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सत्य की ही जय होती है

swatanvartha  Tue, 5 Jan 2010, IST

सत्य की ही जय होती है

हमारे राष्ट्रचिन्ह में अशोक स्तंभ के नीचे उधृत ‘सत्यमेव जयते’ यह वाŠयांश मुंडकोपनिषद से लिया गया है। सन्‌ १९४७ में हमारे तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन और राष्ट्रनेता पंडित जवाहरलालजी ने सत्य को सर्वोपरि मानकर स्वतंत्र भारत के सामने इसे राष्ट्रमंत्र के रूप में रखा था।

गांधीजी ने इसे विशाल अर्थ में लेते हुए लिखा है िक िवचार से, वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है और सत्य ही परमेश्वर है का नया सिद्धांत विकसितकिया। सत्य का अर्थ है मन, वचन व कर्म की एकता।

जैन वचन ‘‘सƒं लोगम्हि सारभूयं’’ इस दुनिया में सार रूप तो सत्य है, बािक सब िन…सार है, सत्य की मिहमा को ज्यादा उजागर करते हैं। सत्यपालन से हमारा तेज ब‹ढता है, चारित्र्य उन्नत होता है, सत्य से धैर्य की सिदि्ध होती है, जिसके पास सत्य है उसका धीरज कभी खत्म नहीं होता और सत्य से जो आंतरिक संतोष मिलता है उसकी बराबरी कर सकने वाली कोई दूसरी चीज दुनिया में है ही नहीं ।

भगवान महावीर सत्य के महान साधक थे। सत्य के बारे में उनकी अनुभव वाणी के कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत है…

सƒं भयर्व सत्य ही भगवान है। सƒं लोयूम सारभूर्य सत्य लोक में सारभूत है।

सƒमेव समभिजाणाहि सत्य का ही अनुशीलन करो। सƒसि घितिं कुव्वह सत्य में धैर्य रखो।

सƒस्स आणाए उवटिठए से मेहावी मारं तरतिजो सत्य की आज्ञा से उपस्थित है, वह मेधावी मृत्यु को तर जाता है। सत्यनिष्ट व्यक्ति निश्चिन्त रहता है और लोक में प्रतिष्ठा पाता है। आदेय वचन बनता हैउसकी आज्ञा का कोई अतिक्रमण नहीं कर पाता और उसे वचनसिद्धि की उपलब्धि भी हो सकती है। इसी दृष्टि से हर विवेक सम्पन्न व्यक्ति को सत्य से संबंधित आस्था वाŠयों अथवा आदर्श वचनों को सामने रखना है और एकनिष्ठ होकर सत्य का अनुशीलन और अनुपालन करना है, किंतु जयपराजय कि भावना से ऊपर उठकर आत्मशुद्धि या जीवन की पवित्रता का उद्‌देश्य ही मुख्य हो।

महाभारत के कवि ने सत्य को मार्मिक रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया है

‘‘नासो धर्मो यत्र न सत्यमस्ति, न तत्सत्यं यच्छ लेनानुविद्धम’’, अर्थात जिसमें सत्य नहीं होता वह धर्म नहीं है और जिसमें छल होता है वह सत्य नहीं हैं।

सत्य के साथ सौंदर्य हैं, सत्य के साथ शिवत्व है, सत्य के साथ आनंद है, सत्य के साथ अमृत है। आज सत्य सूली पर और असत्य सिंहासन पर दिखायी देता है परन्तु ऐसा अल्पकालिक रहता है।

ओशो ने कहा है कि जीवन के असत्यों का दर्शन, सत्य की पहली किरण का जन्म बनता है, और जहां प्रकाश की एक भी किरण है वहां से सूर्य तक की यात्रा भी हो सकती हैं।

श्री विजयेन्द्रजी स्नातक ने सत्य को धर्म को धूरी बताया है। यह अहिंसा की मर्यादा है , शूचिता और आस्था का संबल है, अस्तेय, अपरिग्रह, तप, श्रद्धा और शील का रक्षक है। सत्य को मानव जीवन में सर्वोƒ उदातगुण मानकर चलना चाहिये जो कि व्यक्ति के जीवन को आदशा]न्मुख बनाये।

सत्य वह धुरी है, जिस पर मानव की समस्त गुणवत्ता निर्भर करती है। सत्य का अर्थ है हृदय की निर्मलता, हृदय की विशालता। कह सकते हैं कि हृदय वह उद्‌गम है, जहां से विचार और कर्म की धाराएँ प्रवाहित होती है। जैसा उद्‌गम होता है वैसी ही उसकी धाराएँ होती हैं।

सत्य इंसान को निर्भिकता प्रदान करता है, उसके आचरण को शुद्ध रखता है और समाज को मूल्याधार बनाता है। सत्य वह पारसमणि है, जिसके स्पर्श से सब कुछ कंचन बन जाता है। सत्य को समझने की ब‹डी सुगम कसौटी है। हम जो भी काम करें उसमें इस बात का ध्यान रखें कि उससे किसी का अहित तो नहीं होता। हम मुंह से कोई शब्द निकाले उससे पहले यह देखें कि उससे किसी को चोट तो नहीं लगेगी। यदि हमारे काम से किसी का अहित होता हो, यदि हमारे शब्द से किसी को चोट लगती हो तो निश्चित मानिये वह सत्याचरण नहीं है।

धर्म और सत्य का अटूट सम्बन्ध है। जिसकी धर्म (संकीर्ण धर्म नहीं व्यापक) में निष्ठा नहीं है, वह कभी सत्यानुगामी नहीं हो सकता । इसी से हमारे पूर्वजों तथा ऋषि मुनियों ने धर्म की इतनी प्रभावना की। धर्म मनुष्य को आत्मा से सम्पृक्त करता है और सत्य उसे ईश्वर की ओर ले जाता है। सत्य जीवन के अस्तित्व का और उसके संगीतमय अभिव्यक्ति का उद्‌गार है। वह मूलाधार है और प्राकट्‌य का सूत्रधार भी। इसी से जीवन का विशेष रूप से मानव जीवन का वह साध्य भी है और साधना भी। जीवन की सभी अभिव्यक्तियां सत्य से अभिमंत्रित हैं और सत्य की आराधना भी।

‘धर्मेण धारयते प्रजा’ प्रामाणिकता, कर्तव्यनिष्ठा, संयम, क्षमा, समता, बंधुता इत्यादि सत्य के विविध रूप जिन्हें महाभारत ने सत्य के त्रयोदश आकार कहा, पराभूत हुए से लगते हैं। भोगवादी संयमशून्य जीवन समाजोन्नति का आधार नहीं बन सकता । जीवन की एकांत भक्ति की राह है रचना की, संयम की, संगीत की, सत्य की जय इसी में निहित है।

महर्षि पतंजलि ने कहा हैसत्य प्रतिष्ठित व्यक्ति को वाक्‌ सिद्धि प्राप्त होती है। यदि कोई व्यक्ति बारह वर्ष तक पूर्ण रूप से सत्यवादी रहे तो उसकी प्रत्येक बात यथार्थ होगी।

डॉ बीएल टेक‹डीवाल

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