विरोधाभासी है अश्तिव
कोइ भी कभी भी मानवता को सपूण इकाइ की तरह देखने में सक्षम नहीं रहा। लेकिन अब वह समय आ गया है। अब आदमी बचकाना नहीं रहा। समय आ गया ह जब सपूणता की बात को वीकारी जाए। आर जब किसी बात के लिए समय आ जाता ह तब कुछ उसे रोक नहीं सकता। सारे आशिक यास असफल हो गए । विज्ञान असफल हो गया, धम असफल हो गए, राजनीति मतलब कम। ये सभी असफल हो गए। असल में आशिकता असफल हो गइ ।
आदमी बहत अथहीनता में जीआ ह आर वह आमहया के बहत करीब। य आमहयाए करते रहते ह , उनकी सया रोजरोज बढती जा रही है। देरसबेर, यदि सतुलन नहीं आया, यदि आशिकता को गिराया नहीं गया आर सपूणता को नहीं लाया गया, तब इसकी बहत सभावना ह कि आदमी वविक आमहया कर ले। इसकी बहत बडी तयारी चल रही है ।
मेरा यास सपूणता का ह, परिपूणता का ह। तुहें एक नहीं चुनना ह, तुहें पूणता को चुनना ह। तुहें पूण मानव होना ह। कुछ भी छोडना नहीं है। तुहें वही होना ह जो कुछ तुम हो, गहन वीकार के साथ। सव को वीकारना कठिन ह, योंकि यदि तुम तक को वीकारते हो तब ेम को वीकारना विरोधाभास हो जाता ह। यदि तुम ेम को वीकारो तब तक को वीकारना कठिन हो जाता ह। लेकिन तुम कर या सकते हो? चीजें ऐसे ही ह। यह सवाल चुनाव का नहीं ह, बस यह तो ऐसे ह, अतिव ऐसे ही चलता है।
अश्तिव विरोधाभासी है ।
आदमी को कवि होना चाहिए आर आदमी को होना चाहिए आर आदमी को ताकिक होना चाहिए आर आदमी को सकिय होना चाहिए। आदमी सब कुछ होना चाहिए। आर इसमें कोइ समया नहीं ह। सच तो यह ह कि यदि ेम आर तक दोनों साथसाथ हों तो तक ेम को सहारा देगा आर ेम तक को सहारा देगा।
तुहारा तक कभी भी शुक नहीं होगा, की तरलता इसे हरा आर लाल आर चमकीला रखेगी। आर यदि तक वहा ह तो तुहारा ेम कभी भी विक्षिता जसा नहीं होगा। यह तुहें अति पर नहीं ले जाएगा। तुम मय में बने रहोगेसतुलित आर सही अनुपात में।
इसलिए न कोइ बाकि माग ह, न कोइ भावनामक माग ह। सपूणता की, समगता की जरत ह। तुहें समग होने की जोखिम लेनी है ।
