वेद समत वाणी का प्रबाव
वाणी की देवी वीणावादिनी मा सरवती है । कहते है कि श्रे विचारों से सप य की जुबान पर मा सरवती विराजमान रहती है। बोलने से ही सय आर असय होता ह। अछे वचन बोलने से अछा होता ह आर बुरे वचन बोलने से बुरा, ऐसा हम अपने बुजुगो से सुनते आए है।
बोलना हमारे सामाजिक जीवन की निशानी ह। हमारे मानव होने की सूचना है। बोलने से ही हम जाने जाते है आर बोलने से ही हम वियात या कुयात भी हो सकते है। एक झूठा वचन कइ लोगों की जान ले सकता है आर एक सा वचन कइ लोगों की जान बचा भी सकता है।
जन, बा आर योग दशन में सयक वाक के महव को समझाया गया ह। सयक वाक अथात ना यादा बोलना आर ना कम। उतना ही बोलना जितने से जीवन चलता है। यथ बोलते रहने का कोइ मतलब नहीं। भाषण या उपदेश देने से श्रे ह कि हम बोधपूण जीए, ऐसा धम कहता है।
वाक का सकारामक पक्ष यह है कि इस जग में वाक ही सब कुछ ह यदि वाक न हो तो जगत के येक काय को करना एक समया बन जाए। नकारामक पक्ष यह कि मनुय को वाक क्षमता मिली ह तो वह उसका दुपयोग भी करता ह कडवे वचन कहना, श्राप देना, झूठ बोलना या ऐसी बातें कहना जिससे की भमपूण थिति का निमाण होकर देश, समाज, परिवार, सथान आर धम की ताि गिरती हो।
आज के युग में सयमपूण कहे गए वचनों का अभाव हो चला है। इस युग को बहत आवयकता ह इस बात की कि वह बोलते व सोचसमझ लेें कि इसके कितने दुपरिणाम होंगे या इस का मनोवज्ञानिक भाव या होगा। सनातन हिंदू धम ही नहीं सभी धमा] में वाक सयम की चचा की गइ है।’ आइये हम जानते ह कि वेद समत वाणी या ह आर इसका भाव कसा होता है।
वदिक युग के ऋषियों ने वाणी को चार भागों में बाटा ह वखारी वाणी, मयमा वाणी, पयती वाणी आर परावाणी। ये वाणिया कठ, ऊव देश, दय आर नाभि से निसत होती है।
वखारी वाणीतिदिन के बोलचाल की भाषा वखारी वाणी है। यादातर लोग बगर सोचेसमझे बोलते है आर कुछ ऐसी बातें भी होती है जिसमें बहत सोचविचार की आवयकता नहीं होती।
मयमा वाणी कुछ विचार कर बोली जाने वाली मयमा कहलाती है। किसी सवाल का उार, किसी समया के समाधन आर भावावेश में या सोचसमझकर की गइ किसी किया की तिकिया पर सोच समझकर बोलने की आवयकता होती है।
पयती वाणी दयथल से बोली गइ भाषा पयती कहलाती है। पयती गहन, निमल, निछल आर रहयमय वाणी होती ह। उदाहरणाथ रामकण परमहस जसे बालसुलभ मन वाले साधुआें की वाणी।
परावाणी परावाणी दवीय होती है। निविचार की दशा में बोली गइ वाणी होती ह या फिर जब मन शूय अवथा में हो आर किसी दवीय श का अवतरण हो जाए। उदाहरणाथ गीता में दिया हआ अजुन को ज्ञान।
वेदज्ञ कहते है कि बहस या तक से विवाद का किसी भी कार से अत नहीं होता। सोचविचारकर , समझकर सवहित में बोलने से कइ तरह के सकट से बचा जा सकता है आर समाज में श्रे माहाल निमित किया जा सकता है। जो य वेदों की वाणी की रक्षा करता ह वेद वय उसकी रक्षा करते है।
वेदों की वाणी का भाव जिस पर रहता ह वहीं आय अथात श्रे कहलाता है। वेदों के ज्ञान को पढने आर समझने से य के मुख पर बतेज आने लगता है। वेदों का ज्ञान ही य को पयती आर परावाणी के योय बनाता है।
