श्रीकृष्ण के लीलाविलास का परिचयलीला का अर्थ
‘लीला’ शद के अथ का विचार वितार से शदकपम (चतुथ भाग, प २२४) में किया गया है। सामायत लीला का अथ है केलि, विलास तथा श्रगारभावचो। श्रीमागवतपुराण के थम कध (१।१८) में ही इस शद का समुचित सनिवेश उपलध होता है
अथायाहि हरेर्धीमवतारकथा शुभा।
लीला विदधत वरमीरयाममायया।।
लीला के दो कार होते ह कटा आर अकटा।
गोकुले मथुराया च ारकाया च शाणि।
यात तथा कटात त̡व सति ता।।
(भागवतामतम)
भगवान श्रीकण की लीलाए अनत है, किंतु पमुख प से उनकी तीन लीलाए विशेष सि है। इन तीनों लीलाआें में सवथा ऐय है। इसका आरभ होता हवजलीला से, तदनतर आती है मथुरालीला आर अतिम है ारकालीला।
एक ही य ने इन तीन लीलाआें का दशन अपने जीवन के विभि भागों में किया था । अत श्रीकण की एकता में किसी कार का सदेह नहीं किया जा सकता। जो य श्रीकण के यवि में भेद मानता है, उसका चितन सवथा निराधार है।
श्रीकण का गोपियों के साथ लीलाविलास का सबध जीवन के आरभ से लेकर अत तक रहता है। माता के उदराश्रित होने से लेकर उनका यह काय आगे बढता चला गया था। उहोंने उस समय अपने ये भाता को गोकुल में नद के घर में रोहिणी माता के गभ में योगमाया के आश्रय से सनिवि करा दिया था, जो ‘सकषण’ नाम से वियात हए। शिशु के भाव से देवकी तथा वसुदेव को कारागार में रखने पर भी उनके जीवन में अत लीला गाेिचर हइ थी। रक्षक लोगों को नाि आ गयी थी तथा उनके बधन मु हो गये थे। कण जब अपने जीवन के आरभ में गोकुल आये, तब यशोदा को कया की ा हइ थी। यह भी कण के जीवन के आरभिक काल का लीलाविलास था।
श्रीकण के आरभिक जीवन में गोपियों के साथ नाना कार की लीलाआें का वियास गाेिचर होता है। कस ारा कण को मारने के अनेक उपायों में उनकी लीला का विलास गाेिचर होता ह। कण की जीवन लीला को समा करने के लिये कस ने विविध चोए की थीं आर इनमें कण के जीवन का विलास चुर माा में देखा जा सकता ह। उहें मारने के लिये पूतना भेजी गयी थी आर बालक कण ने उसे दूध पीते ही मार डाला। यह भी उनके आरभिक जीवन का विलास ही था।
यमुनाजी में कालियनाग की नाना कार की चोए दिखती ह, जिनके कारण यमुना का जल विषमिश्रित हो गया था । कण ने कालिय नाग के सिर पर नय कर उसके दोष को दूर करने का यास किया था। यह उनकी नयलीला का सڅविलास था।
गोपियों के चीरहरण के सग में लीला का विलास सڅ फुरित होता ह। इस लीला के ारा उहोंने ननान के दोष को सदा के लिये वज से दूर कर दिया था, नदी की पविता की रक्षा की थी आर साथ ही उहोंने यह दशित किया था कि भगवान का सानिय ा करने के लिये मनुय को ऊपरी दोषों को हटाना पडेगा, तभी उनके साथ उसका सवथा मिलन सभव होगा।
गोवधन धारण लीला का महव सबके सामने कण ने दिखाया था। वज के लोग इ की पूजा करते थे। कण ने इसका अनाचिय सि किया आर इ के महव को कम करने की से यह लीला दशित की थी।
श्रीकण ने बा का गव चूण करने के लिए अपने सकप से गोप, वालबाल तथा अय जीवों को छिपा रखा था तथा एक वष के अनतर उन सबको उसी प में कट किया। किसी को भी इस अतरग लीला की गभीरता का रहय का पता नहीं चला आर बा के गव को भी कण ने चूणविचूण कर दिया।
