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दुख के पलों का सही बधन सीखो

swatantravaarttha  Mon, 11 Jan 2010, IST

दुख के पलों का सही बधन सीखो

जी वन सुखदुख का सयोग एव समिश्रण ह। जीवन में सुख आर दुख धूपछाह के समान सतत परिवतित होते रहते ह। कभी सुख की शीतल सुगध की फुहारें उडती ह तो कभी दुख की जलतीबिखरती चिगारिया फलती ह। सुख के पल यों फिसल जाते ह कि पता ही नहीं चलता परतु दुख के पल काटे नहीं कटते इनकी गति बडी मद हो जाती है। यह अनुभव केवल अनुभवी का ही सच ह। सुख के तो पर होते आर वह उड जाता ह। दुख पख कटे पक्षी के समान फडफडाता ह आर उडने के यास में आधे मुह गिरता है।

सुख का पल सहज है। दुख का पल अति कठिन होता ह। सुख का पल तो यों ही अनकहे चला जाता ह आर पता ही नहीं चलता, परतु दुख पलपल, क्षणक्षण बताताजताता है कि वह है आर उसे गुजरने देना है। उसकी खबर समूचे अतिव को होती है, परिसर परिसर को भी पता होता है। दुख के पल के साथ जीना एक चुनाती को वीकारने जसा है, दुթष सघष के समान है। जो सफलतापूवक इस दरिया को पार कर लेता ह, वही शूरवीर कहलाता है, योंकि यह आग का दरिया ह आर इसमें डूबकर जाना होता है। कमजोर इसमें डूब जाते ह आर बहादुर तरकर पार चले जाते है। जो पार हो लेता ह, सही मायने में वही विजेता जाना जाता ह। जीवन के सघष की कहानी किसी भी रोमाचक घटना से कम नहीं ह। यह एवरेट की चढाइ से भी दुलय जसी है, परतु असभव नहीं है। हा , कठिन एव दुकर अवय ह। जो इसे पार कर लेता ह, वह फालाद के समान सुыढ एव सश हो जाता ह। उसको फिर इससे भी बडी चुनाती मिलती है।

हर चुनाती एकदम नइ एव रोमाचक होती ह। थका देने वाली, डराने वाली एव अति भीषण यह चुनाती बडेबडे सूरमाआें को चूर कर देती ह, परतु सबको नहींकुछ होते है, जो हारने के लिए पदा ही नहीं हए होते। जीवन को खेल मानकर उसके सुखदुख के दोनों पहलुआें को अत तक खेल के समान खेल लेते है। इसे खेल मनाने की तकनीक यह ह कि कसे दुख को, पीडा को, कठिनाइयों को खेल के समान सहजता से लिया जा सके, ताकि दुख के पल के अवरोध को यूनतम किया जा सके। बधन यहा भी यु होता ह। पबधन की कुशलता चीजों को सहज एव आसान करती आर उपलधियों को बढाती ह तथा अवरोधतिरोध में खपने वाली ऊजा को सजनामकता में लगाती ।

हालाकि यह मनेजमेंट किल थोडा कठिन अवय ह, योंकि यहा पर जीवन के य एव अय दोनों पहलू समाहित होते है। ससार में मनेजमेंट का उपयोग एव योग तुलनामक प से आसान इसलिए होता ह, योंकि यहा पर सब कुछ सामने होता ह। बाकि कुशलता के ारा इसको जाचापरखा एव नियोजित कि या जा सकता ह, परतु बात जहा जीवन की ह, वहा बाकि गणना ही पया नहीं है, बकि यह कभीकभी नहीं, अधिकतर समय मूकदशक बनी खडी रहती ह, फिर भी कुछ सीमा तक इसका महव तो ह ही। वह जो जीवन को पारदर्शी ढग से देखता है, वही इसका सही बधन कर सकता है आर करा सकता है।

