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भगवान और भोग

Swatantra Vaartha  Wed, 11 Aug 2010, IST

भगवान और भोग

मनुय का सहज वाभाविक लय हपरम शाति आर आयतिक सुख की । वह चाहे इस लय को य न कर सके, पर उसका पयेक विचार आर यन होता है इसी के लिये। यह होते हए भी वह परम शाति के थान पर दाण अशाति आर आयतिक सुख के थान पर पाता हघोर दुख। इसका कारण यही कि वह शाति आर सुख की खोज करता हउहें पाना चाहता ह अनिय, अपूण, परिवतनशील, अप आर तिक्षण विनाश की ओर जानेवाले ाकत पदाथा] आर परिथितियों से।

जो वतु अपूण, अप आर अनिय होती है, वह कदापि शाति नहीं दे सकती। चाि सदा ही पूणता की कामना से आर विनाश के भय सेे याकुल तथा अशात रहता है आर जहा अशाति है, वहा सुख कहा? ‘अशातय कुत सुखम।’

इस अशात चाि को लेकर वह सुख की कामना से बारबार ाकत जगत में ही सुख पाने का यास करता हपरिणामवप उसके दुख विभि कारों आर विविध पों में बढते चले जाते है । तणा उाराेार बढती चली जाती है। कामना आर तणा से विवेक न हो जाता ह आर वह फिर बु भ होकर ऐसेऐसे कम करने लगता है, जिनका परिणाम अधिकसेअधिक अशाति आर अधिकअधिक दुख के प में कट होता है। ाकत ऐवय अधिकार आदि भोग अतर में निरतर अशाति की भीषण आग जलाये रखते ह न मिलने पर भी बहत मिलने पर भी। अतएव शाति सुख के लिये मनुय जब तक भोगसुख की भाति से छूटकर निय, पूण, असीम, सवथा मधुमय भगवान की खोज नहीं करता, तब तक उसकी अशाति आर दुख का अवसान कभी नहीं होता।

ाकत जगत के जितने भी योग ह, वे वातव में आपातमधुर या पयोमुख विषकुभ (जहर से भरे दुध मुहे घडे) के सश ह, अथवा भीतर के निरतर बढते हए भयानक घाव को छिपाने वाले बाहरी चमकदार पर्दे के समान है। अतएव इनका मोह छोडो आर निय सय भगवान को ा करने का यास करो। भगवान निय अनत परम शाति आर अनत असीम आयतिक सुख के परिमाणरहित समु है। उनको ा करने की इछा के साथ ही शातिसुख आने लगते है।

भगवान सदा तुहारे अपने ह, भोग कदापि अपने नहीं है। भगवान सदा तुहारे साथ है, भोग कभी निय के साथी नहीं ह। भगवान निय पूण तथा सुखशातिवप है, भोग अनिय, अपूण तथा दुख अशातिमय ह। भगवान की ा में कम की अपेक्षा नहीं है, भोग की ा कमसापेक्ष ह। भगवान की ा के यास से पाप कटते है आर नये पाप बनते नहीं, भोगा के यास में पाप सुरक्षित रहते ह आर नयेनये पाप बढते रहते है।

वातव में बुमािन, साभायशाली पुूयजीवन और सुखी पुष वही है, जो भोगों का मोह यागकर भगवान को ही जीवन का परम लय मानकर उहीं का भजन करता है । जीवन के दिन बीते जा रहे है, मयु समीप आ रही है। अतएव अशाति तथा दुख के दलदल से निकलकर निय सय भगवान के भजन में लग जाओ आर मानव जीवन को साथक करो।


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