सय पीडादायक है
सय पीडा पहचाता है योंकि हम हमेशा झूठ में रहते है। हमारा सारा जीवन झूठ से निमित है। फेडिक निजे ने कहा है : झूठ को मनुय से मत छीनो; नहीं तो उसके लिए जीना असभव हो जायेगा, सिगमड फायड ने भी ठीक यही कहा है: आदमी झूठों के बगर नहीं रह सकता है; उसे झूठों की आवयकता हधामिक, अतियि, दाशनिक, राजनतिक। केवल अपने ही को देखोतुहें अपने को सहारा देने के लिए कितने झूठों की आवयकता होती है, अपने अहकार को पोषित करते चले जाने के लिए।
मनुय को इतने झूठों की यों आवयकता होती ह? योंकि मुय झूठ तो अहकार है, आर अहकार तभी रह सकता ह जब उसको सहारा देने के लिए कइ झूठ उसके इदगिद इकटठे हों। सय पीडा पहचाता है योंकि वह कुछ झूठों को छीन लेता है, कुछ सहारों को, आर तुहारा अहकार नीचे गिरने लगता है। आर यही सब कुछ है जो तुम अपने बारे में जानते हो। तुम नहीं जानते कि तुम कुछ आर भी हो जो तुहारे अहकार से परे है।
कोइ तुमसे कहता है,‘तुम कितने सुदर हो।’ आर तुम इसे बिना किसी आपा के वीकार कर लेते हो। मने यह बहत लोगों से कहा, किसी ने कभी आपा नहीं की। म कभी भी ऐसे य के सपक में नहीं आया जिसने आपा की हो,‘नहीं, तुम गलत हो योंकि म अपना चेहरा जानता है। म इसे दपण में रोज देखता है ।’ तुम इसे किसी से भी कहो,यहा तक कि कुप से कुप भी।
ऊट से कहाेे, आर वह अपना सिर वीकति में हिलायेगा। वह कहेगा,‘ठीक, म इसे हमेशा से जानता था। तुम पहले बुमािन य हो जिसने इसे पहचाना।’
यहा तक कि कुप से कुप आदमी भी कहीं गहरे में सोचता है कि वह सुदर है। वह विवास करता है, नहीं तो जीना मुकिल हो जायेगा। सबसे मूख सोचता है कि वह बहत बुमािन है। इसलिए तुम एकदूसरे की शसा किये चले जाते हो। सारी शसाए झूठ हआर येक विवास करने के लिए तयार है। यह सामाय जीवन में ही नहीं होता। जब तुम भीतर की याा में वेश करते हो, वहा भी तुम पहचान चाहते हो
याद रखो, कभी भी कोइ चीज पीडा पहचाती है तो उस पर यान करो। उसमें कुछ न कुछ सयता होगी, कुछ सय। यदि कुछ भी पीडा पहचाता है, इसका समान करो, इसमें गहरे जाओ। पता करो यह पीडा यों पहचती है, आर तुम अपने आपको पुरकत पाओगे। तुम इसके ारा विकसित होओगे।
झूठ मधुर है, वे पीडा नहीं पहचाते। इसलिए मधुर झूठों से सावधान रहो। जब कुछ पीडा नहीं पहचाता तो तुम विकसित होने के लिए कोइ ाेसाहन नहीं पाते हो, यह तुम पर निभर है।
