अपने अंतर्तम के स्वामी बनो
एक बार तुम शरीर के क्रोध को, शरीर के प्रचंड उन्माद को शांत करना सीख जाते हो, तब िफर अपने बोलने के बारे में सावधानी बरतो। लोग बोलते रहते हैं, वास्तव में उन्हें पता नहीं होता कि वे या कहते रहते है, वे बस, दोहराते रहते हैं । तुम्हारा मन िरकॉर्ड करने वाला एक बहुत बडा यंत्र होता है ।
तुमने सभी तरह की बातें रिकॉर्ड की हुई होती है और जब तक तुम वास्तव में सावधान नहीं हो जाते े तब तक तुम्हारा मन पुरानी प्रणालियों को दोहराता रहता है और बारबार तुम पुरानी समस्याआें में उलझ कर रह जाते हो ।
यिद तुम शरीर, मन और उनकी सारी कार्यप्रणाली को होशपूर्वक देख सकोगे तो तुम उनसे इतना अलग हो जाओगे ि क तुम उन्हें नियंत्रित कर सकते हो। तुम किसी चीज को नियंत्रित तभी कर सकते हो जब तुम उससे एक दूरी बनाए रख सको। और बुद्ध कहते हैं कि जो अपना स्वयं का स्वामी होता है, वह समस्त अस्तित्व का स्वामी होता है, वह जीवन के अलग ही तल में प्रवेश कर जाता है। तुम दास हो, वह स्वामी है। तुम यंत्र हो, वह वास्तविक मनुष्य है। तुम अचेत होकर काम करते हो, वह सचेत होकर काम करता है।
और सचेत होकर काम करने का मतलब हैसमस्त दुख से बाहर, समस्त विपत्ति से बाहर, समस्त व्यथा से बाहर, कहीं पार हो जाना है। अन्य धर्म कहते हैं कि सांसारिकता से बाहर, बुद्ध इसे मात्र बाहर हो जाना कहते हैं। बाहर हो जाने के लिए तैयार रहेंअपने ही अंतर्तम के स्वामी बनो।
शरीर हमेशा सहजता से काम कर रहा है, मन ही कभीकभी शरीर का मालिक बनने का प्रयास करता है। यही बात तो सारे धर्म तुम्हें बताते रहे हैं। सभी धर्मग्रंथ इन्हीं शिक्षाआें से भरे पडे हैं कि शरीर को एक निश्चित अनुशासन में किस तरह जबरदस्ती ढाला जाए। ब्रह्मचर्य मन का एक विचार हैशरीर इसके विषय में कुछ नहीं जानता। और मन इसे सम्हाल नहीं सकता, इसलिए शरीर दमन कर देता है, विकृत होकर काम करने लगता है, विक्षिप्त हो जाता है। शरीर बहुत अबोध होता है। यह तो मन ही हैधर्मगुरु, दार्शनिक, शिक्षकजो हर चीज में हस्तक्षेप करने की कोशिश करता है।
प्रबुद्ध व्यक्ति हस्तक्षेप नहीं करता, वह मन को भी शरीर में हस्तक्षेप नहीं करने देता।(समाप्त)
