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मानवता की

Swatantra Vaartha  Sat, 13 Mar 2010, IST

मानवता की

डॉ राधाकृष्णन्‌ एक बार इंग्लैंड गए। उस समय वहां के लोगों ने उन्हें अपने भौतिक विस्तार, अनुसंधान एवं आविष्कारों की जानकारी दी। जिसमें उन्हें पानी में तैरती पनडुब्बी, आकाश में उ़डते तीव्र गति के वायुयान दिखाये गए। पत्रकारों ने उनसे इस संबंध में अपने विचार व्यक्त करने को कहा तो डॉ राधाकृष्णन ने कहा ‘‘मानव पानी में मछलियों की तरह तैरना सीख गया और आकाश में परिंदों की भांति उ़डना भी सीख गया। पर अब इसे इंसान की भांति धरती पर रहना सीखना चाहिए।’’विद्या से मानव को पदाथा] का ज्ञान तो हो गया है किंतु मानव उनका सदुपयोग करना नहीं सीख पाया है।

मनुष्य को वैज्ञानिक वृत्ति और आध्यात्मिक मूल्य दोनों की आवश्यकता है। सच्ची वैज्ञानिक वृत्ति वही है जो केवल उपभोग के सम्पूर्ण पदार्थ दे सके, परंतु साथ ही साथ मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम और दया का भाव भी पैदा कर सके। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य बनाना ही है। मनुष्य बनाना अर्थात केवल साक्षर ही नहीं चरित्रवान भी है। कहते हैं साक्षर चरित्रवान न हो तो राक्षस बना देता है। आज मनुष्यता ज्ञान के ऐसे ही साक्षरों के बीच कहीं खोसी गई है। आज उपदेश दिए जा रहे हैं, विद्या बिक रही है और इंसान नकली बनता जा रहा है। जीवन तबाही के ढेर से फिसल कर कब गिर जाए कोई नहीं कह सकता। हम जीवन जीने के लिए न जाने कैसेकैसे साधनों पर निर्भर रहते हैं। कहते हैं उन्होंने धूप में निकल कर देखा है, घटाआें में नहा कर देखा है, जिंदगी क्या है? यह किताबों को हटाकर देखा है। कितनी विचित्रता है कि मां तो खुशियां मना रही है कि मेरा बेटा ब़डा हो रहा है और मौत कहती है कि यह हर पल मेरी तरफ आ रहा है। दुनिया तो दो मतों वाली है एक नहीं। इसीलिए तो उसे दुनिया कहा गया है। तरक्की के नाम पर हर कोई दूसरों से आगे ब़ढने में लगा है। सभी धन की सम्पन्नता से परिपूर्ण होने के लिए लालायित हैं।

हम जीवन को साधनों से भरकर सम्पन्न हो जाना चाहते हैं लेकिन हम भूल जाते हैं कि जीवन सामानों से ऐश्वर्यता को प्राप्त नहीं होता। यही झूठ ऐश्वर्यता उधार लेकर किश्तों में कर्ज चुकाता इंसान एक अंतहीन उदारीकरण का शिकार होकर अपनी सुखशांति खो चुका है।

अंधी द़ौड में शामिल आज के इंसान के पास सचमुच अब इतना समय ही कहां है कि वह कभी अपने मन के महकते केतकी वन में विश्रांति के कुछ अनूठे पल महसूस कर सके। जीवन की वाटिका इंसानियत की खुशबू से महकती आई है। तुलसीदास जी के शब्दों में परहित अर्थात ऐसा कर्म जो त्यागपूर्र्ण, निःस्वार्थ और किसी के प्रति दान की चाहत से निरंतर किया जाता है, वह धर्म है। यही धर्म समाज को एकता के सूत्र में बांधता है, जाेे अनेकता के चक्रवात में फंसे लोगों को एकता का संदेश देता है।

