न कल, न पल की चिंता केवल हरिचिंतन करिये
चिंता चिता के समान है। चिंता तो मुर्दे को जलाती है, लेकिन चिंता जिंदा इसान को जलाती है। यह ऐसी दीमक है जो एक बार लग जाए तो य को चाटकर ही छोडती है। चिंता य की मानसिकता पर बुरा भाव डालती ह, मन की पविता समा हो जाती है, अपविता आ जाती है। चिंता मनुय के शरीर को खा जाती है, शारीरिक प से य रोगी हो जाता है, आयु कम हो जाती है, जीवन में अशाति आ जाती ह, विवास में कमी आ जाती है आर मात का भय अदर समा जाता है। चिंता परमेवर से दूर करती है, य को घेरे रहती है। चिंता आर अधिक चिंता की जननी ह, इसलिए चिंता करके समया का समाधान नहीं खोज सकते। चिंता का बुरादा सब जगह बिछा है, इसको यू ही कहीं छोड नहीं सकते।
एक बार एक राजा अपने धन के बारे में पूछ रहे थे कि मेरे कोष में कितना धन है। उनका कोषायक्ष बता रहा था कि महाराज गिनती चल रही ह, अभी पूरा पता नहीं चला पा रहा ह कि आपके कोष में कितना धन है इतनी देर में एक योतिषी आ गए, कहने लगे ‘‘ राजा साहब म आपको आपका भविय बताऊ।’’
राजा ने कहा कि अभी तो यह बताओ कि हमारा धन कितना है? योतिषी ने कहा इसको बताने वाले ताेे आपके मी ह, गिन कर बता देंगे। म तो यह बताने आया ह कि आपके पास इतना धन ह कि सात पीढिया भी बठकर खाए तब भी आपका धन चलता जाएगा। राजा उदास हो गया। वह सोचता था कि उसके पास बहत धन ह। जब सात पीढियों तक ही धन ह तो आठवीं पीढी का या होगा? राजा बडा दुखी हआ कि सात पीढी के बाद तो वह कगाल हो जाएगा। किसी का धन दस साल, किसी का तीस साल चलता ह, उसके बाद वे गरीब हो जाते ह, इसी तरह सात पीढी के बाद वह कगाल हो जाएगा, उससे यादा गरीब कान होगा?
इसान को चिंता किसी भी प मे आ जाती ह। किसी आदमी को तो बिना बात के ही चिंता हो जाती है। आप एक बार उदास रहने की आदत बना लीजिए तो एक थिति ऐसी आ जाएगी कि उदास रहने आर चितिंत रहने के कारण घोर निराशा आने लग जाएगी, जिसे आज की भाषा में डेिशन कहते ह। उसका कोइ इलाज नहीं, दवा दीजिए थोडी देर के लिए आराम आ जाएगा,दय को श मिलेगी लेकिन डोज (माा) बढाते जाएगे, थिति बिगडती जाएगी, लेकिन बीमारी जाएगी नहीं। बीमारी वही रहती ह, सिफ थोडी देर के लिए दबी रहती है।
योंकि हम लोग इस दुनिया में जीते जी वे सब चीजें तो इकटठी कर रहे ह जिनसे सुख आर आराम मिलता है लेकिन भोगने वाले शरीर को बीमार कर रहे ह। जिस मन से हमें ससार का आनद लेना ह, उस मन काेे हमने बीमार कर दिया। जिस बु के ारा हमें ठीक से सोचना चाहिए , उसे भी हमने खराब कर लिया। जिस आमा में परमामा का दशन करना था, उस आमा को कलुषित कर लिया। फिर यह सगह किसके लिए है?
चितित राजा यही सोचता है कि सात पीढी के बाद या होगा? उसे आर धन कमाना चाहिए, राजपाट बढाना चाहिए आर परिश्रम करना चाहिए। आर टस लगाने चाहिए। राजा की नींद चली गइ। एक दिन मी ने राजा से पूछा, ‘‘आप इतनेे चितित यों है? कपया बताइए, आपको या रोग है?’’ राजा ने कहा, ‘जब से योतिषी मिला ह हमारा चन चला गया है।’
राजा को योतिषी ने जो कह दिया, राजा तो चितित हो गया। मी से बोला जिस दिन से योतिषी गए है, उस दिन से हमारी नींद चली गइ है। सात पीढियों के बाद हमारा या होगा, हमें बडी चिंता है। मी ने कहा, ‘‘किसी महामा को, ऋषि मुनि को बुलाते है?। वह इलाज बताएगे। मी एक तपवी साधक की तपोभूमि में जाकर उनसे कहने लगा, ‘हमारे राजा को बडा रोग लगा हआ है। राजा खुश ह तो जा खुश ह। राजा दुखी ह तो जा भी दुखी हो जाएगी, इसलिए सबका भला करने चलिए।’’
उहोंने देखा आर कहा कि राजन तुहें कोइ रोग तो है नहीं, हा कोइ मत माला, मत मलग इसान मिल जाए तो उसका अगोछा लेकर सिर पर बाध लो इलाज हो जाएगा। मी कहने लगे,‘‘हम ढूढेंगे कहीं न कहीं तो मत माला, मत मलग इसान मिल जाएगा। पर उसकी पहचान या होगी?
