मानव जीवन को गढता है अत्यात्मिक वातावरण
आयामिक वातावरण अपने आपमें बल प्रेरक शक्ति है। इसे उतरीय ेरणाआें का ऊजाघर भी कह सकते है। यहा से हर समय श्रे ेरणाओ का वुित वाह उफनता आर उमगता रहता है। इसके सपक में आने वाले लोग इन ेरणाआें के वुितपश से अपने जीवन के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए ेरित होते है। उहें एक नइ चतयता व जागकता की अनुभूति होती है। कुछ अछा कर गुजरने का भाव उसमें पवाहित होता है। यदि वे इस भाव को सही ढग से गहणधारण कर सकें तो उनका समूचा जीवन बदले बिना नहीं रहता।
आयामिक वातावरण ने अब तक असय जीवन बदले, गढे आर ढाले है। अगणित निकों ने इसके भाव से उकता पाइ है। यह सब किसी चमकार या फिर किसी जादूटोने की वजह से नहीं हआ, बकि आयामिक वातावरण के वज्ञानिक भावों से क्षुता महानता में बदली है। इस वज्ञानिक किया एव भाव के साय तो अनेकों है, पर इसकी वज्ञानिकता पर चचा चिंतन एव शोध ाय नहीं हो पाया है। अनगढ यवाेिं के इस युग में आयामिक वातावरण के वज्ञानिक भावों पर चिंतन निहायत जरी हो गया ह, ताकि यवि को सवारने वाली पुरातन वाि वतमान वज्ञानिक युग के अनुप अपनी नवफूति पा सके।
आयामिक वातावरण का निमाण श्रेतम विचारों, उतम भावनाआें एव परिकत ाण ऊजा के समिलित चुबकव से होता है। यह चुबकव जितना सघन होता है, आयामिक वातावरण की श उतनी ही बढ जाती ह। इसके विपरीत यह चुबकीय श जितनी कमजोर पडती है, उस वातावरण में आयामिक ऊजा उतनी ही निबल हो जाती है। जब कभी ,जिस किसी युग में जहा कहीं भी आयामिक वातावरण का निमाण अथवा विनाश हआ ह, इसी विधि से हआ ह। समय आर परिथिति के अनुप इसके कारण कुछ भी रहे हों।
तपचया की चड ाणऊजा जिस किसी थान पर सघन होती जाती है, वहीं आयामिक वातावरण का निमाण हो जाता है। वदिक महषियों से लेकर आधुनिक युग में महषि रमण, योगीराज श्री अरविंद ने तपचया के चड योगों से आयामिक वातावरण की स की ह। तपचया के विविध योग ही वे वज्ञानिक कियाए ह, जिनके परिणाम श्रेतम विचार, उतम भावनाआें एव परिकत व पचड ाणऊजा के प में घनीभूत होते है। तपचया की जो विधि इस परिणाम को जितनी अधिक सघन माा में देने मे सक्षम होती है, वह उतनी ही साथक मानी जाती है।
आयामिक वातावरण की स जितनी महवपूण ह, उसका सरक्षण उससे कहीं अधिक महवपूण ह, योंकि ऐसा न होने पर धीरेधीरे वह थान अपनी महाा खो देता ह। आयामिक वातावरण की ऊजा पूववत बनी रहे, इसके लिए आवयक ह कि वहा रहने वाले आर वहा आने वाले लोग अपने श्रे विचारों , श्रे भावनाआें एव अपने तप के लघु पयोगों की ऊजा का एक अश वहा समपित करते रहें। इस अशदान का भारी तिदान आयामिक उपलधियों एव विभूतियों के प में वह दिय वातावरण उहें वय ही देता रहता ह। इस वज्ञानिक सय को ही ाचीन महषियों ने तीथक्षे की मयादाआें के प में परिभाषित किया था।
श्रे कम, श्रे विचार एव श्रे भावनाए किसी भी आयामिक वातावरण की अनिवायता ह। इस विधि से वह वातावरण चिरकाल तक वसा ही ऊजावान बना रहता ह। यही ऊजा अपने सपक में आने वालों के लिए पबल ेरक श या टाग मोटिवेशन फोस के प में काय करती है।
वातावरण की ेरणाए यवि को गढने के लिए मुय तव ह, यह बात लगातार होने वाले मनोवज्ञानिक परीक्षणों से जानी जा चुकी ह। हा, यह सच ह कि इन ेरणाआें को येक य अपनी मन थिति, सकारों, वायों एव विचारों के अनुसार गहण करता ह आर फिर मन थिति एव परिथिति की अत किया के परिणामवप उसके यवि का निमाण होता ह। उसके यवि की विशेषताए अपना प आर आकार पाती ह। सामाय वातावरण मे यह थिति बडी मिलीजुली होती है, योकि यहा वाहित होने वाली ेरणाए भली होती है आर बुरी भी। परतु आयामिक वातावरण में यह थिति बदली हइ होती है, योकि यह अपने दिय पदनों के अनुप श्रे य गढने की कायशाला के प मे काम करता है।
इस कम में आयामिक वातावरण की कियाशीलता के दो आयाम होते ह। पहला श्रेतम विचारों, उतम भावनाआें एव परिकत ाणऊजा के प में वहा छाइ रहने वाली ेरणाओें का वुितवाह। हालाकि यह अय आयाम ह, फिर भी इसे सवेदनशील आर जागक लोग अपने अतिव में घुलता हआ महसूस करते ह। दूसरा आयाम वहा सचालित होने वाली गतिविधियों के प में सकिय होता है। इस य आयाम के मायम की जरत अय ेरणाआें के सेषण के लिए होती है।
ेरणाए य हो या फिर अय, सबसे पहले अपने सपक में आने वाले य के विचारत को भावित करती ह। उसके सोचनेसमझने के तारतरीके बदलती ह। मनोवज्ञानिक ढग से कहें तो यह बदलाव य की जागकता (अटेंशन) के अनुपात में होता ह। जिसकी जागकता जितनी बढीचढी ह, वह आयामिक वातावरण का उतना ही लाभ कमा लेता ह। यदि जागकता का पूण अभाव हो तो उसे वचित भी रहना पडता है।
कभी कभी जागकता कम होने की थिति में भी यदि वह य गतिविधियों में शामिल हो सका तो पहले उसकी जीवनशली अथवा यवहार के तारतरीके बदलते ह, बाद में असर चितन में पडता ह। इस सदभ में यदि मनावज्ञानिक शदावली का योग करें तो पहले ‘बिहेवियर माडीफिकेशन’ होता ह। परिथिति मन थिति के अनुप ये दोनों कियाए धीमे अथवा तीव गति से, किंतु साथसाथ भी चल सकती है।
यह सच ह कि उतरीय ेरणाआें का निरतर सपक उतरीय चिंतन को जम देता ह। इस उतरीय चिंतन अथवा सज्ञान से उतरीय चरि अथवा उ विशेषताआें वाले यवि का निमाण होता ह। इस यवि में वभावत ही धामिक सवेदना एव परोपकारिता जसी वाया समाइ रहती है। इसे वज्ञानिक शोधविधियों से जाचापरखा व सयापित किया जा सकता है। ऐसे यवि वाले य का यवहार सामजयपूण व श्रे हो, यह वाभाविक ही है। इस सय को अनेक सदर्भो एव अगणित सायों से सही पाया गया है कि आयामिक वातावरण श्रेतम मानव जीवन को गढने वाली योगशाला है।
