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दोषदशन तथा पर निदा से हानि

swatantravartha  Fri, 25 Dec 2009, IST

रदोषदशन तथा पर निदा से हानि

मनुय में एक बडी मानसिक दुबलता यह ह कि वह अपनी शसा सुनकर आर दूसरो की निदा सुनकर पस होता ह। अपनी शसा में आर परनिदा में उसे निरतर बढने वाली ऐसी एक मिठास आने लगती ह कि वह कभी अघाता ही नहीं आर फिर वय ही अपनी शसा तथा दूसरों की निदा करने लगता ।

जगत में गुणदोष भरे ह, पर जिसकी वा दोष देखने की हो जाती ह, उसे पर दोषों को ढूढढूढकर देखने तथा उनका बढाचढाकर बखान करने में रस आने लगता ह। यह बहत बुरी वा होती ह। इस वा के हो जाने पर दोष देखना आर पर निदा करना ही उसका धान काय हो जाता ह। फिर, वह जसे अपने अति आवयक काम को मन लगाकर तथा विभि साधनों से सप करना चाहता ह, वसे ही परदोष दशन तथा पर निदा में अपने तमाम साधनों को लगा देता ह। यही उसका वभाव बन जाता ह।जिसका दोष देखने का वभाव हो जाता ह, उसकी आखें बदल जाती ह, उसे गुण में दोष दिखायी देते ह आर वह गुण को भी दोष बताकर निदा करने लगता ।

इसी को ‘असूया’ दोष कहते ह।

मनुय अपने से दोषों की भी निदा सुनना नहीं चाहता,यपि यह उसकी कमजोरी ह, फिर झूठी निदा सुनने पर तो उसे क्षोभ होता ही ह आर निदा करने वाले के ति ेष ाेह हो जाता ह। उस ेेष ाेह के कारण वह भी अपने निदक की निंदा करता ह आर उससे कलह करता ह। परिणाम यह होता हआपस में दोनों का वर बध जाता ह आर दोनों ही एक दूसरे का अनि करने में लग जाते ह। दोनों के ही अपनेअपने बधुबाधव भी होते ह, अतएव इनके वर का विष उन लोगों में भी फलता ह आर परपर विरोधी दल बन जाते ह, जिसका परिणाम झगडा ही नहीं, हिंसाहया तक हो जाता ह आर कदफासी की भी नाबत आ जाती ह। फिर पीढियो तक वर चलता ह।

जिस मानव जीवन में मनुय हित करके मनवाणी से सबको सुख पहचाकर भगवान के समागपर चलता आर जगत में दवी सपदा का वितार करता तथा अत में भजन में लगकर भगवा कर लेनाउस दुलभ मानवजीवन को परदोष दशन तथा पर निदा में तथा अपनी मिया शसा में लगाकर अपने जीवन को तथा दूसरों के जीवन को भी इस लोक तथा परलोक में नरकयणा भोग का भागी बना देनाकितना बडा माद आर पाप ह !

इससे बडी सावधानी के साथ सबको बचना चाहिये।

मनुय का परम कतय हभगवान के गुणों को , उनके नाम, उनकी लीला का श्रवण , कथन तथा कीतन एव मरण करने में ही जीवन को लगाना। बुमािन मनुय को तो दूसरों के न तो गुण दोष का चितन करना चाहिये, न उनको देखना चाहिये आर न उनका वणन ही करना चाहिये। उसे तो भगवण चितन से ही समय नहीं मिलना चाहिये। पर यदि देखे बिना न रहा जाय तो दूसरों के गुण देखने चाहिये आर ढूढ ढूढकर अपने दोष देखने चाहिये। न रहा न जाय तो दूसरों के से गुणों की शसा करनी चाहिये आर अपने दोषों की साहस के साथ निदा। वातव में परमाथ की से तो यह सब कुछ न करके भगवतिन तथा भगवामगुण का कथन कीतन चिंतन ही करना चाहिये।

भगवान ने जितने भी ाणीपदाथा] की रचनास की ह, सबमें कुछ न कुछ गुण अवय वतमान ह। गुण देखने वालों को गुण मिलते ह। अतएव येक ाणीपदाथ में गुण देखने की चो करो। अभी जो हमें सबके दोष दीखते ह, इसका धान कारण हहमारी दोष। हमारी में ही दोष भरे ह, इससे हमें सभी में दोषहीदोष दिखायी देते ह, गुण की ओर हमारी जाती ही नहीं। हमें अपना यह काेिण ही बदलना पडेगा, इस दाेिष को ही मिटाना होगा। जहा गुण हइ कि हमें सबमें गुणहीगुण दिखायी देने लगेंगे।

हमारी में रागेष के कारण भी वतु का यथाथ प दिखायी नहीं देता। जिस पाणीपदाथ में राग होता ह, उसके दोष में भी गुण दीखते ह आर जिस ाणी पदाथ से ेष होता ह, उसकी वितत गुणावली में भी दोष दिखायी देते ह। रागेष कभी भी वतु के यथाथ वप का दशनज्ञान नहीं होने देते। इसलिये चाि को रागेषरहित करना पडेगा।

जहा में दोष देखने की वा हो गयी ह, वहा राग बहत कम रहता ह आर ेष बहत यादा, योंकि जिसमें दोषही दोष दीखते ह, उससे ेष उप हो जाता ह तथा ेष होने पर दोष आर भी बल तथा सुыढ हो जाती ह। ऐसी अवथा में सदाचार तथा सदगुणों में भी सदवा आर सययवहार में भी, यहा तक कि सतो में आर भगवान में भी दोष दीखने लगते ह। जगत में लोग जो भगवान की, सतों की, सदाचार तथा सदगुणों की सदवा आर सययवहार की भी निदा करते देखे जाते ह, इसका धान कारण हउनकी बुमूल दोष । मनुय को दूसरों में जितने अधिक दोष दिखायी देते ह, उतना ही अधिक दोषों का चिंतन होता ह। जसा सतत चितन होता ह, वसा ही अतकरण का प बन जाता ह आर फलत दोषों का चितन करतेकरते उसके अपने जीवन में वे ही दोष आ जाते ह। फिर तो बाहर भीतर दोषों का ही वातावरण बन जाता ह आर मनुय का अनायास ही पतन हो जाता ह।

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