तपवी बोले, ‘‘वह आदमी मत रहेगा, गाएगा, गनगुनायेगा, उसे कोइ चिंता नहीं होगी। ऐसे आदमी का कपडा ले आना आर इनके सिर पर बाध देना फिर दद, चिंता दूर हो जाएगी।
मी ने सारी दुनिया में ढूढा। बहत कोशिश करने के बाद एक जगल में एक आदमी दिखाइ दिया जो सच में वसा ही था जसा तपवी ने बताया था। बठा हआ गीत गा रहा था। मी उसके पास गया पूछा तुम यहा यों बठे हो, कुछ काम धाम नहीं करना। वह बोला जो कर रहा है यह भी तो काम है। शरीर चलाने को भगवान दे देता है, गाने के लिए उसने जबान दी है। उसका नाम गा रहे है बठे हए। फिर आखों से अपने भगवान का दय देखते है, इस सुदर कति में कितना आनद आ रहा है? किसी को दुखी देखते ह तो हम उसकी सहायता में लग जाते ह। उसका दुख हमारा दुख हो जाता है। थोडी देर के लिए हम दुखी होते है। जसे ही उसका दुख दूर करते ह, वह खुश हो जाता ह हम भी खुश हो जाते है। फिर सता आर मती आ जाती ह। मी ने पहचाना कि यह य वही ह जिसको हम ढूढ रहे है। मी राजा को लेकर आया कि राजा साहब भी उसे देख लें। यह वही ह जिसको हम ढूढ रहे थे, वह हमें मिल गया।राजा ने देखा, ऐसा अनुभव हआ जसे कोइ राजाधिराज पेड पर बठा हआ ह। असली राजा तो यह ह जिसे न कोइ चिंता न कोइ परेशानी। मत रहता है, अपना काय भी करता ह , दुखियों की सहायता भी करता ह, गर्मी , सदी इसे सताती नहीं। सुखदुख इसको बाधा नहीं पहचाते। अपनी मती में रहता ह। राजा ने कहा, ‘‘देखो कहने के लिए हम राजा ह किंतु वातव में राजा तो आप ह। कपा करके आप अपना अगोछा, वह कपडा हमें दे दो जो आप अपने लिए रखते हो, हम उस कपडे को सिर पर बाध लेंगे, हमारी चिंता दूर हो जाएगी।’’ वह जोर से हसा, पेड पर बठा हआ था, बोला, ‘हमारे पास तो कपडा ह ही नहीं। हम कहा से दें?’ राजा बोले, ‘‘कपडा नहीं ह।’’ उसने उार दिया ‘‘कपडा होता तो उसे सभालने की चिंता भी हो जाती कि कोइ उसे उठा कर ले न जाए, चिंता रहती।’’ राजा ने पूछा, ‘‘तुहारे पास कुछ भी नहीं ह?’’ उसने उार दिया, ‘‘जो कुछ ह, अदर ही अदर ही ह बाहर कुछ भी नहीं ह।’’ न हमें कल की चिंता ह न इस पल की चिंता ह, इसलिए हमारे जीवन का हर क्षण मती में बीत रहा है। आज के लिए नहीं ह, तो तुहे कोइ चिंता नहीं ह? राजा ने पूछा। उसने कहा, आज का काम अछे ढग से चल रहा ह तो कल भी अछेे ढग से चलेगा जिसने निभाया है वह आगे भी निभाएगा। जिसने आज तक सभाला है, आगे भी सभालेगा। जिसने आज तक मेरी लाज रखी ह, आगे भी वह मेरी लाज रखेगा। म उस पर भरोसा यों न कर लू ? राजा ने मी से कहा कि अब उसे अगोछे की जरत नहीं ह। अब महल में या ह? कोष में या ह? इसकी या चिंता?
वातव में दालत तो अपने अदर ह, महल भी अपने अदर ह। इसान बाहर से राजा नहीं बनता, अदर से बनता है। आज से हम से राजा बनेंगे, अब तक हम झूठे राजा बने हए थे। यह जीने का, सुखी बनने का अछा ढग ह जिसे सीखना चाहिए आर जीवन में अपनाने का यन करना चाहिए।
जब कुछ हआ तो ‘म’ आ गइ। ससार की चीजें जब आ गइ तो ‘म’ आ गइ। जब ‘म’ आ गइ तो भगवान नहीं रहा। भगवान ने कह दिया, तू अपनी ‘म ’ के सहारे रह, अब म तेरा सहारा बनकर या कगा? जब ‘म’ हटा दी तब वह साथ आ गया। तू म भूल गया आर मेरा हो गया। भगवान ने कहा, ‘‘मेरा सहारा तेरेे साथ है। जब तूने ‘म’ का आर ससार के साधनाेें का सहारा लिया तो मने अपना हाथ खींच लिया।’’ यह जिंदगी की साइ है, सरल हो जाइए। मत हो जाइए, शात हो जाइए आर बनावट से बचिए।
