सदगुणों का कीजिए सार
हमारा देश योगियों का, सिद्धो का, साधकों का देश है । जब कडवी बातें सुनने का अवसर आता था तो उसे तपया करने आर क्षमा करने का अछा माका समझते थे। आज युग ऐसा आ गया कि कोइ किसी की हकी सी बात सुनने को तयार नहीं है उसके दुपरिणाम आपके सामने ।
जिस युग में सत आर ज्ञानीयानी लोग थे, चारों ओर शाति थी, कुछ लोग यदि आकात भी होते थे, तो सतों की वाणी से लोगों के दय को चन मिलता था। उस वाणी को आज भी पढें तो मन को चन मिलता है। पहले समय में जो बेकार होता था उसके लिए कहा जाता था कि वह भाड में चने भून रहा है। आज कोइ अछा काम कर रहा हो, सेवा का काम कर रहा हो तो लोग कहेंगे, भाड झोंक रहा है, अथात बेकार का काम कर रहा है।
रहीम ने कहा कि तुम इस दुनिया में अपनीअपनी समझ के हिसाब से कुछ न कुछ करो। यह मानो कि कुछ इधन तुहें दिया गया है इसको आग के हवाले करना ह, यही समझदारी ह। सिर पर रख कर बोझ बढाना समझदारी नहीं है, अपने आपको निभार करो। अपने अहकार का परियाग करो। विनमता अपना लो। जो निभार बनकर जी रहा ह वह तो पार उतर गया आर जिसने अपने अदर अहकार अभिमान पाल लिया, वह पार नहीं हो पाता।
भगवान श्रीकण आर नारद का सवाद हमारे पवि गथों में है। भगवान कण ने नारद जी से पूछा, तुम सारे बाड में चलते हो, दुनिया को देखते हो, म जानना चाहता ह कि तुहारे लिए पूजनीय चरण कान से है? कोइ कमचारी, कलाकार या किसान कान अछा लगता है? नारदजी ने कहावह य जो भूखा रह कर भोजन करने से पहले, अपने परमामा को नमन करता है, देवताऔ का पूजन करता ह, फिर बडों का आशीवाद लेता है आर कोइ न कोइ पवि कम जो आमा को ऊचा उठाने वाला ह, उसके बाद भोजन पर अपना अधिकार मानता ह, अपने को पवि करके भोजन करता है वह पूजनीय है।
ससार में जो कम करता ह अपने कमा] की तारीफ करने में वय न लग जाए, दुनिया से अपने आपको छिपाता ह, कम महान करता ह लेकिन शसा के समय अपने को पीछे करता ह। समाज उनके कम देखकर उनकी तारीफ करे। आज का समाज अलग ह, समाज उनके गुणों की शसा करने की जरत नहीं समझता। पहले का समाज कुछ आर था, ढूढकर गुणों की शसा करना आर बुरे काया] पर डाल देते थे कि बुराइ समाज में न फले।
खडगसिंह डाकू ने अपाहिज बनकर साधु का घोडा छीन लिया। साधु बाबा ने दया करके अपाहिज बने डाकू को घोडे पर बिठा लिया। डाकू घोडे की लगाम थाम कर घोडा लेकर भाग गया। बाबा ने कहा, घोडा ले जाओ कोइ बात नहीं, मगर किसी को बताना नहीं कि घोडा मने इस तरह चुराया। योंकि गरीब, अपाहिज की, सहायता करने की भावना पर चोट लगेगी आर कोइ भी किसी अपाहिज की सहायता नहीं करेगा।
समाज में यह रोग पदा न हो जाए कि जहा दया करनी चाहिए, य वहा दया न करे। अछे गुण देखते थे तो सारी दुनिया को बताते थे कि समाज में अछाइ की सुगध फले। आज का समाज ऐसा नहीं सोचता। जो अपनी अछाइयों को बढा कर समाज को लाभ दे, मगर अपनी शसा न करे बकि समाज उसकी शसा करे। आज समाज में चारों ओर अशाति है।
नारद ने कहा , पूजनीय ह वह इसान जो अपनी शसा न करे आर सदव हर प में सतु रहे। जो बेसब जीवन नहीं जीता, जो आमसतु ह। ऊचे पद वाले को, पसे वाले को लोग पूजते ह,मगर नारदजी कहते ह वह पूजनीय नहीं ह। सतु इसान न किसी को नीचा दिखाएगा, न चोट पहचाएगा। सतु इसान वह ह जो समाज के वेभव को देखकर इया में न आए जितना हो उसमें खुश रहें,तिपधा जो ह उसका मतलब समाज का सतुलन बिगडता ह। य खुद ही अशात होता ह आर दूसरो को भी अशात करता ह। आज आमहया के केस बढने लगे है।
मानव जीवन बहत कीमती ह। लेकिन पूजनीय चरण वहीं होंगे जो सतु ह। घर में पतिपनी व परिवार सतु रहे, गति का माका हाथ से जाने न दे तो सुख शाति रहेगी। दोनों का आदश एक हो तो जीवन में चमकार घट सकता ह। पनी सुशील ह, पति का अनुकरण करती ह। आज माना जाता ह,दोनों बराबर ह। दोनों हाथ पकडकर चलते ह, न जाने कब हाथ छोड दें। पहले पनी, पति को अपना आदश मानती थी। पति का वरण किया, तो वह महवपूण हो गया, अब वही हमारे जीवन का महवपूण हिसा ह आर वही हमारा आदश है।
