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रसवप श्रीकण आर भाववपा गोपाना

swatantravaarth  Mon, 21 Dec 2009, IST

gopini, swatantravaarthaरसवप श्रीकण आर भाववपा गोपाना

इन गोपियों की कसी महिमा ह! जिनका याग अयत कठिन ह, उन वजनों का तथा आयपथलोकवेद की श्रे मयादा का सहज परियाग करके इहोंने भगवान की पदवी कोउनके परम ेम को ा कर लिया ह, जिसको श्रुतिया निय ढूढती रहती है,पर पाती नहीं (नेतिनेति पुकारकर रह जाती) है।

वय भगवती लमीजी जिनकी पूजा करती रहती है, ब, शकर भति परम समथ देवता तथा पूणकाम, आमराम एव बडेबडे योगेवर अपने दय में जिनका चितन करते रहते ह, भगवान श्रीकण के उहीं दुलभ चरणारविदो को रासलीला के समय गोपानाआें ने अपने वक्षथल पर धारण किया आर उनका आलिन करके अपने दय के (चिरकालीन) ताप कोविरहवेदना को शात किया ! उन नदबाबा के वज में रहने वाली गोपानाआें की चरणधूलि को म बारबार नमका करता है।’

भगवान श्रीकण की भाति ही श्रीराधारानी का दिय ‘सदािनदवपु’ निय ह आर जसे भगवान श्रीकण का लीला से आविभाव होता ह, वसे ही यितम श्रीकण के सुख सपादनाथ आर लोकिक से यागमय परम ेम की दीक्षा शिक्षा देकर विव को पवि करने के लिये श्रीराधाजी का भी मलमय आविभाव हआ करता है

श्रीराधारानी ने तथा उनकी अभूता श्रीगोपानाआें ने अपने सवयागमय अनिवचनीय परम ेम के ारा ही रसमय भगवान श्रीकण के यथाथ वप के दशन का एव उनके यथाथ मिलन का साभाय ा किया। श्रुतियों के तथा महापुषों के निय अवेषणीय रासविहारी वजेनदन भगवान श्रीकण की परम दुलभ सवा ेमसेवा का सवापूण निय अधिकार ा किया। इस गोपी ेम या राधोम के यथाश यथाथ अनुकरण से ही इस दिय हो सकता ह आर वह श्रीराधारानी अथवा उनकी अभूता वजानाआें के आनुगयजनित अनुगह के बिना नहीं हो सकता,योंकि परम यागमय ेम की शिक्षा इस विषय जगत में तो सभव ही नहीं, साधनजगत में भी परम दुलभ है।

सभी में किसी न किसी कार की कामना वतमान रहती हभले ही वह ऊची से ऊची अपवग मोक्ष की कामना ही यों न हो। विशु ेमसेवा का वातविक वप तो ये श्रीगोपानाए ही हश्रीराधाजी ही ह। अत परम ेमवपिणी श्रीगोपानाआें के तथा परमोक श्रीकणेमिशिरोमणिवपा श्रीकण की दयेवरी निय निकुजेवरी महाभाववपा श्रीराधाजी के आनुगय से ही इस दिय ेम के वप का कुछ पता लग सकता ह आर ेमराय में वेश का अधिकार मिल सकता है।

श्रीराधाजी के यक्ष आनुगय की हमारी थिति न हो तो उनकी किंकरी किसी मजरी सखी का आनुगय करके सदािनदघनरस ेमविगह परम यितम श्रीकण की सेवा का साभाय ा करना चाहिये। आइये, एक साधक भ के साथ मिलकर उहीं की भाषा में हम मजरियों में अयतमा श्रीपमजरी की ाथना करें

श्रीपमजरि निजेवरयो पदाज

सेवामतरविरत परिपूरितासि।

वपादपङकजगता मयि दीनजता

विकिरसि वकपाभरेण।।

‘हे श्रीपमजरी! आप अपने वामी श्रीकण एव वामिनी श्रीराधा के चरणकमलाेेंं की विविध सेवाप अमत से नियनिरतर परिपूण रहती ह। देखेंवह दिन कब आता ह, जब आप मुझ दीनपर अपनी कपाभरी डालेंगी? मुझे तो आपके चरण कमलों का ही सहारा ह।’

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