शीतला माता की पूजा का माहात्म्य
शीतला माता का व्रत व पूजा चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी व अष्टमी को की जाती है। जहां कुछ लोग इसे सप्तमी को करते हैं वहीं कुछ अष्टमी को भी करते हैं। इस तरह यह दोनों तिथियां मुख्य मानी गयी है किंतु स्कन्द पुराण के अनुसार इस व्रत को चार महीनों में करने का विधान है।
इसमें पूर्वविद्धा अष्टमी (व्रतमात्रेऽष्टमी कृष्ण पूर्वा शुक्लाष्टमी परा) ली जाती है। चूँकि इस व्रत पर एक दिन पूर्व बनाया हुआ भोजन किया जाता है अतः इस व्रत को बस़ौडा, लस़ौडा या बसियौरा भी कहते हैं। शीतला को चेचक नाम से भी जाना जाता है।
शीतला माता की व्रत कथा
एक बार एक राजा के इकलौते पुत्र को शीतला (चेचक) निकली। उसी के राज्य में एक काछीपुत्र को भी शीतला निकली हुई थी। काछी परिवार बहुत गरीब था, पर भगवती का उपासक था। वह धार्मिक दृष्टि से जरूरी समझे जाने वाले सभी नियमों को बीमारी के दौरान भी भलीभाँति निभाता रहा। घर में साफसफाई का विशेष ख्याल रखा जाता था। नियम से भगवती की पूजा होती थी। नमक खाने पर पाबंदी थी। सब्जी में न तो छौंक लगता था और न कोई वस्तु भुनीतली जाती थी। गरम वस्तु न वह स्वयं खाता, न शीतला वाले ल़डके को देता था। ऐसा करने से उसका पुत्र शीघ्र ही ठीक हो गया। उधर जबसे राजा के ल़डके को शीतला का प्रकोप हुआ था, तबसे उसने भगवती के मंडप में शतचंडी का पाठ शुरू करवा रखा था। रोज हवन व बलिदान होते थे। राजपुरोहित भी सदा भगवती के पूजन में निमग्न रहते । राजमहल में रोज क़डाही च़ढती, विविध प्रकार के गर्म स्वादिष्ट भोजन बनते। सब्जी के साथ कई प्रकार के मांस भी पकते थे। इसका परिणाम यह होता कि उन लजीज भोजनों की गंध से राजकुमार का मन मचल उठता। वह भोजन के लिए जिद करता। एक तो राजपुत्र और दूसरे इकलौता, इस कारण उसकी अनुचित जिद भी पूरी कर दी जाती। इस पर शीतला का कोप घटने के बजाय ब़ढने लगा। शीतला के साथसाथ उसे ब़डेब़डे फ़ोडे भी निकलने लगे, जिनमें खुजली व जलन अधिक होती थी। शीतला की शांति के लिए राजा जितने भी उपाय करता, शीतला का प्रकोप उतना ही ब़ढता जाता।
क्योंकि अज्ञानतावश राजा के यहाँ सभी कार्य उलटे हो रहे थे। इससे राजा और अधिक परेशान हो उठा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इतना सब होने के बाद भी शीतला का प्रकोप शांत क्यों नहीं हो रहा है। एक दिन राजा के गुप्तचरों ने उन्हें बताया कि काछी पुत्र को भी शीतला निकली थी, पर वह बिल्कुल ठीक हो गया है। यह जानकर राजा सोच में प़ड गया कि मैं शीतला की इतनी सेवा कर रहा हूँ, पूजा व अनुष्ठान में कोई कमी नहीं, पर मेरा पुत्र अधिक रोगी होता जा रहा है जबकि काछी पुत्र बिना सेवापूजा के ही ठीक हो गया। इसी सोच में उसे नींद आ गई। श्वेत वस्त्र धारिणी भगवती ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर कहा‘हे राजन् ! मैं तुम्हारी सेवाअर्चना से प्रसन्न हूँ। इसीलिए आज भी तुम्हारा पुत्र जीवित है। इसके ठीक न होने का कारण यह है कि तुमने शीतला के समय पालन करने योग्य नियमों का उल्लंघन किया।
तुम्हें ऐसी हालत में नमक का प्रयोग बंद करना चाहिए। नमक से रोगी के फ़ोडों में खुजली होती है। घर की सब्जियों में छाेैंक नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इसकी गंध से रोगी का मन उन वस्तुआें को खाने के लिए ललचाता है। रोगी का किसी के पास आनाजाना मना है क्योंकि यह रोग औरों को भी होने का भय रहता है। अतः इन नियमों का पालन कर, तेरा पुत्र अवश्य ही ठीक हो जाएगा।’ विधि समझाकर देवी अंतर्धान हो गई। प्रातः से ही राजा नेे देवी की आज्ञानुसार सभी काया] की व्यवस्था कर दी। इससे राजकुमार की सेहत पर अनुकूल प्रभाव प़डा और वह शीघ्र ही ठीक हो गया।
शीतला माता की पूजा व
व्रत का फल
* इस व्रत को करने से व्रती के कुल में दाहज्वर, पीत ज्वर, विस्फोटक दुर्गंधयुक्त फ़ोडे, समस्त नेत्र रोग, शीतला की फुंसियों के चिन्ह और शीतलाजनित सर्वरोग दूर होते हैं।
* इस व्रत के करने से शीतला माता सदैव संतुष्ट रहती हैं।
शीतला माता का स्वरूप
शीतला स्तोत्र में शीतला का जो स्वरूप बताया गया है, वह शीतला के रोगी के लिए अत्यंत हितकारी है
वन्देऽहं शीतलां देवीं रासमस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनीकलशोवेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्।।
अर्थात शीतला दिगम्बरा हैं, गर्दभ पर आऱूढ रहती हैं। सूप (छाज), झाडू और नीम के पत्तों से अलंकृत होती हैं तथा हाथ में शीतल जल का कलश रखती हैं।
शीतला के राेेेेेगी क्या न करें
* इस रोग का प्रकोप जिस घर में होता है, वहाँ अन्नादि की सफाई व झाडू लगाना वर्जित है।
* रोगी को गरम वस्तुआें तथा खाद्य पदार्थों से दूर रखें।
* रोगी को तले खाद्य पदार्थ न दें।
* रोगी को नमक भी नहीं देना चाहिए।
शीतला रोग का उपाय
* वास्तव में शीतला के रोगी की देह में दाहयुक्त फ़ोडे हो जाते हैं, जिसके कारण उसे नग्नप्रायः रहना प़डता है। गधे की लीद की गंध से फ़ोडों की प़ीडा में आराम मिलता है।
* सूप व झाडू रोगी के सिरहाने रखते हैं।
* नीम के पत्तों के कारण रोगी के फ़ोडे में स़डन पैदा नहीं होती।
