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महाजीवन है मुर्त्यु

swatanrravartha  Mon, 21 Dec 2009, IST

महाजीवन है मुर्त्यु

मरण तो जीवन की अनिवाय घटना ह। जिसे टालना सभव ही नहीं, बचना सभव ही नहींउससे डरना ही यों। काल हमारी जिंदगी का ार कब खटखटा दे इसका कोइ ठिकाना नहीं। काल आए अचानक हमारी जिंदगी मे इसके पहले ही हमें उसके वागत के लिए तयार रहना चाहिये। अत सवर जाये तो पूरा जीवन सवर जाये आर अत बिगड जाये तो पूरा जीवन यथ गया। इसलिए अत भला सो सब भला। मरण कुप नहीं ह, मरण कूर नहीं होता, मरण सुदर होता ह। मरण के पीछे भु की बडी कणा समायी ।

मरण जीवन का विरोधी नहीं ह। मरण पूरक ह। मरण न होता तो जीवन अपूण आर नीरस होता। जम आर मरण दो बिदु ह, इहीं के बीच जीवन रेखा खिंचती ह। मरण जीवन का विश्राम ह। दिन भर का थका य रा को नाि चाहता ह। जिंदगी भी तो हमारी थकती ह। थकी जिंदगी को विश्राम मिलता ह चिर नाि में। चिर नाि विश्राम ह जीवन का, तो फिर डरते यों हो चिर।

मरण एक नये में वेश ह। मरण का अथ ह एक कक्ष से दूसरे कक्ष में वेश कर जाना या एक भवन छोडकर दूसरे भवन में जाना। यान रहे भवन परिवतन हो रहा ह, य तो वही ह। ऐसे ही शरीर बदल रहा ह, आमा तो वही ह, निय शावत अक्षुूण आर अपरिवतनीय। मरण का अथ टूटना नहीं, मिटना नहीं, केवल अय हो जाना ह। हमारी थूल आखें उसे देख नहीं पाती। परतु वह ह, पूरे अतिव में ह। जम आर मरण दो तट की तरह ह। जिनके बीच काल की सरिता वाहित होती ह। श्री भागवत कथा सेतु बनकर कट हइ ह जो जम के तट को मरण के तट से जोड देती ह। इस कार मरण जम का विरोधी नहीं ह। मरण जीवन का पूर।

मरण के बिना जीवन अधूरा ह। अरे बचपन आया आर मर गया। बचपन न मरता तो जवानी कसे आती। किसी ने बचपन के मर जाने पर शोक मनाया या। ऐसे ही जवानी भी तो मर जाती ह। न मरती जवानी तो बुढापा कसे आता। अब बुढापे को भी मर जाने दो। इस बुढापे में ही तो नया जीवन महाजीवन छीपा ह। तो फिर बुढापे के मरने पर रोते यों हो। मिट जाने दो बुढापा आर आने दो नया जीवन। परतु हम नया जीवन तो चाहते ह आर साथ में बुढापे को भी बचा लेना चाहते । दोनों एक साथ नहीं चल सकता।

मरण का रहय पता चलते ही हम अमरव की ओर बढ जाते ह। तब मरण का भय आर मरण की पीडा से छुटकारा मिल जाता ह। तब मरण कुप नहीं सुदर लगता ह। तब वह महाजीवन बन जाता ह। तब मरण आनद का तो ह। तब मरण यितम की बाकीझाकी के दशन का ार खोल देता ह। तब डर नहीं लगता मरण से। आलिंगन का भाव ाणों में भर जाता ह। तब किसी कार के सुरक्षाचक की आवयकता नहीं पडती। सेनायें यथ हो जाती ह, सगठन आसगिक हो जाते ह। तब न कोइ शोषक होता ह आर न कोइ शोषित। तब समरसता, सरसता भरा यह ससार फूल बगिया की तरह महक उठता।

मयु के बाद जम से पूव इस जगत में यदि मयु ह कहीं तो अज्ञान ह, अज्ञान के कारण ही मयु ह, अज्ञान के अतिरि आर कोइ मयु नहीं ह, अथात अज्ञान ही मयु ह, यदि अज्ञान ही मयु ह तो ज्ञान अमत होना चाहिए। यदि अज्ञान मयु ह तो इसका मतलब तो यही हआ कि मयु कही ह ही नहीं, ज्ञान के अभाव में मयु आती ह। अधेरे में अज्ञान में खडे होने के कारण मयु मालूम पडती ह। मयु इस कार की असभव घटना ह, जो हो ही नहीं सकती, जो ना कभी हइ, ना ही कभी होगी। फिर भी तिदिन मयु मालूम पडती ह, दिखती है।

हमारे चारों ओर पास पडोस में लोग मरते है। मारे जाते ह। यह सब ज्ञान के अभाव में ही दिखते ह, जो नहीं मरता वह मरता हआ सा दिखता ह। इसलिए वतुत अज्ञान ही मयु तिरोहित हो जाती ह आर ज्ञान ही शेष रहता ह। कभी विचार करें कि किसी को मरते देखा ह, हम कहेंगे, अवय देखा ह, बहत बार देखा ह, निय देखते ह, परतु यह मयु होते देखना नहीं है मरने की किया वातव में नहीं दिखायी पडती, जो दिखाइ पडती ह वह जीवन के विदा होने की किया ह, मरने की नहीं ह। ठीकवसे ही जसे सूय अत हआ सया हइ, सूर्योदय हआ ात हो गया।

