सिद्दांत के रूप में जीए
विचार के दो पक्ष होते हकापनिक व कियामक। आप किसी वतु को ा करने की इछा रखते है, उसके लिए बहत योजना बनाते है, किंतु खेद के साथ यह सावनाए पानी के बुलबुुले की तरह मन मे ही शात हो जाती है।
आप जीवन के कापनिक पक्ष पर तो विशेष यान रखते है कितु उसके कियामक वप की ओर से वीतराग हो जाते है। जिस तरह फल को बिना खाए रखे रहने से वाद नहीं मिलता, हथियार खरीदकर रख लेने से चमकार तीत नहीं होता, दवा के सेवन किए बिना लाभ नहीं होता, ठीक उसी कार शिक्षा आर ज्ञान का यवहार हए बिना कुछ भी उपयोग का नहीं है।
विव में बडे काय अपने साितों को योग में लाने से ही हए है औरआज भी होते है। अभिलाषा, योजना, विचार तब तक उपाादेय नहीं बन सकते जब तक वे मनुय की किया के साथ समिलित नहीं होते। ज्ञानवान से, बलवान होने से बल का ज्ञान चाहे वह कितना भी अधिक यों न हो, अतत पुतक में ही रह जाएगा।
धम कापनिक नहीं यावहारिक होना चाहिए। धम पुतकों के भीतर लिखी रहने वाली मूक वतु नहीं ह, वह सोचने कपना एव वणिम महल नहीं ह। धम यावहारिक प से नियति जीवन में उतारने जसी वतु ह। धम दनिकजीवन में किया प में लाने व तिक्षण काम में लानेे की वतु ह। जो यावहारिक प से आपने काम में ले लिया, वही वातविक धम ह।
दनिक जीवन में उपयोग आने वाला तव ह। जिस धम का दनिक आचारयवहार में कुछ भाव न पडे, वह हवाइ किले के अलावा कुछ नहीं होता है। जिस कार नशेबाज को नशे की तलब उठती है, उसे पाने के लिए वह सब कुछ करता है।
उसी तरह धम के काया] की तलब मनुय में उठनी चाहिए। चचल कति के मनुय उक आदर्शो को लेकर चलते ह आर बहत कुछ व इछा रखते है, परतु वे मनसा, वाचा, कमणा व काया के साथ अपने विचारों को कायप में परिणित नहीं कर पाते।
दूसरी ओर धम को किया में उतारने वाले मनुय आशा से भरे रहते है, आयामिक सपदा की श्रीव करते है , इवर के आनद में गोते लगाते ह आर आने वाले को धमपूवक, सता से झेलते ह। मनुय को चाहिए कि वह शुभ सोचे आर शुभ का ही चारसार करे।
