अंतर्मुखी एवं बहिमुखी शिय का भेद
महापुष कहते कि जो य अपनी समीक्षा करता , आम विलेषण करता है, अपने विषय में बाद में सोचता है, समाज के बारे में पहले विचारता है। अपने गुनाहों को कभी माफ नहीं करता, उन पर पचाताप करता है, जपतप, साधना पूण मनोयोग से करता है।
गु के अमत ज्ञान को आर उनके थान को सर्वोपरि मानता ह, दूसरों के अपराधों को क्षमा करता है, नजरदाज करके छोड देता ह, दया भाव बनाए रखता है, अपनी सवेदनशीलता को बनाए रखता है, पेम यार का यवहार बरकरार रखता है, इवर पर विवास रखता है, सतोषी होता है आर भु के याय को सहष वीकारता है, वही से अथा] में अतमुखी होता है।
दूसरी तरफ जो वार्थी हो, छलकपट बेइमानी की नीयत से केवल पदाथा] के मोहपाश में बधा हआ है, जो परिथितियों का दास है, अथवा परिथितिया जिसे पभावित करती है। जो किया नहीं केवल तिकिया ही करना जानता हवह इसान बहिमुखी है।
एक किया होती ह आर दूसरी तिकिया। अतमुखी य कभी किसी विपरीत परिथिति से भावित हए बिना अपनी चेतना से गु के सदज्ञान से ेरित वत होकर निणय लेने का साहस करेगा। योंकि किया का मतलब ह अपनी वछद चेतना से भावित होकर कम करना। जबकि बहिमुखी आदमी यही रोना रोता रहता है, म या क? या न क? मुझे तो कुछ समझ में नहीं आता।
बहिमुखी आदमी असफल होने पर परिथितियों की दुहाइ देता है कि म तो सदा अछा ही सोचता है, अछा ही करता है, फिर न जाने या हो जाता है, परिथितिया ही ऐसी बन जाती है, सारे जमाने के सबधों का बोध कराते हए कहेगा, इस आदमी ने मेरा सही समय पर साथ नहीं दिया, इसने मुझे इस तरह धोखा दिया, जब मुझे अपनों के यार की जरत थी, तब उहोंने मेरा तिरकार किया, मुझसे नफरत आर घणा से पेश आए, वरनाम भी आज दूसरे सफल लोगों की तरह खुशहाल होता। परतता उसके आचरण से झलकेगी, उदासी सदा उसके साथ रहती है, निराशा उसका दामन कभी नहीं छोडती, बहिमुखी इसान खुशी के माकों पर भी गमगीन सा बना रहता है।
किंतु जब इसान अतमुखी होता ह तो वह किसी कम को करने से पूव बाहर नहीं अपने अदर झाकता है। भगवान को याद करता है, गुदेव से आशीष ा करता ह आर बिना परिथितियों का चिंतन किए कतय कम किए जाता है, खुशी के गीत गाए जाता है, ेम पूण जीवन जिए जाता है। कसी भी विकट परिथितिया उसे दबा नहीं पाती, बकि वही परिथितियों को दबा लेता है, उन पर समय रहते काबू कर लेता है। फिर वह सफलता की सीढियों पर चढते चला जाता है।
परिथितियों आर पदाथा] में उलझने वाली चेतना बहिमुखी है। जिससे इसान को दुखों के सिवाए कुछ भी नहीं मिलता। न चाहते हुए भी आदमी कुढते रहता ह, खि रहता ह, यथित आर परेशान, याकुल आर बेचन रहता ह। वह अपनी कमजोरियों में जकडा रहता ह, साइ को वीकार नहीं करता आर कमठता को अगीकार नहीं करता।
हमेशा बहाना बनाना आर बहाना ढूढना बहिमुखी आदमी की आदत में शुमार हो जाता है। अगर बहिमुखी को कोइ समझाता भी है, राह भी दिखाता है, तब भी उसे समझ नहीं आता, वह उसमें दोष ढूढने लगता है। सही दवाइ भी उसको गलत असर करने लगती है, आर दुआए भी उसके काम नहीं आती, इस तरह से उसका पूरा जीवन दुभाय में ही यतीत हो जाता है।
आचाय भिक्षु की एक कथा का वणन यहा किया जा रहा है एक बार किसी जीभ के चटोरे भ ने वादवाद में यादा भोजन गहण कर लिया। जिसकी वजह से उसका पेेट दद देने लगा। दद निवारण के लिए चिकिसक के पास गया तो चकअप के बाद डाटर ने कहाआपको कोइ बीमारी नहीं हबस केवल आपने यादा खाना खा लिया, इस वजह से आपका पेट दुख रहा है।
इतना सुनते ही वह चटोरा आदमी बोलने लगाडा साहब! यह बात नहीं है, मने भाेेेेजन तो थोडा ही सेवन किया था, लेकिन गस यादा बन गइ, जिससे पेट फूल गया, दद इसी वजह से हो रहा है। म तो सदा खाना कम ही खाता है, मुझे खानेपीने का यादा शाक नहीं है, मिठाइया, तो म बहत कम खाता है, आदिआदि। अपनी कमजोरियों को दूर करने के बजाए उनको छिपाने के लिए वे लोग बहतबहत बहाने खोज लेते है।
लेकिन अगर कोइ चिकिसक से बहाना बनाए, मज छिपाए तो उसका सही इलाज सदिध सा हो जाता ह। गु भी तो एक चिकिसक जसे ही होते है। साधारणतया चिकिसक का तो एक दायरा होता है, एक विषय होता है। कोइ दात का, कोइ पेट का , कोइ दिल का , कोइ बेन का आर कोइ हयाेिं का, तो कोइ वचा का लेकिन जो पूरे तनमन आर जीवन का चिकिसक है वे तो सदगु ही है। सदगुदेव की कपा से अतमुखी होने का यास कीजिए। जीवन की पगडडियों पर तभी वातव में चलना आएगा आर जीवन की साथकता भी तभी सभव हाेेगी।
