सौन्दर्य की शत्रुशीतला
शीतला की भी जयंती मनायी जाती हैवही शीतला जिसे आम आदमी चेचक के नाम से जानता रहा है और यह सुनकर आपको ऐसा नहीं लगता कि भारतवासियों का अंधविश्वास सचमुच अपनी सीमाआें को पार कर चुका है? लेकिन किसी रोगऔर खासतौर पर एक ऐसे रोग की जयंती मनाने के अर्थ क्या हैं आखिर जो संक्रामक है, जिसने इतिहास में अब तक सर्वाधिक शिशु हत्याएं की हैं और सौंदर्य से जिसकी जन्मजात शत्रुता रही है?
हिन्दूधर्म प्रत्येक पदार्थ, प्रत्येक भाव और प्रत्येक क्रिया का संचालक किसी न किसी देवता को मानता है, इसीलिये प्रत्येक रोग का भी एक अधिदेवता माना गया है। यह समाज का अज्ञान ही कहा जायेगा कि एक ओर वह जहां ज्वर तथा हैज़े जैसे रोगों की तो चिकित्सा कराता है लेकिन चेचक को देवी का रूप मानते हुए उसकी दवादारू करने से दूर भागता है। अन्यथा जिस तरह चेचक की देवी शीतला हैं उसी तरह ज्वर तथा अन्यान्य रोगों के देवताआें का भी वर्णन मिलता है हमारे पुराणों में किसी रोग को देवता का रूप प्रदान करने के यह अर्थ कदापि नहीं होते कि उसकी चिकित्सा न करायी जाये ! संक्रामक रोग चूंकि अपेक्षाकृत अधिक आतंक उत्पन्न करते हैं, इससे अशिक्षित समुदाय को उनसे दैव कोप का आभास मिलता है।
अनेक ग्राम्य अंचलों में चेचक की भांति हैजे को भी देवी का कोप मान कर उसे संतुष्ट करने के लिये पूजापाठ आयोजित किये जाते हैं। लेकिन चेचक की चिकित्सा न करायी जाय यह भावना उन अंचलों में अब भी बहुत व्यापक है और बद्धमूल भी। इस अंधविश्वास को दूर करना बहुत जरूरी है।
महाराभारत तथा विविध पुराणों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि विश्व के प्राय ः सभी ब़डे रोग किसी न किसी महायुद्ध के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुए थे। युद्ध में रक्तमांसादि की स़डन के कारण नयेनये संक्रामक रोग उत्पन्न हों यह सहज स्वाभाविक है, और प्रथम महायुद्ध के फलस्वरूप विश्व भर में जो सर्वनाशी ज्वर फैला था उसका भयावह संहारक स्वरूप भारत की पुरानी प़ीढी अब भी नहीं भूल पायी है। प्राचीन इतिहास का अन्वेषण करने पर इस तरह की अनेक महामारियों की उत्पत्ति के सूत्र जाने जा सकते हैं। उदाहरणार्थ अर्जुन ने राजा विराट की गोसम्पदा की रक्षा करने के निमित्त कौरवों के साथ जो युद्ध किया था उसके परिणामस्वरूप पशुआें के मध्य खंगवा नामक एक महामारी उत्पन्न हो गयी थीं। इस बीमारी में पशुआें के खुरों के बीच एक ऐसा घाव हो जाता है जिससे वह चल फिर नहीं सकते। इस संक्रामक बीमारी से अब भी हर साल हजारों पशुआें की मृत्यु हो रही है।
लेकिन इस स्थल पर तो हमें शीतला संबंधित बातें ही करनी हैं। यह महामारी देवी के महिषासुर और रक्तबीज आदि असुरों से युद्ध करते समय उत्पन्न हुई थी। अनेकानेक अन्य महमारियां भी उसी युद्ध की उपज प्रतीत होती है जैसे उस महायुद्ध में एक पक्ष में विविध रोगों को उत्पन्न करने का ठेका ही ले लिया था। शीतला भी उसी युद्ध की उत्पत्ति है, और कब, किस दिन से उसका प्रारंभ हुआ यह उसकी जयंती स्वतः बता देती है। लेकिन किसी महामारी की जयंती हम मनायें ही क्यों? शायद इसीलिये कि उस जयंती के माध्यम से ही हम इस बात का स्मरण रख सकते हैं कि संबंधित महामारी से अपनी रक्षा हम कैसे कर सकते हैं।
उलटे तवे जैसा काला रंग , बांससदृश लम्बा शरीर, देह इतनी दुर्बल कि लगे जैसे उसकी हड्डी और नसों पर चम़डा म़ढ दिया गया होबिल्कुल कंकालप्राय , समस्त शरीर में चेचक के अनगिनत गड़्ढे और उन गड़्ढों में धंसे गोल, लाल नेत्र, श्वेत केश, रक्तिम परिधान, विशालकाय खून नख, और उसके ऊपर गधे की सवारीदेखकर लगे जैसे विश्व के सारे सौन्दर्य को नोच कर खा जायेगी वह क्रोध, भयंकरता की प्रतिमूर्ति, वैशाखनन्दन, अर्थात गर्दभ, इसी देवी का वाहन होने के कारण देवी वाहन कहा जाता है। इस देवी का सर्वाधिक प्रिय आहार है निम्बेपत्र अर्थात नीम की पत्तियां, उसे जल भी निम्बबंधयुक्त ही अच्छा लगता है।
अब इस देवी की जयंती की बात कीजिए। आयुर्वेद के अनुसार शीतला के प्रकोप में पित्त प्रधान रहता है। उसका शीतोपचार अपेक्षित है। यदि पूरे साल में एक दिन भी कोई आदमी समुचित विधि से नीम की पत्तियों का सेवन कर ले तो कम से कम उस वर्ष उस पर शीतला देवी का प्रकोप नहीं हो सकता। नीम के सेवन के लिये ग्रीष्म और वर्षा ऋतुआें को सर्वोत्तम माना गया है। इन ऋतुआें में किसी भी दिन उसकी पत्तियों को खाया जा सकता है। ऐसी अवस्था में हमारे समाज के विधायकों ने अगर कोई एक दिन उस क्रिया के लिये निर्द्धारित कर दिया, तो उसमें आश्चर्य की बात ही क्या?