जीवन में गहथ आर सयास अनिवाय नहीं माने गए। लेकिन जीवन के पीस साल बचारी आर गहथ के बाद वानथी हो, यह अनिवाय माना गया ह। हर य को वानथी होना चाहिए। समाज को योय सतान दे सकते हो तो गहथ में जर जाओ। कीडेमकोडों की तरह सतान पदा करके दु सतान देना गलत ह। कलकाा से अरविद योगी सयास की दीक्षा लेने पाडिचेरी गए। सयासी होने पर चिता पर लाश रखने के समय बोले जाने वाले म बोले जाते ह। सयासी पनी को मा कहकर भीख मागता ह। जो कि बहत कठिन काय है।
नाम जाति, बिरादरी सब बदले तो य सयासी होता ह। अरविंद सयासी हए तो पनी ने प लिखा, बहत उलाहने लिखे। प पढने के बाद उहोंने लिखा पनी का काय ह आदश पति को सहयोग देना, ाेसाहन देना। पति जब थक जाए तो उतसाहित करना, निराश हो जाए तो पेरित करना कि म ह आपकी छाया, आपकी श बनकर जीऊगी। धन की जरत पड जाए तो महिला अपने गहने भी उठाकर दे दे कि मेरा गहना मेरा पति ही है।
पनी यदि सहयोगी, ाेसाहित करके ेरणा देने वाली हो, कहीं मी, कहीं मि बन जाए, भोजन करवाने में मा का प धारण कर ले आर पति का आकषण बिदु बनकर रहे। व से लेकर बोलने तक यवहार ठीक रखे। अपने आकषण को अदर से कट करे तो य महान बनता है। अरविद ने लिखा,तुम आ सकती हो यदि यह तीन अधिकार पूरे कर सकती हो तो, लेकिन पनी आइ नहीं। अरविद साधना तर पर पहत आगे पहचे योंकि उहोंने नइ दिशा पाइ थी।
आदश एक हो तो मजिल पाइ जा सकती है। नहीं तो जीवन रस खम हो जाता ह। सीताजी ने रामच जी को अपना आदश माना। कुछ चिंतक कहते ह कि सीता जी सतान को योय बनाने के लिए वामीकि आश्रम में गइ। धोखे से सीता जी को जगल में छोड, कठोर बनकर लमण छोडकर लाट आए। उस थिति में जब दुनिया के सहारे की जरत थी। सीताजी अकेली पड गइ। ाथना की ‘पति से दूर कर दिया। मुझे पति से मिला आर अगला जम दे तो पति के प में मुझे श्रीराम ही चाहिए। हर जम में पति के प में राम देना, मगर बिछोह मत देना। योंकि म ही जान सकती है पति का बिछोह या होता है? रामजी का मान उहें इतना यि ह कि उनके लिए जीवित ह कि जो सतान हो उसे योय बनाऊ आर रघुवश के लिए योय सतान दें। शिकात का माका नहीं दिया, अछी बेटी, अछी बह बनी, हर प में जो आदश ह।
राम को वन जाना था तो सीता पीछेपीछे लेकिन सीता को जाना पडा तो राम पीछे नहीं गए। लेकिन जब भी आदश की बात होगी तो सीता का नाम लिया जाएगा। सीता नारी जाति के लिए आदश ह। राम का प अदर से झाकता ह तो वाणी से निकल आता ह। जिस जीवन में सतोष हो, वह पूजनीय ह। नारद जी कहते ह कि सीता जी के आदश को म णाम करता ह। महलों में रहकर भी सतोष नहीं तो उससे बढकर गरीब कान होगा? अमीरी ह सतोष ।
आगे कहा जो क्षमा का गुण अपनाए। जो तरहतरह की चोट खाने के बावजूद भी क्षमाशील ह। क्षमा वीरों का आभूषण ह। नारदजी कहते ह जो य वेद आर शााें को पढतेपढते ज्ञानी बनकर, तेजविता को अपना लेता ह आर धन का योग करने के लिए कुशल ह, जिसकी वाणी मतिक आर दय दोनों को जीत लें, दिल भी हिल जाएदिमाग भी हिल जाए, आज्ञा चक पर भाव डाल दे कि इसे अपनाओ।
जो य सयम पूवक ब में आचरण करता ह। बडेबडे यज्ञ काय के ारा समाज को दिशा दे। परोपकार के महानतम काय करके समाज को नइ दिशा दे, सेवा के महानतम काय करे, समाज का मतिक भ की ओर मोड दे, समाज को उपदेश ही नहीं सदेश देने वाला बन जाए। पुरानी परपराए तोडकर नइ परपराए थापित कर दे, ऐसा प लेकर जो समाज में दिखाइ देता ह, उसकी म पूजा करता ह, वही तो माँत मरणीय है, वक्त वदनीय ह, सराहनीय ह, अचनीयहै। उसी का पूजन किया जाए, उसी को मान दिया जाए।
हे कण ! म उसके लिए ही झुकता ह, जो कडवे शद सह जाए, समाज के जहर को पी जाए पर अपने अदर का जहर समाज को न दें, सयवादी हो सय की रक्षा करे, अहिसा में लगा हो। जिहोंने मन को कजे में रखा हो। जो मनमानी नहीं करते, समाज को दिशा देते ह, ऐसे लोग शाति पसद करने वाले लोग ह जहा जाएगे, शाति बाटेगे। यहा आप वत ह अपना वग बनाने के लिए । जहा बाधकर रखा जाए वहा तो नक ह। वग तो कमाने की चीज ह, वग दिया नहीं जाता। वग अपने हाथों से निमित किया जाता है।
