ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या तेलंगाना मामला केन्द्र सरकार के गले की हड्‍डी बन गया है?

  • हाँ
  • नहीं
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप और अवतार के हेतु

Swatantra Vaartha  Sun, 7 Mar 2010, IST

भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप और अवतार के हेतु

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला में इन तीनों ही प्रयोजनों को भलीभांति सम्पन्न किया। भगवान ने मधुर व्रजलीला में वात्सल्यसख्यमधुर आदि विभिन्न रसवाले प्रेमीजनों को दिव्य प्रेमरससुधा का आस्वादन कराया और किया। यहां बीचबीच में ऐश्वर्यभाव का ग्रहण करके दैत्यों के प्राण हरणकर उन्हें मुक्ति प्रदान की। मथुरा और द्वारका की लीला में माधुर्य रस की अपेक्षा ऐश्वर्य का तथा प्रेम की अपेक्षा निष्काम कर्म और ज्ञान का परम विशुद्ध अमृत अधिक वितरण किया। ब़डेब़डे ऋषि मुनि, ज्ञानी अमलात्मा परमहंस महात्माआें को आकर्षित करके अपनी विशुद्ध भक्ति में नियुक्त किया।यह तो हुई स्वयं भगवान के तत्व, महत्व और नित्य रसमाधुरी की बात। पर यों भगवान श्रीकृष्ण के विलक्षण लीलाचरित में पूर्ण भगवत्ता और पूर्ण मानवता का एक ही साथ परमाश्चर्यमय सम्मलेन है। वे पूर्णतम भगवान हैं और पूर्णतम मानव हैं। उनके चरित्र में जहां एक ओर भगवत्ता का अशेष वैचित्र्यमय लीलाविलास है, दूसरी ओर वैसे ही मानवता का परम और चरम उत्कर्ष है। अनंत ऐश्वर्य के साथ अनंत माधुर्य, अप्रतिम अनंत शौर्य वीर्य के साथ मुनिमनमोहन नित्यनव निरुपम सौंदर्य, वज्रवत्‌ न्यायकठोरता के साथ कुसुमवत्‌ प्रेमकोमलता , नवनवराज्यनिर्माण काेैशल के साथ स्वयं राज्यग्रहण में सर्वथा उदासीनता, अनवरत कर्मप्रवणता के साथ सहज पूर्ण वैराग्य और उदासीनता, परम राजनीतिनिपुणता के साथ पूर्ण आध्यात्मिकता, सम्पूर्ण विषमता के साथ नित्य समता, सर्वपूज्यता के साथ सेवापरायणतायों अनंत युगपत्‌ आपातविरोधी भावों का पूर्ण और सहज समन्वय श्रीकृष्ण के जीवन में प्रत्यक्ष प्रकट है।

साथ ही जो लोग भगवान श्रीकृष्ण को भगवान न मानकर योगेश्वर , आदर्श महापुरुष, उच्चश्रेणी के निष्काम कर्मयोगी मानते हैं, उनके लिये भी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आदर्श जीवन में जो कुछ दिया है, वह इतना महान इतना विशाल, इतना उदार, इतना आदर्श, इतना अनुकरणीय है कि उसकी कहीं तुलना नहीं है। हम उनको प्रत्येक क्षेत्र में सर्वथा सर्वोच्च आसन पर आसीन पाते हैं। अध्यात्म, धर्म, राजनीति, रणकौशल, विज्ञान, कला,संगीत, नेतृत्व, सेवा, पारिवारिक जीवन, समाजसुधारकहीं भी देखिये, वे सर्वत्र सदा सबके लिये आदर्श, दिव्य आशा का निश्चित संदेश लिये, सफलता, कुशलता और अनुभूति से पूर्ण आचार्यपद पर प्रतिष्ठित हैं और स्वयं पथ प्रदर्शक बनकरलस्यं ही सुद़ृढ नौका के केवट बनकर सबको सब प्रकार की असुविधाआें और बन्धनों के अगाध समुद्र से सहज पार कर देने के लिये नित्य प्रस्तुत हैं।

नवनीरद नीलाभ कृष्ण तन परम मनोहर।

त्रिभुवनमोहन रूपराशि रमणीय सुभग वर।।

आपकी राय