दुख के पल को जीना अयत कठिन होता ह। यह सच ह कि उससे भागा नहीं जा सकता है, भोगना तो पडता ही है। हा, यह भी सच ह कि सुनियोजित ढग से एव कुशलता के साथ समय से पूव इसका निधारण कर लिया जाए तो कठिन से कठिनतम मजर को बहत हद तक सहने योय बनाया जा सकता ह। जीवन के दुख को झेलने का यह बधन कोइ नया नहीं है। हा, नया इसलिए लगता है, योंकि वतमान समय में इसकी परपरा एव चलन लुाय है। ाचीन समय में इस बधन कुशलता से सामायजन भी परिचित थे आर इसका बखूबी उपयोग होता था। उन दिनों य एव अय के सबध को जानने समझने वाले जानकारोंविशेषज्ञों की तादाद अधिक थी। वतमान समय में यह सया आचयजनक प से घट गइ ह आर यही कारण ह कि साधन एव ससाधनों में अगणी हम जीवन के मामले में अतिदुबल एव कमजोर बन जाते है।

जानकार कहते ह कि दुख के क्षण में, बुरे समय में वाणी का योग यूनतम कर देना चाहिए। कोइ भी समया जिससे सवाधिक प से भावित होती ह, वह ह बोलने से, वाणी के योग से। बुरे समय में य इतनी घुटन एव असहजता अनुभव करता ह कि उसकी अभिय वाणी के कूर योग के प में होना लाजिम ह। वह अपनी पीडा बोलकर कट करना चाहता ह। बोलकर वह अपनी पीडा को, दद को बाटना तो चाहता ह। कोइ भी किसी की पीडा को सुनना पसद नहीं करता ह। अत ऐसी भीड में, जहा पीडा के ति कोइ सवेदना नहीं हो, बोलकर अपनी पीडा को बताना निरथक ह, परतु बोले बगर रहा भी तो नहीं जाता। अत केवल अपनों से जो सवेदनशील ह,वहा अपने दद को बाटना चाहिए। बुरे समय में पीडित य अनगल लाप करता ह, अपनी वेदना का दोषारोपण आरों पर मढता ह आर वय को निर्दोष साबित करता ह, भले ही वह उसे साबित कर न सके। जहा बात बन सकती थी, वहा ऐसे तकहीन लाप से उलझ जाती ह आर बदले में मनोदोष एव गलतियों को उडेल दिया जाता ह। पीडित ऐसे ही पीडा से छटपटा रहा ह आर ऊपर से ऐसी आफत आर आन पडी। ऐसे में बात उलट जाती ह, दुख बहगुणित हो जाता ह। समयाए सुलझने के बदले उलझ जाती ह। इनके मूल में जाने से पता चलता ह कि ऐसा सिफ मिया वचना से हआ ह। अत इससे बचना हो तो वाणी की कटुता में कमी ही नहीं, बकि इसके योग को कम कर देना चाहिए। मानव मन के ममज्ञ मानते ह कि बुरे समय में चुप रहना सीखो। विपरीत समय में खराब दार से गुजर रहे य को कभी उसके खराब मजर की याद नहीं दिलानी चाहिए, उसके सामने उसके खराब समय की भयावहता का उेख नहीं करना चाहिए, परतु ऐसा नहीं होता ह। उसके सामने वितार से चीजों को बता दिया जाता ह। पहले से ही डरा हआ य इन चीजों से आर भी डर जाता ह। वह इतना डर जाता ह कि उसका आमविवास डोल जाता ह आर फिर वह अवसाद से घिर जाता ह। अवसाद मे आते ही वह नकारामक चिंतन से आवत हो जाता ह। वह सदा वय को असहाय, असमथ एव अति दीनदुबल समझने लगता ह। अवसाद के दीघकाल तक बने रहने से तो वह वय को इतना अलग मान लेता ह कि उसे जीने की इछा ही नहीं होती ह। ऐसी दुरवथा में उसमें आमहया के विचार उमडनेघुमडने लगते ह। पीडित को पीडा से निवा करना ही मुय काय ह। पीडित य को विवास दिलाना चाहिए, सावना देनी चाहिए कि उसकी थिति कोइ अधिक खराब नहीं ह, बकि यह एक सामाय सी घटना ह। यह विवास उसे अवसाद में जाने से रोकता ह, उसके आमविवास को बनाए रखता ह। अत उसके सामने नकारामक पहलुआें की चचा नहीं करनी चाहिए, अयथा चीजें बनतेबनते आर भी बिगड सकती ह। सभव हो तो उसके सामने ऐसे टात तुत करने चाहिए, जिनसे वह अपनी दुरवथा से बाहर निकलने के वयन पुषाथ में सफल हो सके। पीडितों की पीडा का निवारण सबसे बडा धम ह आर इस धम का निवहन कुशलता के साथ करना चाहिए । जिंदगी में हरेक य को कहीं न कहीं ऐसे दार से गुजरना ही पडता ह, अत येक य को पीडित की पीडा के ति सवेदनशील होना चाहिए। सवेदनशीलता ही ऐसा गुण ह, जो पीडानिवारण या सेवा के लिए तपर करता ह। सवेदनहीन य किसी की पीडा को कभी अनुभव ही नहीं कर सकता ह। एक इसान में सवेदनशीलता सवोपरि गुण ह, जिसके कारण उसे आरों का दद वय के समान लगने लगता ह आर वह उसी वरा एव तपरता के साथ उसके निवारण एव निराकरण में लग जाता ह। पीडित य यदि वय ाथना करे तो वह उसका युार बहत जदी ा कर सकता ह, योंकि पीडा की अवथा में इसान की सारी चेतना एक थान पर आकर सिमट जाती ह आर जब वह केींय चेतना के साथ ाथना करता ह तो उसका वर अतरिक्ष को भेदता हआ लय तक पहच जाता ह। उसे उसका उार एव समाधान अवय मिलता ह। मगर की कराल दाढ में फसे हाथी की पुकार से भगवान दाडे चले आ सकते ह तो इसान की आा पुकार भला कसे अनसुनी हो सकती ह। अत पीडित ाथना करे या उसके लिए ाथना करने की यवथा करनी चाहिए।

