श्रीराधामाधव का मधुर रूपगुणतत्व
आनंद के स्वरूप में बडा तारतम्य है। श्रुित में ‘लौिकक आनंद’ और ब्रह्मानंद’ के भेद बतलाये गये हैं। तैत्तिरीयउपनिषद में कहा गया है‘‘युवावस्था’’ हो, श्रेष्ठ आचरण हो, वेदशिक्षा, शासनकुशलता, सफल कर्मूयता, रोगरहित संपूर्ण अ तथा इन्द्िरय से युक्त बलवान सुदृढ शरीर और धनसम्पत्ति से पूर्ण पृथ्वी पर अधिकारयों जिसमें मनुष्यलोक के सब प्रकार के श्रेष्ठ भोगानंद प्राप्त हों, वह ‘मानुषानंद’ है।जो मनुष्ययोनि में उत्तम कर्म करके ‘गंधर्व’ योिन को प्राप्त होते हैं, उनको ‘मनुष्य गंधर्व’ कहते हैं।
इन ‘मनुष्यगंधवा] का आनंद ‘मानुषानंद’ से सौगुना है। अर्थात उपर्युक्त मानुषानंद जैसे सौ आनंदों को एकत्र करने पर आनंद की जो एक राशि होती है, उतना आनंद इन ‘मनुष्यगंधवा]’ का है। मनुष्यगंधवा] के आनंद का सौगुना ‘देवगंधवा] का (देवजातीय जन्मजात गंधवा] का) है। इस आनंद का सौगुना आनंद चिरस्थायी ‘पितृलोक’ को प्राप्त ‘पितरों’ का है। उसका सौगुना आनंद ‘आजानज देवों’ का (जो स्मृतिशास्त्रोक्त कमा] के फलस्वरूप इस देवलोक को प्राप्त होते हैं, उनका) है। उसका सौगुना आनंद ‘कर्मदेवताआें’ काजो वेदोक्त कमा] के फलस्वरूप में इस देवलोक को प्राप्त है।
इसका सौगुना आनंद वसु, आदित्य आदि ‘नित्य देवताआें ’ का है। इन देवताआें के आनंद का सौगुना आनंद ‘इन्द्र’ का है। ‘अकामहत’ इन समस्त लोकोंभोगों की कामना से रहित श्रोत्रिय को यह आनंद स्वत
ही प्राप्त है। इन्द्र के आनंद का सौगुना आनंद ‘बृहस्पति’ का है। बृहस्पति के आनंद का सौगुना आनंद ‘प्रजापति’ का है। ऐसे जो प्रजापति के एक सौ आनंद हैं, वह ‘ब्रह्मा’ का एक आनंद है और यह आनंद ब्रह्मलोक तक के भोगों में कामनारहित श्रोत्रिय को सहज ही प्राप्त है।’ इस प्रकार उत्तरोत्तर आनंद की अधिकता का वर्णन करते हुए यह दिखाया गया है कि ये जितने भी आनंद हैं, ‘ब्रह्मानंद ’ की तुलना में अति तुच्छ हैं। इसीलिये इसके बाद ही श्रुति कहती है कि मनवाणी उस परमानंदस्वरूप को न पाकर लौट आते हैं, वेदलक्षण वाय की निवृत्ति हो जाती है। वेद भी इस ‘ब्रह्मानंद’ के परिमाण का निर्धारण नहीं कर सकता। इस प्रकार का अवाङ्मन सगोचर आनंद ही ‘ब्रह्मानंद’ है। इस ब्रह्मानंद से भी अत्यंत उत्कर्ष से युक्त ‘रसानंद’भत्यानंद कहा गया है।
ब्रह्मानन्दो भवेदेष चेत् परार्द्धगुणीकृत
।
नैति भक्तिसुखाम्भोधे
परमाणुतुलामपि।।
(भक्तिरसामृतसिंधु ११।१९२०)
‘‘एक के ऊपर १७ सुन्ना लगाने पर जो संख्या होती है, उसका नाम है ‘परार्द्ध’। ब्रह्मानंद को परार्द्ध की संख्या से गुणा करने पर जिस आनंद की उपलब्धि होती है, वह आनंद भी भक्ति सुखसागर की तुलना में एक परमाणु के समान भी नहीं है। अर्थात् उस आनंद से भी भक्तिसुख अनंतगुना अधिक है।’’ श्रीमद्भागवत में आया है
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
भगवत्ससस्य मर्त्यानां किमुताशिष
।।
श्रीमद्भागवत में ऐसे कई प्रस मिलते हैं, जिनमें ब्रह्मानंद, कैवल्यमोक्ष आदि की अपेक्षा भक्ति, प्रेम लीलाकथा, भगवत्प्रेमियों के स तथा भगवत्सेवा आदि को बहुत ऊंचा बताया गया है।
श्रीयादवेन्द्रपुर महाराज कहते हैं
नंदनंदनकैशोरलीलामृत महाम्बुधौ ।
निमग्नानां किसस्माकं निर्वाणलवणाम्भसा।।
‘श्रीनन्दनन्दन की किशोरावस्था में की हुई सुंदर लीलारूप महान अमृतसमुद्र में निमग्न हमलोगों को निर्वाणमुक्ति रूप खारे समुद्र की या आवश्यकता है?’
इसी से भगवत्सेवापरायण जन दिये जाने पर भी सेवा को छोडकर पांच प्रकार की मुक्तियों को भी स्वीकार नहीं करते। भगवान ने कहा है
सालोयसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृन्ति विना मत्सेवनं जना
।।
(श्रीमद्भागवत ३।२९।१३)
‘ऐसे सेवाव्रती मेरे जन मेरी सेवा को छोडकर, दिये जाने पर भी मेरे धाम में नित्यनिवास, मेरे समान ऐश्वर्यप्राप्ति , मेरी नित्य समीपता, मेरेजैसा रूप और मेरे अंदर समा जानाब्रह्मरूप हो जानाइन पांच प्रकार के मोक्ष को स्वीकार नहीं करते।’ योंकि यह भगवत्सेवानंद ब्रह्मानंद से कहीं श्रेष्ठ है। ब्रह्मानंद नित्य एकरस हैं, उसमें विलास या नित्यनूतनता नहीं है, फिर, वह अनुभव में भी नहीं आता, योंकि उसका अनुभव करने वाला कोई रहता नहीं। पर भगवत्सेवानंद सागर में निरंतर अनंत विचित्र विलास तरंगें उठती हैं।
इतने पर भी जो वास्तविक प्रेमी महानुभाव हैं, वे इस सेवानंद की भी इच्छा नहीं करते। वे चाहते हैं‘विशुद्ध अहैतुकी सेवा’। सेवा करते हैंसेवा के लिये ही।
सेवा में यदि कहीं अपने आनंद का अनुसंधान या आनंदप्राप्ति की वासना रहती हैउसका किंचित् भी आवेशलेश रहता है, तो उसे प्रेमराज्य में कलंक और प्रेमसेवा का विघ्न माना जाता है और वे इस प्रकार के आनंद को अपना घोर विरोधी मानकर उसका तिरस्कार करते हैं ।(क्रमश:)
