कैसे की जाए भगवान की पूजा !
हम सब भगवान की पूजा करते हैं और वैसे तो हर भक्त या यूं कहें कि हर आस्तिक भगवान की पूजा करता है पर कभी जब छोटा सा बा हमसे पूछे कि आखिर पूजा किसे कहते हैं और इसे करते कैसे हैं ? यह कितने प्रकार की होती है तो हमसे इस साधारण से दिखने वाले प्रश्न का जवाब देते नहीं बनता योंकि हम पूजा करते तो हैं पर इतनी गहराईर् से उसके बारे में नहीं सोचते िक उत्तर दे सकें।
इस सवाल का जवाब यहां िदया जा रहा हैपूजनम् (पूज+ल्युट्) का सीधा सादा अर्थ सम्मान करना, सादर स्वागत करना, आराधना करना, अर्चना करना, पूजा करना, आदरपूर्वक भेंट चढाना है। सगुणोपासना में देव पूजन का बडा भारी महत्व है। प्राचीन वैदिक काल से ही अग्नि, सूर्य, वरुण, रुद्र, इंद्र इत्यादि देवताआें एवं दिव्य शक्तियों का पूजन होता रहा है तथा इनसे प्राप्त चमत्कारिक उपलब्धियों से इतिहास भरा पडा है। पुरातन परंपरा से ही हमें देवार्चन की दो विधियां प्राप्त होती हैं। याग और पूजा।
किन्हीं निश्चित द्रव्यों के साथ देवताआें के अर्चन को पूजा कहते हैं। पत्र, पुष्प, जल द्वारा अर्चन करना ही पूजा है। उस पूजा के द्वारा मनुष्य अपने आराध्य देव को प्रसन्न कर अभिलषित वर मांगता है। पंचोपचार से लेकर सर्वा उपचार तक इन पूजाआें के कई विधान हैं जो यहां विस्तार से दिये जा रहे हैं:
पंचोपचार पूजा :गंधाक्षत्, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य इन पांच प्रकार की सामग्री व विधि के द्वारा की जाने वाली पूजा पंचोपचार पूजा कहलाती है।
दसोपचार पूजा : पाद्य,अर्ध्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य। इन उपचारों से की गई पूजा दसोपचार पूजा कहलाती है।
षोडशोपचार पूजा : ध्यान, आवाहन, आसन, पाद्य, अर्ध्य,आचमन, स्नान दूध, दही आदि से (अभिषेक स्नान),वस्त्र,यज्ञोपवीत आभूषण इत्यादि,गंध (चंदन, अबीर, गुलाल, अक्षत वगैरह) पुष्पपत्र (अंग पूजा अर्चना इत्यािद), धूप (दशांग इत्यादि), दीप, नैवेद्य (फल, प्रसाद व सूखामेवा इत्यादि), ताम्बूल, दक्षिणा, नीराजन, जल आरती वगैरह,पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, नमस्कार, स्तुित आिद।
राजोपचार पूजाषोडशोपचार के अतिरिक्त छत्र, चामर, पादुकादि एवं रत्नों से विविध सामग्री व साा से की गई पूजा राजोपचार पूजन कहलाता है।
पूजन के बारे में तो हमने जान लिया अब सवाल उठता है कि अर्ध्य किसे कहते हैं? जिसका जवाब हैदेवता या अति सम्मानित व्यक्ति के प्रति आदरपूर्वक दी गई आहुति को अर्ध्य कहते हैं। अर्ध्य प्रदान करना देवपूजन का प्रारंभिक विधान है। जिसके आठ अंग कहे गए हैं। यथा
आप
क्षीरं कुशाग्राणि दध्यक्षततिलास्तथा
मेवा सर्षषाश्चेैव अष्टााें अर्ध्य उच्यते।।
अनुष्ठान प्रकाश पृ१०
जल, दूध, कुश, दही, चावल,तिल, यव, सरसों ये आठ प्रकार की सामग्री अर्ध्य के अविभाज्य अंग कहे गये हैं। यहां पूछा जा सकता है कि अर्ध्य कहां जरूरी है ? जिसका जवाब यूं है सूर्य को अर्ध्य दिये बिना शंकर या विष्णु का पूजन न करें। योंकि सूर्य, चंद्र, यम, काल और प#ा महाभूत ये नौ शुभाऽशुभ कर्म के साक्षी माने गये हैं। सारे देव मेरे शरीर में रहकर मेरे मंत्र के साक्षी हैं। अत
हे देवो ! मेरे पूर्वजन्म में अर्जित जो भी विद्या है वह मुझे प्रदान करो। (गंधर्व तंत्र) यज्ञ प्रारंभ करने के पूर्व आचार्य व ब्रह्म को अर्ध्य दिया जाता है तथा विवाह वेदी पर वर को कन्या का पिता अर्ध्य प्रदान करता है।
यहां यह जानना भी जरूरी है कि अर्ध्य का निषेध कहां है? जिसका जवाब हैशंख के जल से सूर्य को अर्ध्य न देवें। लोहपात्र (स्टील) से अर्ध्य नहीं दिया जाता। सूर्य भगवान को अर्ध्य ताम्र में, रक्तपुष्प या चंदनकुमकुम मिश्रित जल से दिया जाता है। सवाल उठता है कि पूजन में वर्ज्य पदार्थ कौनकौन से हैं? जिसका जवाब हैबासी जल, पत्ते, पुष्प, फल ये सभी पूजा में वर्जित हैं। केवल गंगाजल, तुलसी पत्र, बिल्वपत्र और कमल वर्जित नहीं है। बासी (पर्युसित) पुष्प चाहे सोने के भी हों उससे देवी की पूजा न करें। बिल्वपत्र व महंगे पुष्प, आंवले के पत्ते, तमाल के पत्ते, कल्हार के पत्ते, तुलसी के पत्ते , कमल, मणियों के पुष्प या जिन पुष्पों की कलियां हैं वे पुष्प कभी बासी नहीं होते। कमल और आंवले के पुष्प ३ दिन तक शुद्ध रहते हैं। करवीर के पुष्प १ दिन, सफेद व रक्त कमल के पुष्प ५ दिन तक बासी नहीं होते। बिल्व दस रात, तुलसी ११ रात तक बासी नहीं होती। सडे, गले, कटे हुए असुगंधित पुष्प पूजा में वर्ज्य हैं। विष्णु का पूजन चावलों से, गणपति का तुलसी से, देवी का दुर्वा से और सूर्य का बिल्वपत्र से पूजन कभी न करें।
