस नवीन नीलनीरजकान्ति श्यामसुन्दर की विश्वविमोहिनी रूपमाधुरी का दर्शन करने में ही है। परंतु जहां तक भगवत्कृपा से इन नेत्रों को दिव्य भाव नहीं प्राप्त होता, वहां तक ये नेत्र उस रूपछटा के दर्शन से व#ात ही रहते हैं। नेत्रों को दिव्य बनाकर उन्हें सार्थक करने का ‘सिद्धमार्ग’ उपर्युक्त ‘परम व्याकुलता’ ही है। जिस महानुभाव के हृदय में श्रीकृष्णदर्शन की तीव्रतम विरहाग्नि जल रही है, वह सर्वथा स्तुति पात्र है ।
विरहाग्नि प्रायः बाहर नहीं निकला करती और जब कभी वियोगवेदना सर्वथा असह्य होकर बाहर फूट निकलती है, तब वह उसके सारे पाप तापों को तुरंत जलाकर उसे प्रेम में पागल बना देती है। उस समय वह भक्त अनन्य प्रेम में मतवाला भक्त व्रजगोपियों की भांति सब कुछ भूलकर उस प्राणाधिक मनमोहन के दर्शन के लिये द़ौड प़डता है और अपनी सारी शक्ति और सारा उत्साह लगाकर उसको पुकारता है। बस, इसी अवस्था में उसे भगवान के दर्शन प्राप्त होते हैं। दर्शन उसी रूप में होते हैं, जिस रूप में वह दर्शन करना चाहता है एवं व्यवहार, बर्ताव या वार्तालाप भी प्रायः उसी प्रकार का होता है, जिस प्रकार का उसने पहले चाहा है।
ऐसी स्थिति को प्राप्त होने के लिये साधक को चाहिये कि पहले वह सत्सङ्ग के द्वारा भगवान के अतुलनीय महत्व को कुछ समझे और उनके निरंतर नाम जप तथा ध्यान के द्वारा अपने अंतर में उनके प्रति कुछ प्रेम उत्पन्न करे। ज्योंज्यों भगवतप्रेम से हृदय भरता जायेगा, त्योंहीत्यों वहां से विषय हटते चले जायॅंगे। यों करतेकरते जिस दिन वह अपना हृदयासन केवल परमात्मा के लिये सजा सकेगा, उसी दिन और उसी क्षण उसके हृदय में परम व्याकुलता उत्पन्न होगी और वह व्याकुलता अत्यंत तीव्र होकर भगवान के हृदय में भी भक्त को दर्शन देने के लिये वैसी ही व्याकुलता उत्पन्न कर देगी। इसके बाद तत्काल ही वह शुभ समय प्राप्त होगा, जिसमें भक्त और भगवान का परस्पर प्रत्यक्ष मिलन होगा और उससे भूमि पावन हो जायेगी।
मन की सौंदर्य लालसा को दबाइये मत, उसे खूब ब़ढने दीजिये, परंतु उसे लगाने की चेष्टा कीजिये परम सुन्दरतम् पदार्थ में। जो सौंदर्य का परम अपरिमित निधि है, जिस सौंदर्य समुद्र के एक नन्हें से कण को पाकर प्रकृति अभिमान के मारे फूल रही है और नित्य नयेनये असंख्य रूप धरधरकर प्रकट होती और विश्व को विमुग्ध करती रहती है आकाश का अप्रियतम सौंदर्य, शीतलमंदमुन्दसुगंध वायु का सुखस्पर्शसौंदर्य , अग्निजल पृथ्वी का विचित्र सौंदर्य, अनंत विचित्र पुष्पों के विविध वर्ण और सौरभ का सौंदर्य, विभिन्न पक्षियों के रंगबिरंगे सुखकर स्वरूप और उनकी मधुर काकली का सौंदर्य, बालकों की हृदयहारिणी माधुरी, ललनाआें के ललित लावूय तथा मातापत्नी मित्र आदि का मधुर स्नेह सौंदर्यये सभी एक साथ मिलकर भी जिस सौंदर्यसुधासागर के एक क्षुद्र सीकर की भी समता नहीं कर सकते, उस सौंदर्य राशि को खोजिये। उसी के दर्शन की लालसा जगाइये, सारे अङ्गों में जगाइये। आपकी बुद्धि, आपका चित्तमन, आपकी सारी इन्द्रियाँ, आपके शरीर के समस्त अङ्गअवयव, आपका रोमरोम उसके सुषमा सौंदर्य के लिये व्याकुल हो उठे। बस, यह कीजिये । फिर देखिये, आपकी साैेंदर्य लालसा आपको किस चिन्मय दिव्य सौंदर्यसाम्राज्य में ले जाती है। अहा ! यदि आपको एक बार उसकी जरा सी झांकी भी हो गयी तो आप निहाल हो जाइयेगा। फिर सौंदर्य लालसा मिटानी नहीं होगी। वह अमर हो जायेगी और इतनी ब़ढेगी इतनी ब़ढेगी कि मुक्ति सुख को भी खोकर स्वयं जीतीजागती बनी रहेगी और आप फिर उस सौंदर्यसमुद्र में नित्य डूबते उतरते रहेंगे। वह ऐसा सौंदर्य है कि जिसे दिनरात अनंत काल तक अविरत देखते रहने पर भी तृप्ति नहीं होती, दर्शन की प्यास कभी मिटती ही नहीं, ‘अंखियाँ हरिदरसन की प्यासी’ ही बनी रहती हैं। प्यास के बुझने की तो कल्पना ही नहीं, वरं ईंधनयुक्त घृत की आहुति से ब़ढती हुई अग्नि की भांति उत्तरोत्तर ब़ढती हुई वह अनंत की ओर अग्रसर होती रहती है। पर यह प्यासयह दर्शन की ब़ढी हुई लालसा दर्शन से भी अधिक सुखदायिनी होती है।
यह वह सौंदर्य है, जिसे देखकर मुनियों के मरे हुए मनों से भी जीवन का संचार हो जाता है।
श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीश्रीराधिकाजी कहती हैं
नवाम्बुदलसदद्युतिर्नवतडिन्मनोज्ञाम्बरः
सुचित्रमुरली स्फुरच्छरदमन्दचन्द्राननः।
मयूरदलभूषितः सुभगतारहारप्रभः
स मे मदनमोहनः सखि तनोति नेत्रस्पृहाम।।
‘सखी ! नव जलधर की अपेक्षा जिनकी सुन्दर कान्ति है, नवीन विद्युतमाला से भी अधिक चमकीला जिनका मनोज्ञ पीताम्बर है, जिनका वदनचन्द्र निर्मल शारदीय पूर्ण चन्द्रमा की अपेक्षा भी समुज्जवल तथा चित्रविचित्र सुन्दर मुरली के द्वारा सुशोभित है,जो मयूरपिच्छ से सुभूषित हैं और जिनके गले में निर्मल कांतियुक्त श्रेष्ठ मोतियों की माला चमक रही है, वे मदनमोहन मेरे नेत्रों की दर्शन स्पृहा ब़ढा
