श्री कृष्ण पुर्नब्रह्मा बने भगवान है
भगवान श्री कृष्ण को नारायण ऋषि का अवतार कहा गया है । नरनारायण ऋषियों ने धम के दय आर दक्षकया मूति के गभ से उप होकर महान तप किया था। कामदेव अपनी सारी सेना समेत बडी चो करके भी इनके वत का भ नहीं कर सका (भागवत २।७।८) ये दोनों भगवान श्रीविणु के अवतार थे।
देवीभागवत में इन दोनों को हरि का अश (हरेरशा) कहा गया ह (दे भा ४।५ ।१५) आर भागवत में कहा गया ह कि भगवान ने चाथी बार धम की कला से नरनारायण ऋषि के प में आविभूत होकर घोर तप किया था। भागवत आर देवीभागवत में इनकी कथा का वितार है ।
महाभारत आर भागवत में भगवान श्रीकण आर अजुन को कइ जगह नरनारायण का अवतार बतलाया गया ह (वनपव ४०। १२, श्रीमागवत आदि)।
दूसरे माण इस बात के भी मिलते ह कि वे क्षीरसागरनिवासी भगवान विणु के अवतार ह। कारागार में जब भगवान कट होते है , तब शख चक गदापधारी श्रीविणुप से ही पहले कट होते ह तथा भागवत में गोपियों के स में तथा अय थलों में उहें ‘लमीसेवितचरण’ कहा गया ह, जिससे श्रीविणु का बोध होता है । भीमपव में बाजी की वाय है
हे देवतागणो ! सारे जगत का भु म इनका ये पु ह, अतएव
वासुदेवोऽचनीयो व सवलोकमहेवर।।
तथा मनुयोंऽयमिति कदाचित सुरकामा।
नावज्ञेयो महावीय शङखचकगदाधर।।
(महा भीम६६।१३१४)
‘सपूण लोकों के महेवर इन वासुदेव की पूजा करनी चाहिये। हे श्रे देवताओ! साधारण मनुय समझकर इनकी कभी अवज्ञा न करना। कारण, ये शख चक गदाधारी महावीय (विणु) भगवान ह।’ जयविजय की कथा से भी उनका विणुअवतार होना सि ह। इस विषय के आर भी अनेक माण ह।
तीसरे इस बात के भी अनेक माण मिलते ह कि भगवान श्रीकण साक्षात परब पुषाेाम सदािनदघन थे। भगवान ने गीता आर अनुगीता में वय प शदों में अनेक बार ऐसा कहा ह
अह सवय भवो मा सव वतते ।। (गीता १०।८)
मा परतर नायत किचिंदति धनजय।
मयि सवमिद ाेत सूे मणिगणा इव।। (गीता ७।७)
सवलोकमहेवरम।। (गीता ४।२९)
अथवा बहनतेन किं ज्ञातेन तवाजुन।
वियाहमिद कमेकाशेन थितो जगत ।। (गीता १०। ४२)
यो मामेवसमूढो जानाति पुषाेामम।
स सवविजति मा सवभावेन भारत।। (गीता १५।१९)
बणो हि तािहममतयाययय च ।
शावतय च धमय सुखयकातिकय च ।। (गीता १४। २७)
गीता में ऐसे लोक बहत ह, उदाहरणाथ थोडेसे लिखे ह। इनके सिवा महाभारत में पितामह भीम, सजय, भगवान यास एव नारद के तथा श्रीमागवत में नारद, बा, इ श्रीगोपीजन, ऋषिगण आदि के ऐसे अनेक वाय ह, जिनसे यह सि होता ह कि श्रीकण पूव परापर सनातन ब ह। अगपूजा के समय भीमजी कहते ह
कण एव हि लोकानामुपारपि चायय।
कणय हि कते विवमिद भूत चराचरम।।
एष कतिरया कता चव सनातन।
पर सवभूतेयतमात पूयतमोऽयुत।।
(महासभा३८।२३२४)
‘श्रीकण ही लोकों के अविनाशी उपा थान ह, इस चराचर विव की उपा इहीं के लिये हइ ह। ये ही अय कति आर सनातन कता ह, ये ही अयुत सवभूतों से श्रेतम आर पूयतम ह।’ जो इवरों के इवर हाेेते ह, वे ही महेवर या परब कहलाते ह
तमीराणा परम महेवरम।
(वेतातर उ६।७)
मनुयप असुरों के अयाचारों आर पापों के भार से घबराकर पवी देवी गाका प धारण कर बाजी के साथ जगाथ भगवान विणु के समीप क्षीरसागर में जाती ह। (भगवान विणु य पवी के अधीर ह, पालनकता ह। इसीसे पवी उहीं के पास गयी।) तब भगवान कहते ह, ‘मुझे पवी के दुखों का पता ह, इवरों के इवर कालश को साथ लेकर पवी का भार हरण करने के लिये पवी पर विचरण करेंगे। देवगण उनके आविभाव से पहले ही वहा जाकर यदुवश में जम गहण करें।’
वसुदेवगहे साक्षागवान पुष पर।
जनियते तयािथ सभवतु सुरयि।।
‘साक्षात परम पुष भगवान वसुदेव के घर में अवतीण होंगे, अत देवानागण उनकी सेवा के लिये वहा जाकर जम गहण करें।’ फिर कहा कि ‘वासुदेव के कलावप सहमुख अनतदेव श्रीहरि के यिसाधन के लिये पहले जाकर अवतीण होंगे आर भगवती विवमोहिनी माया भी भु की आज्ञा से उनके काय के लिये अवतार धारण करेंगी।’ इससे भी यह सि होता ह, भगवान श्रीकण पूण ब थे।