कई लोग प्रश्न करते हैं कि आखिर यज्ञ किसे कहते हैं? जिसका उत्तर है ‘यज्ञ’ धातु नङ् प्रत्यय से कोई भी पवित्र या भक्ति संबंधी क्रिया यज्ञ कहलाती है। परंतु व्यावहारिक रूप से अग्निहोत्र द्वारा अर्चन करना याग अथवा यज्ञ है। यह अनेक लोगों के सहयोग से होता है। इसमें मंत्रों व परंपराआें का विशिष्ट क्रम रहता है। ये याग सकाम व निष्काम भेद से कई प्रकार के होते हैं तथा इनकी अनुष्ठेय क्रिया भी अलगअलग प्रकार की होती है। शास्त्रों में यज्ञ से बढकर कोई भी पवित्र कर्म नहीं कहा गया है। अर्थात् यज्ञ सबसे पवित्रतम कर्म है।
सवाल पूछा जा सकता है िक पूजन की वैदिक परिपाटी एवं पौराणिक परिपाटी में या भेद है? जिसका जवाब है(१) वैदिक पारिपाटी, (२) पौराणिक परिपाटी के अंतर्गत इन पूजाआें के मंत्रों में भेद रहता है।
जो यज्ञोपवीतधारी द्विज हो, वे वैदिक मंत्रों तथा पौराणिक मंत्रों से अपने आराध्य (इष्ट) की पूजा कर सकते हैं। जिनके यज्ञोपवीत न हो, वे वैदिक मंत्रों का उारण न करके केवल पौराणिक मंत्रों द्वारा पूजन सम्पन्न कर सकते हैं। कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि घर में मूर्तिपूजा एवं लि स्थापना के या विधान हैं? जिसके जवाब में कहा जा सकता है कि रत्न, सुवर्णचांदी,पीतल व तांबे तथा लोहे लकडी व मिट्टी की प्रतिमाएं घरों में पूजी जा सकती हैं। इनमें महर्घ श्रेष्ठ कहलाती है व अन्य घटिया । शिव पूजा में नर्मदा का बाणलि विशेष महत्व का है। मत्स्य पुराणानुसार घर में पूजनार्थ प्रयुक्त मूर्तियां अंगूठे के आकार से १२ अंगुल तक हो सकती हैं और १६ अंगुल से अधिक नहीं होनी चािहए।
अकेली मूर्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए साथ में अनेक मूर्तियां होना आवश्यक है। घर में दो लि नहीं होने चाहिए तीन व अधिक हो सकते हैं। इसी तरह गणेश की मूर्तियां ३ नहीं होनी चाहिए। दो शंख, दो सूर्य, तीन देवी की मूर्तियां, २ चक्र, दो शालीग्राम की शिलाएं घर में नहीं पूजनी चाहिए। इनसे कम या अधिक संख्या श्रेष्ठ हैं। ऐसा न होने पर पूजन से उद्वेग प्राप्त होता है। सर्व पूजनों में सर्व प्रथम सूर्य को अर्ध्यादि से पूजित कर गणपति का पूजन करें, फिर अम्बिका का, उसके बाद महादेव का तब विष्णु का, पूजन करें यही क्रम प्रशस्त है। इसमें व्युत्क्रम होने पर भय उपस्थित होता है। कुछ साधक प्रश्न करते हैं कि शिव पंचायत किसे कहते हैं? जिसका जवाब हैरुद्र जप करते वक्त शिव पंचायतन की पूजा करना श्रौतकर्म समान है। शिव पंचायतन मध्य में शंकर, ईशान में विष्णु, अग्निकोण में सूर्य, नैऋर्त्य में गणपति और वायव्यकोण में पार्वती का पूजन कहा गया है। वोपदेव व अन्य ऋषियों का मत है कि स्थान व्यतिक्रम से देवपूजा की जाएगी तो वह पूजन हानिप्रद होगा। ‘स्वस्थान वर्जिता
देवा
शोक दु
ख भयप्रदा
।’ यह पंचायत पूजन आद्यशंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित है। हर कोई जानना चाहता है कि किस देवता को कौन से पुष्प प्रिय हैं? जिसका जवाब है शंकर को बिल्वपत्र, विष्णु को तुलसी, गणेश को दुर्वा, सूर्य को कणेर (करवीर) और देवी को नाना प्रकार के सुगंधित पुष्प अतिप्रिय होते हैं। सवाल उठता है कि शिवजी के पार्षद कौनकौन से कहे गये हैं? जिसका जवाब है बाण, रावण,चंड, नंदी, भृंगी आदि शिवपार्षदों की पूजा या स्मरण भी रुद्र जप का एक अंग है। सवाल उठता है कि पंचामृत किसे कहते हैं? जिसका जवाब हैहेमाद्रि शिवधमा] में बताया गया है कि दही, दूध, शर्करा, शहद और घृत ये पांचों मिलकर पंचामृत कहलाते हैं।
डॉभोजराज द्विवेदी
