भगवान श्रीकृष्ण का प्रकटे और आदर्श मधुर चरित्र का स्मरण
शरीर पर दिय पीताबर सुशोभित ह, जिसकी काति तपाये हए सुवण की सी है। आर जिसके कारण उसका श्रीविगह सादामनीयु घनघटा की दिय शोभा धारण किये है। मुखमडल झूलती हइ नील अलकावली से आवत है। शरीर से फूटती हइ रमियों ारा वह परम सुदर एव सुखदायक बालक भवन के अधकार का नाश कर रहा है। कमल के समान बडीबडी उसकी आखें है, श्रीआें पर श्रार के प में रगबिरगे बेलबूटों की रचना हो रही है आर वह परिपूणतम पुषाेाम परापर बालक अपनी प छटा से तिक्षण करोडों कामदेवों को मोहित करता हआ मधुरमधुर मुरलीवनि कर रहा ह।
भगवान के इस अपूव माधुरीसादयमय वप का दशन करके वसुदेवदेवकी सफलजीवन हो गये। उनके आनद का पार नहीं रहा। वसुदेवदेवकी के पाथनानुसार भगवान श्रीकण तुरत शिशुप हो गये आर वसुदेवजी उहें गोद में लेकर नदालय में पहच गये तथा बदले में योगमाया को ले आये। भगवान की विचि माया के भाव से सभी थानों के सभी लोग नािभिभूत हो गये, इसलिये इस रहय को कोइ न जान सका।
इसके बाद की श्रीकणलीला का वणन श्रीमागवत,बववतपुराण, विणुपुराण, बपुराण, हरिवशपुराण, महाभारत आदि अनेक गथों में विशदप में आ चुका ह। उसे जितना पढासमझा जाय, दयगम किया जाय, उतना ही परम मल है।
श्रीभगवान के सभी गुण परम आदश ह। निकाम कम का जो वलत उदाहरण भगवान श्रीकण ने अपनी लीला में सबके सामने रखा ह, वह अतीिय ह। रागेषरहित होकर धमयु में वा होना, हजारों अधर्मी नरेशो का विनाश करके उनके थान पर उहीं के वशजों को थापित कर देना, असय राय निमाता होकर भी किसी राय को वीकार न करके सबको समान भाव से ेमदान देते हए भी अयाय का समथन न करके सबको अधम का नाश करने की ेरणा देना आर ससार का सारा काय नाटक के रम#ा पर सुनिपुण अभिनेता की भाति सुसप करते हए ममता, आस, आशा, कामना से सवथा दूर रहकर येक काय को भगवान की मलपूजा के प में परिणत कर देने का सरल सहज साधन वय आचरण करके जगत के सामने रखना भगवान श्रीकण के लीलाचरि की विशेषता है।
भगवान का वदावनीय बालचरि तो परम मधुरतम वासय, सय आर माधुय की पवि लीलाआें से परिपूण ह। कहीं भी किसी भी देश के इतिहास में, किसी भी साहिय की स में, किसी भी काय के कपनाकानन में, सवथा में, सवथा ऐतिहासिक तय होते हए भी, यह अपनी कोइ समता नहीं रखता। जिस किसी ने इस परम मधुर लीला सुधासमु में अवगाहन किया, वही परम धय हो गया। अनेकों बडेबडे परमहस ऋषिमुनिमहामा, अۡततव में परिनिति बवप महापुष एव तवज्ञ योगी इस परम अगाध रससमु उसी भाति लहरा रहा है। उसमें कूदने का साहस उसी को करना चाहिये, जो सारी भोगमोक्ष की आकााआें से सवथा शूय हो चुका हो।यों भगवान के आदश दिय कमयोग का, उनके उपदेशों आर शिक्षाआें का आदश गहण कर यथायोय उहें अपने जीवन में उतारकर सभी धय हो सकते ह आर सभी को होना चाहिये।
आज तो ाय सारा ही यविव ‘कामोपभोगपरायण’ होकर सवता असुरभावप हो रहा ह। इसी से आज का आसुरीराक्षसी यासुरसमवित विज्ञान कारातर से विशु अयामनाशक अज्ञान का सार करके आमविवस के उाेग पव में सल ह। इसी से आज विव की गति विकास तथा गति के नाम पर आयामिक, नतिक एव धामिक भावों तथा आचरणों के विनाश तथा अधोगति की ओर हो रही ह, आर सबसे अधिक खेद की बात तो यह ह कि तामसिक बु के भाव से विपरीत अनुभूति हो रही ह‘अधम धममिति या मयते तमसाऽऽवता।’ आर इसका परिणाम अधोगति भी निचित ही ह
जघयगुणवाथा अधो गछति तामसा।।
भारत भी आज मोहाध होकर इसी का अधअनुकरण करके पतनोमुख हो रहा है।
इस भयानक धमसकट के समय बचे हए कुछ धमभी लोगों के मागदशन के लिये भगवान श्रीकण की भगवदगीता ही एकमा पथदथक दीपतभ, निय सनीि पथयोति आर परम पाथेय है। अतएव इस समय भगवान श्रीकण की दिय उपदेश वाणी का चारसार आर जीवन में कियामक आचरण ही सवधान एकमा आशाथल ह। भारत पर इस समय भीषण सकट के बादल छाये है आर वह ‘किंकतयविमूढ’ हो रहा है। चीनासुर तथा पाकासुर सिर पर चढे आ रहे ह। इस समय आयामिक भागवती श की आराधना करके उसे जगाना आर उससे अमोघ बल ा करना विशेष योजनीय ह। अत में ाथना कीजिये
सतचितधन परिपूणतम , परम ेमआनद।
विवेवर वसुदेवसुत, नदनदन गोविद।।