‘धारयते इति धर्मः’ अर्थात धर्म उन्हीं आचारविचार, व्यवहार व जीवन मूल्यों का नाम है जो समाज को सर्वांगपूर्ण विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं। देश की पहली महिला आईपीएसअफसर रही किरण बेदी ने एक जगह लिखा है, १९७१ में यूपीएससी के फार्म भरते हुए मैंने धर्म कॉलम के सामने लिख दिया थामानवता। मेरा मानना है कि मानवता या इंसानियत ही सबसे ब़डा धर्म है। कहते हैं कोई फकीर किसी सुंदर स्थल पर पहुंचा और लोगों से उस जगह के बारे में पूछने पर लोगों ने कहा यह स्वर्ग है फिर उस फकीर ने पूछा सुकरात कहां है? काफी खोजबीन की, कहीं पता नहीं चला, फकीर नरक की ओर चल प़डा। वहां जाकर पूछताछ की तो लोगों ने बताया कि सुकरात यहीं कहीं है। फकीर ने सुकरात से प्रश्न किया, आप जैसा अच्छा इंसान नरक में? सुकरात हंसते हुए बोले, संसार में गलत व्याख्याएं प्रचलित हैं। तुम कहते हो अच्छा इंसान स्वर्ग में जाता है। हम कहते हैं कि अच्छा इंसान जहां जाता है, वहां स्वर्ग अपने आप चला आता है और बुरा इंसान जहां जाता है, वहां नरक आता है।

सुकरात ने आगे समझाया, स्वर्ग कोई बना बनाया स्थान नहीं है। स्वर्ग अच्छे इंसान का निर्माण है। अपने भीतर जब अच्छा निर्मित हो जाता है तो बाहर अच्छा फैल जाता है। स्वर्ग अच्छे इंसान की निर्माण की छाया है, सुगन्ध है। उधर नरक भी कोई स्थान नहीं, वह बस बुरे इंसान की बुराई का बाहर तक छा जाना है।

स्वार्थ अपनों को पराया और प्रेम पराए को अपना बना देता है। हम अस्तित्व और महत्वाकांक्षा के नाम पर अपने आपको धोखा दे रहे हैं। यह कैसी दुनिया है, जहां एक तरफ भूख और इंसानियत के विरुद्ध झूठ और दिखावे का चलन ब़ढ रहा है,किसी ने सच ही कहा है किपरियों के देश की ये कहानी भी खूब है,बच्चों को मां ने आज भी भूखा सुला दिया।

भूख के सामने आज इंसानियत दम त़़ोडती नजर आती है। उस वक्त हमारी शिक्षा और ज्ञान कहीं घने बादलों के साये में गुम हो जाते है। लेकिन हमारा भ्रम एक ठोकर लगते ही टूटकर बिखर जाता है और हमें यह एहसास होता है कि झूठ और दिखावे की शिक्षा ने हमें विनम्रता और इंसानियत जो उस ईश्वर की देन है उससे दूर रखा।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजिस्ट डाना जोहर और इयान मार्शल ने आईक्यू टेस्ट की जगह एसक्यू यानी स्पिरिचुअल कोशंट के जरिए बुद्धिमत्ता आंकने की पहल की है। उनके अनुसार एसक्यू का अर्थ है जीवन के मूल्य, आदर्श और अर्थ समझाने की बुद्धिमत्ता। इससे इंसान अपने व्यवहार को बेहतर, विकसित और अर्थपूर्ण बना सकता है। विकसित एसक्यू वाला इंसान आत्मिक और आध्यात्मिक तौर पर ज्यादा जागरूक होता है। हम कह सकते हैं कि असली कद और काबिलियत ब़ढाने के लिए ज्यादा जरूरी है स्पिरिचुअल इंटेलिजेंस का विकास, जिसे हम काबिलियत अर्थात योग्यता कह सकते हैं। जो सबसे पहले इंसान को इंसानियत से भरपूर कर देता है। आज तलाश है इस द़ौडती भागती हुई दुनिया में इंसानियत की जो कहीं गुम हो गई है। घृणा, ईर्ष्या और भेदभाव से विलग भाईचारे की।

महावीर स्वामी ने कहा था‘‘घृणित वह नहीं जिससे घृणा की जाती है, किंतु घृणित वह है जो घृणा करता है क्योंकि उसके हृदय में ही घृणा भरी है। वही नीतिकार कहते हैं‘‘सर्वेयत्रविनेतारः सर्वे मानमिच्छन्ति’’ जहां सभी बहुत मान चाहते हों और सब अपनाअपना स्वार्थ पूरा करने में लगे रहते हों ‘‘कुल तद्‌ अवसीदति ’’ वह घर ज्यादा देर तक मजबूत बनकर नहीं रहता । आज मानव समाज को आवश्यकता है एक वैज्ञानिक धर्म तथा एक धार्मिक विज्ञान की, तभी विश्व में एकता का नाद होगा तथा प्रसन्नता और प्रगति का साम्राज्य होगा।

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