ठीक शद उपयोग किया ह, मयु के लिये निवाण, निवाण के लिए अथ किया गया ह, दीपक का बुझना।

मयु का अथ दीपक का बुझ जाना, बब बुझा या तो सारी वुित तो नहीं चली गइ, वह विमान ह। पुन बटन दबाये तो जल जायेगा। इसी कार बस दीपक बुझ गया, कोइ मरता नहीं, इसी मयु को निवाण, गोलोकवासी, वगवासी, शरीरव, पचतव आदि नामों से जानते ह। जीवन की योति दिखाइ पडती थी, अब नहीं दिखाइ पडती, देखने के क्षे से विदा हो गइ। अय में लीन हो गइ, फिर कट हो जायेगी, फिर लीन हो जायेगी। यह कटअकट का कम अनत तक चल सकता ह। बशर्ते जब तक इस जीवन की योति को पहचान न ले कि कट भी म ही ह आर अकट भी म ही ह। वह जो प के अदर छिपा हआ यथाथ सय ह, वह न तो कट में कट होता ह न अकट में अकट होता ह। न जीवन में जीवित होता ह, न मयु में मरता ह। तब अमत का अनुभव होगा।

हम ाय अय को मरतेबुझते देखकर हिसाब लगा लेते ह कि हम भी मरेंगे,लेकिन कभी किसी मरे हए से पूछा जाए कि मर गये, लेकिन वह उार देने के लिए ह ही नहीं यहा। इसीलिए तो मान लेते ह कि उार यदि मिलेगा भी तो हा में ही मिलेगा।

हम जसा भी जीवन जीते ह, उसका अतिम फल मयु के अतिरि आर कुछ नहीं होता। हमें ाय लगता ह कि मयु एक दिन अचानक आ जाती ह, पर यह सही नहीं ह। मयु हर दिन विकसित होती ह। मयु तो जम लेने के साथ ही विकसित होने लगती ह। जम के बाद से ही हर क्षण हम मरना शु कर देते ह। यह किया चलती रहती ह आर मयु के दिन जाकर पूरी होती है।

जमदिन को सता का पव मानते ह। पर हम यह नहीं समझ पाते ह कि हर जमदिन के साथ हम अपनी जीवनयाा की समा की ओर बढ रहे ह। जमदिन का आयोजन तीक ह कि हम एक भमजाल में फसे ह।

मयु कोइ बाय घटना नहीं ह। ऐसा नहीं ह कि हम अपना जीवन मजे से जीते रहते ह आर मात कहीं बाहर से आकर हमें दबोच लेती ह। हम सब इसी तरह से सोचते आए ह कि मयु का सदेशवाहक यमदूत आता ह आर हमारे शरीर से ाणों को खींच ले जाता है।

हम मानते आए ह कि दुख कोइ आर लाता ह, इसलिए मयु भी कोइ आर लाता होगा। पर असलियत यह ह कि मयु कोइ आर नहीं लाता। मयु तो एक आतरिक घटना ह। यह हमारे भीतर ही घटित होती ह।

हमें समझना होगा कि मयु हमारी काया में कहीं बाहर से वेश नहीं करती। इसके उलट वह तो हमेशा हमारे अदर ही माजूद रहती ह। हम भीतर ही भीतर मिट जाते ह। बिखर जाते ह। हमारे शारीरिकमानसिक यत टूट जाते ह। आखें देखदेखकर मिटती ह। कान सुनसुनकर न होते ह। लेलेकर समा हो जाती ह। इसका कारण यह नहीं ह कि बुढापे में आखें कम देखती ह। या कानों में नाद की वनि शूय होती चली जाती ह। या जीभ से वाद समा हो जाता ह। सच तो पूरा जीवन इन चीजों का उपयोग करतेकरते घिस जाता ह। हमारे सचालक य कमजोर आर शूय हो जाते ह। एकएक करके हम विभि पों में मरते रहते है।

अब अगर हमें यह बात समझ में आ जाए कि मात एक लबी किया ह, जो जम से शु होती ह आर मयु पर खम होती ह, तो हम उसी क्षण जाग जाते ह। इस अहसास के बाद हमें अपने जीवन का पातरण कर लेना चाहिए। हमें समझ लेना चाहिए कि यह शरीर हमारा नहीं ह। वे सब चीजें, जो हमारे पास ह आर जिहें अपना मानकर हम गव करते रहते ह, वे यही छोड देनी ह। ये नवर ह। ये समा हो जाएगी। इस जीवन का जो सकारामक सव ह, हमें उसे अपनाना चाहिए।

इस सासारिक झूठ सच से परे एक चिरतन सय ह आर वह सय ह परमामा का नाम। परमामा का मरण करते रहना ही असली सय ह। जिस घडी हम इवर को भूलकर अपने अह में खो जाते ह, हम फिर पाप आर अनाचार के भमजाल में फस जाते ह। भु को जब हम याद रखते ह तो उसकी रची रचना के ति हमारा नजरिया एकदम ेमपूण, सदभावपूण होता ह। हम दूसरों के दुखदद से अपने को जोडते ह आर उहें दूर करने का यास करते ह। इसलिए एक पल भी इवर का विमरण नहीं करना चाहिए। मयु से सुखकर मिलन इवर के जरिए ही सभवजा

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