श्रीकण की लीला का अनुकरण उनके जीवनकाल में ही होने लगा था। यह विशेष प ह लीला का। रास के समय गोपियों के गव को दूर करने के लिये भगवान श्रीकण वय अतहित हो गये, तब गोपियों ने उनके जीवन की समत घटनाआें का वय अनुकरण किया था।
कण की जितनी लीलाए पहले हो चुकी थीं, उन सबका अनुकरण कर गोपियों ने उहें पुनजीवित कर दिया था। कोइ पूतना बनी थी, तो कोइ यमलाजुन। इसी कार कण ारा सपादित लीलाआें को गोपियों ने पूणतया अनुकरण के ारा दिखलाया था। यह विचि घटना है।
इसी सग में सुदामाजी की छोटी कुटिया हटाकर भगवान ने वहा महल खडा कर दिया था, गु के यहा पढने गये तो उहोने सादीपनि गु के मत पु को पुन जीवित करके गु दक्षिणा के प में उहें समपित कर दिया था। श्रीकण के जीवन की ये लीलाए सवदा मरणीय रहेंगी। इनका विमरण कोइ नहीं कर सकता।
भगवान श्रीकण राधिका के विषय में वय कहते है
कण वदति मा लोकावयव रहित यदा।
श्रीकण च तथा तेऽपि वयव सहित परम।।
(बववत ६।६३)
श्रीकण का जीवन वदावन में आने पर वहा रहने वाली गोपियों के साथ इतना हिलमिल गया कि उसका पाथय करना नितात असभव है। गोपियों के साथ होने वाली ेमलीला का वणन यथाथत कठिन होता है। राधा के साथ की गयी उनकी ेमलीला इतनी मधुरिमामयी है कि उसका यथाथ वणन करना कठिन ही नहीं, असभवसा ह। दोनों आपस में मिलकर ेम के उकष को वय चखते ह तथा दूसरों को भी चखाते है। कण का राधा के लिये जिस लीलाविलास का उकष गाेिचर होता है, वह रागानुमा भ का चरम उकष है। भ कवियों ने इस आनदमयी दशा की अभियजना अपने कायों में बडी सरसता के साथ किया ह। इस ेमदशा का सुदर चिण निन पयाेिं में देखिये
घर तजों वन तजों नागरनगर तजों।
वसीवट तट तजों काह प न लगिहा
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बावरो भयो ह लोक, बावरी कहत मोको
बावरी कहते म काह ना बरजिहा।
कह या सुन या तजो, बाप आर मया तजों
दया तजों मया प कहया नाहिं तजिहा।
माधुय रसोपासना की कसी दिय भाव विभूतिह यह !
ेम तथा काम में अतर होता ह ेम में याग की भावना बल होती ह आर काम में वाथ की भावना निहित होती ह। नारदजी की में ेम की धान पहचान ह‘तसुखसुखिवम’ यितम के सुख में अपने को सुखी मानना। राधा का जीवन ही कणमय था। काम दूसरे के ारा अपनी त चाहता है, परतु ेम अपने ारा ेम पा चाहता ह। दोनों का तारतय चतय चरितामत में बडे सुदर शदों में अभिय किया गया है
आमेयि ीति इछा तार नाम काम
कणेयि ीति इछा तार नाम ेम।
काम अधतम ेम निमल भाकर
अतएव गोपी गणे नाहि काम गध
कण सुख हेतु मा कणेर सबध।।
श्रीकण का राधा के साथ जो लीलाविलास है, ेम ाचुय है, उसकी गभीरता का वणन कथापि सभव नहीं।
दक्षिण भारत के आलवारों की भ भावना में राधा कण के गभीर ेमभावना की जो थिति ह, उसे यथाथत समझने में भ लोग सवथा असमथ रहते ह। आलवारों के जीवन का आदश इस प में बडी सुदरता के साथ अकित किया गया है
याधयाचरण धुवय च वयो
वाि गजेय का
ज्ञातिवा विदुरय यादवपतेगय किं पाषम।
कुजाया किमु वामपमधिक
किं ततू सुदामो धन
भया तुयति केवल न
च गुणभयाेिि माधव।।
तापय यह कि भों में दोषों की साा होने पर भी माधव उनसे केवल गुणों के कारण ही स नहीं होते, युत भ के ारा स होते है।
आचाय श्रीबलदेवजी उपायाय