बुरे समय के निराकरण का एक सर्वाेाम तरीका ह कि किसी योय एव कुशल अयामवेाा से मिलकर उस अशुभ थिति से निपटने के लिए योजना तयार की जाए। ऐसी थिति न बन सके तो महामयुजय म के अनुान से असाय एव भीषण बाधाए टल जाती ह। इसके साथ निय १००८ गायी म का भी जप करना चाहिए। जप की पूणाहति में विधान के साथ पया सया में आहति देनी चाहिए, यज्ञ अनुान का ाण होता ह। यज्ञ से ही जप का समान फल मिलता ह। इससे बुरे समय से निजात पाने में सुविधा होती ह।

भति सभी विनबाधाआें एव कठिनाइयों से बचाने के लिए पया ह। भ ाद की यह अगाध भ ही थी, जो उसे हर विपरीतताआें एव षडयों से बचाए रखती ह। भ के लिए अपनी भ की कसाटी इहीं कठिनाइयों से तोली जाती ह। दुख न हो, समयाए न आए, झझावात न उठें तो पता कसे चलेगा कि हममें उससे जूझने की सामय ह या नहीं? भ एव ज्ञा की परीक्षा इसी दारान होती ह।

दुख इसान को बहुत कुछ देने के लिए आता ह, यदि उसे विधेयामक ढग से वीकार लिया जाए तो। अयथा दुख के भार से जीवन अस हो जाता ह। दुख देवों का धन ह। उस धन से इसान अयत मजबूत एव सुदढ होता ह। अत इस धन को चलने का अवसर अवय आना चाहिए। सुख में यह बात नहीं ह। दुख की तपनभी में इसान ऐसे निकलता ह जसे सामाय लोहे से फालाद निकलता ह। फालाद बनने के लिए दुख का वरण तो करना ही पडेगा।

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