ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

आत्म दीप जलायें

Swatantra Vaartha  Wed, 14 Jul 2010, IST

आत्म दीप जलायें

विषय विकारों से विर होना ही मु की ओर जाना है जबकि उहीं के लिये भागते रहना भवसागर में फसना है। दीपक जलाने से ज्ञान का काश होने से अज्ञान का अधेरा मिट जाता है। कमकाडों ारा शरीर साधने से अब तक न तो कोइ मु हो पाया आर न ही होगा। अज्ञानतावश आम विमति हइ तो आमचेतना ारा पुनशाति वधम को ा किया जा सकता है। भ भावना से बहिमुखी बनते गये तो बोध वप बनने से अतमुखता आ ही जायेगी। अतमुखी बन आम वप में थित होते ही देह व देह की दुनिया की आस समा हो जायेगी। लोकहिताथ किये गये इवरीय काय बधन में नही डालते बकि परमामा के ति समपित होना सिखाते है।

उपराम आमायें शुभ के लिये कुछ कम करती ह तो बेहद खुशी पाती है। शाति वधम वाली आमाये निमल शीतल प से शातिधाम की निवासी थीं। विषय भोगों से दूर होने कारण वे परम वत व भारहीन थी। अब पुन आम ज्ञान ारा सदा काशमान रहने की आवयकता है। शरीर में आस के कारण ही विषयों में वा बढती ह। शद पशप रसगध पी विषय पथ ऐसे लोगों को सताते रहते है। वे देह अभिमानवश सूम आमा का अनुभव नहीं कर पाते। भातिकवादी पच वय की सय पहचान न होने से ही होते रहे ह। नमता व निमाणता के बिना आम ज्ञान होता भी नहीं। पहाड की चोटी की तरह अहकारी लोगों पर ज्ञान की बरसात का भी भाव नहीं पडता। नीचे के लोग ही भले जो पविता आर श्रेता के साथ कम करते हए सदव हरियाली खुशहाली बिखेरते रहते है।

ज्ञानी आमिक वाला होता ह जबकि अज्ञानी सदा ही चमचक्षु से देखता ह। अहकार से मु पाने पर ही आयामिकता आती ह। जो विषयवासनाआें में गोते लगाने को ही उता समझते ह वे सदा आम ज्ञान से वचित ही रहते है।

सासारिकता से दूर होने पर ही आमा का काश सहजता से फलता है। बधनों को तोड विदेही बनने वाले ही सतयुगी राजदरबार चलाते ह। आमा कहीं खोइ नहीं ह। मति ारा उसे पुन पा किया जा सकता है। खुदाखुद अवतरित हो अब उसकी सय पहचान दे र हे है।

सासारिक विषयों की आस को विष समझ कर छोड देने पर ही आम प में थित हो पायेंगे। परम सतगु शिव की मति से आमा पारस बनती जायेगी। पाच तवों वाला शरीर ही पतन के लिये खींचता ह इसलिये आमिक भाव ारा मयु को भी सुखद बनाया जा सकता है।

परमामा आर आमायें ही स के आधार ह जबकि कति उहीं की लीला या अभिय है। आकार कार में परमामाआमा से भि नहीं बकि आमा को सी रीति से जान लेने पर परमामा को भी पहचाना जा सकता ह। आमायें नियसनातन होने से एक ही आकारकार की होती है पर कति चचल आर चलायमान रहती ह। अज्ञानी लोग थल को ही समझ पाते ह। ज्ञानी इयाितीत परम चतय परमामा तक को पहचान लेते है। परिणामवप भाति मिटने से ज्ञानियों की आमा शात व साक्षी ा बन जाती ह।

ससार बधन नहीं ह। य वतु की आस का याग करने से ही बेडिया समा होती है। कति व परमामा के बीच हम आमायें ह। यदि परमामा की ओर जाना ह तो कति से लगाव हटाना पडेगा। कति में फसेंगे तो अति सूम होने से परमामा खिसक जायेगा। घर छोडने से नहीं, काेिण बदलने से ही वराय ा किया जा सकता ह। भोगों से वासनायें त नहीं हो पाती। उठती ही रहने से अनेकों जमों तक बनी रहती ह।

विषयास ही पुनजम व मयु की कारण ह। आमा में जो विकार पी जहर भरा ह उसे खाली किये बगर ज्ञानामत उडेलते रहेंगेतो भी अज्ञानता की ओर जायेंगे। अत करण की वछता के बाद ही सदगुणों का भाव दिखाइ देता ह। विषय क्षणिक व अवाि जनित होते है जबकि देवी गुण आमा की निजी सपा ह। अनिय भोगों से विमुख हो ज्ञान का निय सेवन करने से आमा देवव की ओर बढती ह। देह के ति अपनव मिटने से ही आमा पी दीप व काश से काशमान रहेगा।

आमा समाट पर इयाेिं के साथ मनबुसिकार नाकर चाकर है। आमज्ञान के बिना यह भाति बन रहती ह कि शरीर ह। मयु होने पर शरीर तो न कर दिया जायेगा पर आमा किसी दूसरे शरीर में जाकर पुराने सकारों के अनुसार फिर से अपना अभिनय करती रहेगी। कहते ह शरीर व सबधघर आदि सब मेरे ह तो ‘म’ कान जिसके ये सभी ह? इनसे बु ारा सयत होने पर जो बचता है वही म आमा है ।

आम ज्ञान होने पर भी पुरानेे सकार बीज प में रहते ह जो उचित वातावरण पाकर फिर वक्ष बन जाते है। आस का याग कर निरतर आमिक भाव में रहने पर ही हम सुखशाति के अधिकारी होंगे।

हठ योग शारीरिक कियाए है पर आमभाव में आते ही शातिवधम के अधिकारी बन जाते ह। कमफल या कमभोग पी बाधाए आमभाव के आते ही मिट जाती ह। जपतप पूजा पाठ आदि कोइ भी किया नहीं करनी पडती । आममति से अज्ञान अधकार की गथिया वत खुलती जाती है। जो चतय आमा में विश्रामपूवक ठहर गया वही मति वप व मु है।

साक्षीा होते ही कमबधन नहीं बाधते है। जमजमातर की दहिक वा मिटाते ही मति वप बन जायेंगे। ऐसी निर्दोष आमायें करन करावनहार परमामा शिव पर परवान चढ, परमानद में मगन रहती हइ जीवन मु की अधिकारी बन जाती ह। तो मु चाहने वाले को अपना तनमन सवव भगवान यानी अपने इ को समपित कर देना चाहिए आर इसमें देर करने से कुछ ा नहीं होगा बकि शीघता करने से आपको सब कुछ बहत जदी ा हो जाएगा आर आपका जीवन सवर जाएगा।


आपकी राय