शीतला के अपने नाम के पार्श्व में भी बहुत से संकेत निहित हैं, और जो कुछ शेष बच रहता है उसे देवी के वाहन और उसकी रूचियों के माध्यम से सहज ही जाना जा सकता है। इसी से निम्बपत्र सेवन के साथ कुछ पथ्य भी निर्दिष्ट किये गये हैं और वह पथ्य देवी के नाम के अनुरूप ही पूरी तरह शीतला और नमकरहित हैं। शीतला अष्टमी के भोर में ही आप लगभग आधा तोला नीम की पत्तियों को कालीमिर्च के साथ उदरस्थ कर लीजिएपत्तियों को चबाना अगर संभव न हो तो पीस कर उसका शर्बत भी बनाया जा सकता है, या फिर भंग जैसी गोलियां भी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ तो हर सुबह नियमित रूप से नीम के शर्बत का सेवन करते थे। बच्चों के लिये उनकी अवस्था के अनुसार आधी या चौथाई खुराक ही पर्याप्त है। उस दिन आपको नमक से भी दूर रहना है और ऐसे किसी आहार से भी अपने को बचाना है जिसमें चूल्हे की ताजगी मौजूद हो। पूरे दिन शीतवीर्य पदाथा] को शीतल करके लेते जाइए, और शीतलादेवी चूंकि निम्बप्रिय हैं, इससे सिर्फ इतना भर करने से वह वर्ष भर के लिये आपसे संतुष्ट हो जायेंगी। इतना ही नहीं, बरसात में आने वाले मलेरिया जैसे ज्वरों से भी आपका अंशतः बचाव हो जायेगा और फिर अपना पूरा साल आप सानन्द समंगल व्यतीत कर सकेंगे।
छोटे, दूधपीते बच्चों को नीम की पत्ती नहीं पिलायी जा सकतीदो तीन साल के बालक भी उस क़डवे पेय को पसंद नहीं कर सकते। शिशु सहज रूप से सुंदर होता है, और शीतला सौन्दर्य की जन्मजात शत्रु है। इसी से बच्चों पर चेचक का आक्रमण हमेशा अधिक होता रहा है। ऐसे बच्चों की रक्षा का उपाय है गधी का दूध। शीतला अष्टमी की सुबह किसी सीपी में लेकर एक तोला दूध उसे पिला दें तो पूरे साल शीतला से उसकी रक्षा हो जायेगी। चेचक निकलने पर भी गधी का दूध रोगी के लिये एक औषध होता है।
अब तो चेचक का प्रकोप प्रायः शून्य हो चला है, लेकिन जिस काल में उसकी प्रबलता थी उस काल में रोगी को नीम की पत्तियों पर शयन कराना एक अनिवार्य कृत्य माना जाता था। उसके पीने के पानी में भी पर्याप्त मात्रा में निम्बपत्र के रस का मिश्रण किया जाता था और नीम की टहनियों वाले पंखे से उसे हवा दी जाती थी। इस उपचार से रोगी के भीतर का दाह शांत होता था, उसके कष्ट में कमी आती थी और चेचक के दाने तीव्रता से ठीक होने लगते थे। चेचकग्रस्त रोगी के आसपास पूरी शुद्धता, स्वच्छता रखी जाये, उसके कमरे में सुगंधित धूप जलायी जाये, इसे सभी लोग अच्छा मानते थे। इन सब कृत्यों से निश्चित ही शीतलादेवी को संतुष्टि प्राप्त होती होगी, इसी से रोग में लाभ भी होता था।
शीतला सप्तमी व अष्टमी के अवसर पर शीतला की पूजा उनके आवाहन के लिये नहीं बल्कि उन्हें अपने से दूर रखने के लिये ही की जाती है, और भारतीय पुराणों में वर्णित वह शायद अकेली ऐसी देवी हैं जिनका सान्निध्य हमारे लिये सुखकर नहीं।
