द्रपण की तरह होता है समझदार
जागक, समझदार य किया करता है । यह बात नहीं ह कि वह मा होशपूवक देखता रहता हहोशपूवक देखते रहना उसके अतिव का एक पहलू ह। देखे बिना वह किया नहीं करता है । आर जब तुम अपनी जागकता आर साक्षीभाव से हर क्षण किया करते हो तो तुममें अपरिसीम ज्ञा उभर आती है । तुम चमकने लगते हो, आभामय हो जाते हो, एक उवल काशपुज बन जाते हो। मगर यह दो चीजों के मायम से होता ह साक्षीभाव आर उससे पदा होने वाली किया।
साक्षीभाव से देखना निकियता होती ह तो तुम आमहया कर रहे हो। देखने से तुम सकिय हो जाते हो, तुहारे कय में एक नइ तरग आ जाती ह। तुम साक्षीभाव से देखते रहो तो तुम एकदम शात आर मान हो जाते हो। तुम देखते हो कि थिति या है , आर उस सजगता से तुम तिसवेदन करते हो। जागक य तिसवेदन करता ह, वह उारदायी होता है , शादिक प से वह तिसवेदन करता है , वह पतिकिया नहीं करता। उसकी किया उसकी जागकता से उप करता ह, तुहारी चालाकी से नहीं, यही फक होता है । इसीलिए यहा पर देखने पर सहजफूतता के बीच किसी तरह की असगति होने का सवाल ही नहीं ह। देखना सहजफूतता का ारभ ह, सहजफूतता साक्षीभाव की कतकयता है , फुलफिलमेंट है ।
वातविक समझदार य किया करता हबल किया करता ह, समगता से किया करता ह, लेकिन क्षण में वह अपनी चेतना के अनुसार किया करता ह। वह एक दपण की तरह होता ह। साधारण य, अचेत य दपण की तरह नहीं होता, वह तो एक फोटोलेट जसा होता ह। फोटोलेट एक बार उपयोग में आने के बाद यथ हो जाती ह। किंतु कोइ भी तवीर वातविकता नहीं होती, योंकि वातविकता तो निरतर विकसित होती जाती ह।
तुम बाग में जाकर किसी गुलाब के पाधे का चि लेते हो। कल यह चि वसा ही रहेगा, परसो भी यह चि वसा ही रहेगा। बाग में पुन जाकर उस गुलाब के पाधे को देखो। वह अब पहले जसा नहीं ह। इसमें से फूल मुरझा गए ह या आर नये गुलाब खिल गए ह। हजारों चीजें घटित हो गइ ह। तवीर तो निर्जीव वतु ह। कमरा, फोटोलेट से तो केवल थिर वतुआं की ही तवीर खींचती ह। किंतु जीवन कभी भी थिर नहीं होता, यह परिवतनशील ह। तुहारा मतिक एक कमरे जसा होता ह,यह तवीरें एकति करता रहता ह। यह एक एलबम ह। आर फिर उन तवीरों से तुम तिकिया करते रहते हो। इसलिए तुम जीव के ति कभी भी से नहीं हो, योंकि तुम जो कुछ भी करते हो वह गलत ह। जो कुछ भी तुम करते हो, म कहता है , वह गलत ह। यह कभी भी सही नहीं होता।
अचेतन मन एक कमरे की तरह काम करता ह। चेतन मन, यानपूण मन एक दपण की तरह काम करता ह। यह छवि नहीं उतारता,यह एकदम खाली रहता ह, सदव खाली। इसलिए जो कुछ भी दपण के सामने आता ह वह तिबिंबित हो जाता ह। यदि तुम दपण के सामने खडे होते हो तो यह तुहें तिबिंबित कर देता ह। जब तुम चले जाते हो तो इसमें अब तुहारा तिबिंब नहीं आता। अब कोइ दूसरा य इसके सामने आ जाता हयह किसी आर को तिबिबित करता ह। यदि वहा पर कोइ नहीं होता ह तो यह किसी को भी तिबिंबित नहीं करता। यह जीवन के ति सदव सा ह।
फोटोलेट कभी भी जीवन के ति सी नहीं होती। यदि अभी तुहारी तवीर भी ली जाए, आर किसी कारण उसे फोटोगाफर कमरे से बाहर निकाल देता ह तो तुम उसमें अब उस प में माजूद नहीं होते हो। तुम बडे हो गए हो, बदल गए हो, तुहारी आयु बढ गइ ह। बु कहते ह मान होकर बठना सीखो। एक दपण बन जाओ। मान दपण को चेतना के ारा निमित करता ह, आर फिर तुम हर क्षण कय करते रहते हो। तुम जीवन को तिबिंबित करते हो। तुम किसी एलबम को सिर में लिए हए नहीं घूमते हो। तब तुहारी आखें वछ आर अबोध हो जाती ह, अब तुममें पता आ गइ होती ह, तुहारा काेिण यापक हो गया ह, आर तुम जीवन के ति कभी भी झूठे नहीं रह जाते।यही वातविक जीवन ह।
