भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप और अवतार के हेतु
इसके पचात एक दूसरे परम सुदर देदीयमान रथ में चतुभुज ,वनमालाविभूषित, अपार भाशाली जगपति भगवान विणु पधारे आर वे भी रथ से उतरकर भगवान श्रीराधिकेवर के शरीर में लीन हो गये।
स चापि लीनत̡व राधिकेरविगहे।।
इससे भी यही सि होता है कि भगवान श्रीकण साक्षात वय भगवान ह आर उनके इस वप में सबका तथा सबके लीलाकाया] का एक समावेश है। बववतपुराण में आता है कि इसके पचात भगवान श्रीकण ने देवी कमला लमी से मुकराते हए कहा‘देवि ! तुम कुडिन नगर में राजा भीमक के घर देवी वदर्भी के उदर से अवतरित होओ, म वहा जाकर तुहारा पाणिगहण कगा।’ तदनतर वहा पधारी हइ देवी पावती से भगवान ने कहा‘तुम ससिहारकारिणी महामाया हो, तुम अशप से वजधाम में जाकर यशोदा के गभ से अवतीण होओ। मानवगण नगर नगर भपूिवक तुहारी पूजा करेंगे।
तुहारे कट होते ही वसुदेव यशोदा के सूतिका गह में मुझे रखकर तुहें ले जायगे। फिर कस को देखते ही पुन तुम भगवान शिव के पास चली जाना। म पवी का भार उतारकर अपने धाम में लाट आऊगा।’ इसके बाद कान देवता किस नामप से कहा अवतार लेंगे विशिविशि देवताआें के लिये भगवान ने इसका निर्देश किया है। भगवान श्रीकण वयभगवान है, उनका दिय शरीर कमजनित ाकत या सिजिनित ‘निमाणशरीर’ नहीं है। वह ाकत शरीर से सवथा विलक्षण हानोपादानरहित दिय सदािनदमय भगववप ह। इसके चुर माण श्रीमागवत, महाभारत तथा अयाय गथों में उपलध ह। बववतपुराण में ही श्रीकण आर सनकुमार के वातालाप के एक सुदर स आता है। इसमें भगवान श्रीकण ने अपने को ाकत बतलाने की चो की ह आर सनकुमार ने उनके नों के उार में उनकी भगवाा सि की ह,उनके शरीर को साक्षात चिदानदमय भगवेह बतलाया ह आर ‘वासुदेव’ नाम का बडा ही विलक्षण अथ किया है। स इस कार है
एक बार बतेज से उासित सकडों बडेबडे ऋषिमुनीवर भगवान श्रीकण के दशन के लिये आये थे। फिर उस मुनि सभा में परम तेज पुज सवासुदर पाच वष के न बालक के प में श्रीसनकुमारजी पधारे। उहोंने आकर मुनियों से कुशल न करके कहा कि ‘श्रीकण से तो कुशल पूछना यथ ह। ये वय ही समत कयाण के बीच ह। अथवा इस समय इन परमामा श्रीकण का दशन ही आपलोगों के लिये कुशल है, कति से अतीत , निगुण निरीह, सवबीज आर तेज वप ये भगवान भों के अनुरोध से ही पवी का भार उतारने के लिये अवतरित हए है।’ इस पर भगवान श्रीकण ने उनसे कहा‘विवर ! जब शरीर धारीमा के लिये कुशल न अभीसित है, तब एक म ही कुशल पन का पा याेें नहीं है?’
शरीरधारिणापि कुशलश्रमीसितम।
तकथ कुशलपश्र मयि वि न विते।।
सनकुमारजी ने उार दिया‘भो ! शुभअशुभ सब ाकत शरीर में ही हआ करते है, जो शरीर निय है आर सारे कुशलों का बीज है, उसके लिये कुशल न निरथक ही है।’
शरीरे ाकते नाथ सतत च शुभाशुभम।
नियदेहे क्षेमबीजे शिव मनथकम।।
तब भगवान बोले‘विवर ! शरीरधारीमा ही ाकतिक माने जाते है, योंकि निया कति के बिना शरीर होता ही नहीं।’
यो यो विगहधारी च स स ाकतिक मत
देहो न विते वि ता निया कतिं विना।।
इसके उार में सनकुमारजी ने कहा‘भो! जो देह रजवीय के ारा उप होते है, वे ही ाकतिक माने जाते है। आप तो वय सबके आदि है, सबके बीज कारण है आर कति के नाथ है, वय भगवान है। आपका देह ाकतिक कसे हो सकता ह? आप वेदवणित समत अवतारों के निधान, सबके अविनाशी बीज, निय सनातन, वय योतिवप परमामा परमेवर है।’
रबिदूवा देहाते च ाकतिका मता।
कथ कतिनाथय बीजय ाकत वपु।।
इस पर श्रीकण ने पुन कहा ‘विवर ! इस समय म वसुदेव का पु हू, अतएव मेरा शरीर रजोवीयाश्रित ही ह, फिर म ाकतिक आर कुशलन का पा नहीं हू?’’
सात वासुदेवोऽह रवीयाश्रित वधु।
क#ाा न ाकतो वि शिवथमभीसितम।।
इस पर अत में सनकुमारजी बोले ‘नाथ ! ‘वासुदेव’ शद का अथ दूसरा है ) ‘वायु’ का अथ हजिसके लोमकूपों में अनत विव थित ह, वे सवनिवास महान विराट , पुष आर उनके जो ‘देव’ है वामी है , वे आप वय परमब ‘वासुदेव’। इसी ‘वासुदेव’ नाम चारों वेद, पुराण , इतिहास, आयान आदि वणन करते है। आपका शरीर रज वीय से बना है। , यह किस वेद में निपित है? ये सब मुनिगण यहा साक्षी है, धम भी सवसाक्षी है आर वेद तथा च सूय भी मेरे साक्षी है (आप सदािनदमयशरीर है)।
वासु सवनिवास विवानि यय लोमसु।
तय देव पर बा वसुदेव इतीरित।।
(बववत श्रीकण जम खड अ ८७)
इहीं साक्षात वय भगवान श्रीकण ने ापर युग के अवतीण होकर इस धरा को धय किया था।(कमश:)
