परात्मा कीभक्ति में लीन हो जाओ
निरकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज कहते ह कि हमेशा ही महापुषों भों सतों ने परमाथ के राते पर चलते हए भ को विशेषता दी ह आर भ करते हए उहोंने आनद को किया है ।
भ का दान मागा ह हमेशा भ ने, आर यही माना ह कि इस भ के बगर मेरे जीवन की चाल उस कार की हो जाएगी जो एक वहशी या जानवर की होती है। इसलिए हमेशा मागा ह कि दातार यह भ का दान ही मेरे हिसे में आए । इस भ के अतगत ही वह सेवा करता ह, सुमिरण करता ह, ससग करता ह । हमेशा इस निराकार दातार के साथ अपना नाता जोड कर इसको दय में बसाता ह । महापुषों सतों का सग इसलिए होता ह ताकि महापुषों के दशन, महापुषों के अमोलक वचन श्रवण करने को मिले आर इसी कार से तन,मन, धन जो दातार ने दिया है, इन तमाम दातों के समपित भाव से इसको परोपकार आर सेवा में लगाता ह आर कमयोगियों वाली ऐसी भ को निभाताहै।
असर इसान ने सोचा कि इस मालिक, निराकार की भ कहीं एक किनारे पर बठ जाने से , कहीं, कम के क्षे से दूर जाने से ही हो पाती ह । कोइ विशेष समय कोइ विशेष थान के साथ ही जुडी हइ ह । इस कार से कुछ विशेष कियाए ह । लेकिन जो कमयोगी भ इस ससार में हए ह, उहोंने कम के क्षे में रह कर ही यह भ की ह । सेवा करनी भी सभव तभी ह, अगर कम के क्षे में रहता ह। इस कम के क्षे में रहकर ही भजनों ने ऐसी अनय भ की ह । यही यथाथ ।
महापुष अपनी यह भ करते ही चले जा रहे ह । यह भ इनको भाती ह । सेवा भी भाती ह । ससग भी भाता ह । सुमिरण भी भाता ह । यह इसको मजबूरी नहीं मानते ह । यह सेवा भी खुश होकर बडे चाव के साथ करते ह । चाहे लाख शारीरिक मजबूरिया हों, लाख आथिक मजबूरिया हो, लाख आर ऐसी मजबूरिया हों, लेकिन उन मजबूरियो के होते हए भी हसहस के जो उम करते ह, हसहस के परोपकार आर सेवा , निरतर किए चले जाते ह, यह इसको मजबूरी कभी नहीं मानते । यह इसको खुशनसीबी मानते ह । सेवा करने से बडी खुशी ा होती ह । इस कार से इन सेवाआें को यह किए चले जाते ह । ससग भी करते ह । ससग भी भाता ह इनको । ससग में भागभाग कर पहचते bhakti, ताकि हर अवसर, क्षण, पल इस निराकार दातार की यश कीति करने को, सुनने को मिलती रहे लेकिन दूसरी तरफ जो एक सासारिक वा रखने वाला इसान होता है , उसकी अवथा ऐसी होती ह जसे कबीर दासजी कहते कबीर पानी भगति न भावइ , हरि पूजा सुहाइ ।
माखी चदनु परहर, जह बिगध तह जाइ ।
अथात जो पाप कम में पडा हआ ह, उसको भ आर भ भाति नहीं ह । उसको न भ अछी लगती ह न भ भाते ह, न हरि की पूजा उसको सुहारी ह । निरतर ऐसे नीच, विनाशकारी कम की तरफ बढता ह । उसको चदन की बजाए , गदगी पसद ह आर उसे उनमें कोइ बुराइ नजर नहीं आती।
