प्रेमी समाप्त होते हैं, प्रेम नहीं
प्रेम रिश्ता नहीं है। प्रेम ज़ुडता तो है लेकिन संबंध नहीं बनाता। संबंध वह है जो समाप्त हो गया। संबंध संज्ञा है, पूर्ण विराम आ गया । अब कोई आनंद न रहा, कोई उत्साह नहीं रहा, सब कुछ समाप्त हो गया।
वादा निभाने के लिए तुम उसे ढोए चले जा सकते हो। तुम इसे ढो सकते हो क्योंकि यह सुखद है, सुविधाजनक है, आरामदायक है। तुम इसे ढो सकते हो क्योंकि और कुछ करने को नहीं है। तुम इसे ढो सकते हो क्योंकि यदि तुमने इसे छ़ोडा तो यह तुम्हारे लिए बहुत मुसीबत पैदा कर देगा।
संबंध का मतलब होता है जो पूर्ण हो गया, समाप्त हो गया, बंद हो गया। प्रेम कभी संबंध नहीं होता। यह सदैव एक सरिता है, बहती, कभी न समाप्त होने वाली। प्रेम पूर्णविराम नहीं जानता। यह किसी उपन्यास की तरह नहीं है जो एक स्थान पर प्रारंभ होता है और दूसरे स्थान पर समाप्त। यह एक ऐसी घटना है जो निरंतर जारी रहती है, प्रेमी समाप्त हो जाते हैं, लेकिन प्रेम जारी रहता है। यह एक सातत्य है। यह एक क्रिया है न कि संज्ञा। तो फिर हम क्यों संबंधित होने को संबंधों का रूप दे देते हैं? हम इतनी जल्दी में क्यों होते हैं? क्योंकि संबंधित होने में असुरक्षा है, और संबंध सुरक्षा हैं, निश्चितता है। ज़ुडना दो अजनबियों का मिलन है, शायद एक प़डाव और सुबह हम अलविदा कह देते हैं। कौन जाने कल क्या होने वाला है। लेकिन हम इतने भयभीत हैं कि इसे पक्का करना चाहते हैं, सुनिश्चित करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि भविष्य हमारे विचारों के मुताबिक हो, हम इसे अपनी सुनवाई की स्वतंत्रता नहीं देते। तो हम शीघ्र ही प्रत्येक क्रिया को संज्ञा बनाने में जुट जाते हैं। तुम किसी पुरुष या स्त्री के प्रेम में हो तो शीघ्र ही विवाह करने के बारे में सोचने लगते हो। इसे कानूनी कॉन्ट्रेक्ट बनाना चाहते हो। लेकिन क्यों? प्रेम में कानून कहां से आ गया ?
प्रेम में कानून इसलिए आ गया क्योंकि प्रेम है ही नहीं। यह मात्र एक स्वप्न है, और तुम जानते हो कि स्वप्न बिखर जाएगा। इससे पहले कि यह बिखर जाए कुछ ऐसा कर लो कि बिछ़ुडना असंभव हो जाए।
एक बेहतर जगत में, जहां ध्यान करने वाले लोग होंगे, धरती पर जागरण फैलेगा, लोग प्रेम करेंगे, गहन प्रेम करेंगे, तो प्रेम ज़ुडना मात्र होगा रिश्ता न होगा। और मैं यह नहीं कह रहा कि उनका प्रेम क्षणिक होगा। पूरी संभावना यह है कि उनका प्रेम तुम्हारे प्रेम से गहरा हो, उनकी घनिष्टता की गुणवत्ता उंचे स्तर की हो, उसमें काव्यात्मकता हो, भगवत्ता हो। और संभावना यह भी है कि उनका प्रेम तुम्हारे तथाकथित संबंध से अधिक समय तक चले। लेकिन इसे कानून के अनुबंध की, कोर्ट की, पुलिसवाले की आवश्यकता न होगी। ग्यारंटी आंतरिक होगी। वह हृदय की प्रतिबद्धता होगी। यह मौन सत्संग होगा। यदि तुम किसी के साथ रहने में आनंदित होते हो तो तुम उसके साथ और भी रहना चाहोगे। यदि घनिष्ठता तुम्हें आनंदित करती है तो तुम इस घनिष्ठता के और भी भीतर जाना चाहोगे।
और कुछ फूल ऐसे होते हैं जो लंबी घनिष्ठता के बाद ही खिलते हैं। कुछ मौसमी फूल भी होते हैंः छः महीने में ही वे धूप में खिल जाते हैं लेकिन छः माह बाद वे मुर्झा भी जाते हैं। और ऐसे फूल भी हैं जो वषा] लेते हैं खिलने के लिए। जितना समय लगता है उतनी ही गहराई आती है।
लेकिन यह एक हृदय की दूसरे हृदय के साथ प्रतिबद्धता होनी चाहिए। इन्हें शब्द भी नहीं देने चाहिए, क्योंकि शब्द देना इन्हें अपवित्र करना है। यह एक मौन प्रतिबद्धता होनी चाहिए, आंख और आंख के बीच,हृदय और हृदय के बीच, अंतस और अंतस के बीच। यह समझने की बात है, कहने की नहीं। चर्च या कोर्ट में जाकर शादी करना बहुत भद्दा लगता है। यह बहुत भद्दा है, अमानवीय है। इसका मात्र यह अर्थ है कि स्वयं उनका भरोसा नहीं है अपने भीतर की आवाज से ज्यादा वे एक पुलिसवाले पर भरोसा करते हैं। इसका अर्थ हुआ कि उन्हें अपने प्रेम पर आस्था नहीं, कानून में भरोसा है। रिश्तों को छ़ोडो, ज़ुडना सीखो। एक बार तुमने संबंध बनाए तो तुम एकदूसरे का कुछ समझते ही नहीं। यही बात सब प्रेमसंबंधों को बर्बाद करने का कारण बनती है। स्त्री समझती है कि वह पुरुष को जानती है और पुरुष समझता है वह स्त्री को जानता है । जानता कोई भी नहीं। दूसरे को जानना असंभव है, दूसरा रहस्य ही बना रहता है। और दूसरे को कुछ भी न समझना उसका अपमान करना है, उसका निरादर करना है। यह सोचना कि तुम अपनी पत्नी को जानते हो, बहुत कृतघ्न होना है। तुम स्त्री को जिस स्त्री को तुमने कल जाना था वह आज नहीं है। गंगा में बहुत पानी बह गया है,वह कोई और ही है बिलकुल भिन्न। उसमें फिर ज़ुडो, पुनः प्रारंभ करो, उसे मान कर ही मत चलो। वस्तु और व्यक्ति में यही अंतर है। कमरे में प़डा फर्नीचर तो वही है, लेकिन स्त्री और पुरुष वही नहीं है। पुनः खाजो,पुनः प्रारंभ करो। ज़ुडने से मेरा यही अभिप्राय है।