यह ससार में हम देखते ही आ रहे ह कि किस कार से एक इसान जिसको हम साकत कहते ह, जो मनमति में ह, जो मनमुख ह, उसको यह वछता भाती नहीं ह । उसको यह सुगधि भाती नहीं ह । वह इससे आनद भी नही ले पाता ह । उन चीटियों की तरह , जो एक मिश्री के डले के ऊपर से गुजरती हइ भी उस मिठास का आनद नहीं ले पा रही ह । योंकि उस मिठास की जगह पर मुख में गदगी, मुख में वाि डाली हइ ह जिसके कारण मिश्री का वाद, उसका आनद नहीं ले पा रही ह ।
उसी कार से एक साकत को, मनमति को भी यह मिठास पसद नहीं आती ह । उसको न सेवा भाती ह, न ससग भाता ह आर न उसकी वा इस दातार के साथ जुडती ह । ससग से भी दूर, सेवा से भी आख चुराता ह । याद तो इस निराकार की मन में या आनी ह, योंकि मन में घणा, नफरत, लोभ के भाव बसे होते ह । सदव सतों भों ने भ करने की ही ेरणा दी ह कि उमग जाने तो ऐसी भ करने के लिए, जिसमें ससग ह, जिसमें सेवा ह, जिसमें सुमिरण ह । यही जीवन की पहचान, यही जीवन का श्रगार बनता चला जाए आर यही लगन हमेशा लगी रहे । यही रग हमेशा इस मन के ऊपर चढा रहे ।
किसी को उस निराकार दातार यानी भगवान के ति लगाव नहीं ह । जिस तरह से कोइ रोगी होता ह , उसके रोग का उपचार हो जाता ह । जो चीज उसको नहीं भा रही थी, वो उपचार के कारण भाने लग पडती ह । वह मानव रोगी माना गया ह जिसको भ पसद नहीं । जसे कहा ह कि जिसमें एक बदगी की , भ की कमी नजर आती ह वह इसान भी नही रह पाता ह । उसको एकता आर इसानियत में थिर करने के लिए यह भ अनिवाय बतायी गयी ह । इसलिए महापुष ससार भर के इसान को इस तरफ ेरित करते ह, उनको इस तरफ मोडते ह ।
इसान दुनियावी पदाथा] , दुनियावी सिलसिलों को विशेषता देता ह , इनमें हर व यत रहता ह, लेकिन अतत उनकी या हालत ह, इनकी या मियाद ह, इनका या बाकी अतिव ह ? यह हमेशा रहने वाली नहीं ह । यह न हमेशा एक रस रही ह आर न हमेशा ही एक जसा सुख दे पायी ह । इसलिए जितनी तेरी तीवता उस तरफ ह,उसकी बजाए इस मन को इस तरफ लगा ले । यही एक सही दिशा ह । यही एक सही , कयाणकारी माग ह । अगर तूने हठधर्मी में वही चाल पकडे रखी, तू उसी तरफ ही बढता चला गया तो फिर ठोकरों के अलावा , विनाश के अलावा तेरे हिसे में आर कुछ आने वाला नहीं ह । फिर भले ही बाद में तू पछताए या तू जो मर्जी कर ले, लेकिन फिर कुछ बनने वाला नही । यह जीवन जो जी रहा ह , शरीर की याा तेरी जो तय हो रही ह , इस याा को तय करते हए , तूने अपनी वा भों वाली , सतों वाली बनानी ह ।
सतजन इस ससार के ऊपर सदव परोपकार करते आए ह कि आप भी भ का दान मागते ह, आप भी भ भावना से यु होकर इस निराकार दातार के रग में रगे रहते ह, आर साथ ही साथ यह परोपकार इस ससार के ऊपर किए चले जाते ह ताकि यह ससार भी ऐसी अनय भ कर पाए , जिस कार से अनेकों भों ने की ह । सतों महामाआें ने जो युगोंयुगों से भ की ह, ऐसी ही भ ऐसा ही सुमिरण यह ससार का मानव कर पाए , लोक भी सुखी कर पाए आर परलोक को भी सुखी बना ले, सभी को ऐसे भ भरे भक्ति हों ।
