परमात्मा के मार्ग का सबसे बडा अवरोधक तव है अहकार
बहत समय के बाद नारद फिर उसी राते से लाटे, तब उस साधु ने आतुरता से पूछा, ‘बताइये, भगवान ने मेरे लिए या कहा ?’ नारदजी ने कहा , ‘भगवान ने कहा ह कि तुहें चार जम के बाद दशन देंगे। हे! चार जम ! इतना तप करने के बाद भी चार जम आर? कितने निदयी है भगवान !’ इस तरह वह साधु बडबडाने लगा, आर उसके जम का चक बढता गया।
फिर नारद दूसरे भ के पास आए। भ में मत उस भ को नारद ने कहा कि, तुहें पता है कितने जमों के बाद भगवान तुहें दशन देंगे? उसनेे कहा,‘मुझे या पता, भगवान को पता होगा। लेकिन आपको भगवान ने बताया हो तो कहो।’ नारद बोले कि भगवान ने कहा ह कि ‘यह जो बरगद का पेड ह उसके ऊपर जितने पो है, उतने जमों के बाद भगवान तुहें दशन देंगे।’ ‘हे। मुझे भगवान के दशन होंगे! ऐसा उहोंने वय कहा।’ आर वह तो आनद से नाचने लगा। भगवान के दशन होंगे, उसके लिए तो यही अपार आनद की बात थी। कितने जमों के बाद होंगे, इसकी उसे कोइ चिता नहीं थी। अपार आनद में वह कहने लगा कि भगवान की कणा असीम है, मेरे जसे तुछ मनुय को भी कपा करके दशन देंगे। वह इतना आनद में डूब गया कि उसकेे जमों का चक घूम गया। देखतेदेखते उस बरगद के वक्ष के सब पो गिर गए। आर उसके सब जम कट गए, आर उसे उसी क्षण भगवान का साक्षाकार हो गया।
इस ात कथा से यह बोध होता है कि परमामा का मिलन हमारी आतरिक थिति पर निभर करता है। अनेक जम घट भी सकते ह, बढ भी सकते ह
परमामा के माग पर अवरोधक तव:
सबसे पहले तो यह अनुसधान सही दिशा में होना चाहिए। पर अधिकाश लोग इस माग को बाहर खोजते है। अथात अनुसधान ही गलत दिशा में होता ह। लेकिन यदि भावना शु आर सी हो आर सदगु का साथ हो तो गलत दिशा भी किसी न किसी तरह सही दिशा में मुड जाएगी। अगर सावधानी रखते हए पहले से ही ठीक दिशा में आगे बढना शु करें तो गलत व टेढेमेढे मागा] की भूलभुलया में समय आर श यथ जाने से बच जाती ह। यह माग अतर में ही ह। अतर में ठीक दिशा में आगे बढना ह। बा साधन शुआत में मन को तयार करने में मदद करते ह , पर राता तो अदर से ही पाना ह आर य को वय ही इस राते पर चलना है।
इस माग में सबसे बडा अवरोधक तव कोइ है तो वह ह अहकार। अहकार अथात भि होने की भावना, उ या श्रे होने का भाव। अहकारयु मन बाहर ही देखता है, भातिक पदाथा] मेे ही रमता ह। इसमें मेरातेरा, इयोष, वरवमनय आदि सब जहर भरा होता ह। अगर कोइ इसे समाग को बताने का यन करता है तो यह सब जहर शकाकुशका के ऐसे भवर में फसा देते ह कि य को यही लगता ह कि दुनिया की सब विलासिता को छोडकर कहा हवा में किले बनाना? वह अनुसधान करना ही छोड देता ह। वय ही मन में सोचने लगता ह कि साधनायान सब बेकार की बात ह। भगवान कहीं दिखाइ देता ह या? अहकार नयेनये वाग रचकर अयाम के माग में आता रहता ह। जब तक अहकार ह तब तक परमामा के माग पर आगे बढना असभव ही है। परमामा माग पर चलने की शयता अहकार के विलय में ही ह, आर अहकार को ыढ सकप श , भ आर सपूण शरणागति से ही गलाया जा सकता है।
सासारिक वासनाआें का जाल भी इस माग का एक बडा अवरोधक ह। परतु जिसका येय निचित हो, सासारिक वासनाआें में कोइ रस नहीं मालूम पडता हो, जिहें जममरण के चक से छुटकारा चाहिए हो, जिहें परमामा में ही असली सुख मालूम पडता हो, उनके राते में कसे भी लोभन आए उन पर कोइ भाव नहीं होता ह। एक बार एक राजा ने घोषणा करवायी कि अमुक दिन सायकाल तक जो मुझे मिलने आयेगा उसे म अपने राय का एक हिसा भेंट दूगा। राजा के धानमी ने कहा, ‘महाराज! ऐसे तो आपको बहत लोग मिलने आयेंगे आर सभी को उनका हिसा देना पडेगा, ऐसेे तो राय के टुकडे टुकडे हो जाएगे। तब राजा ने कहा,‘‘आप चिंता मत करो, देखो या होता है?आर निचित दिन जब सबको मिलना था उस दिन राजा के महल के बगीचे में एक विशाल रागरग का आयोजन करवाया। उसमें नाच गाना हो रहा था, मोहक सुदरिया थी, शराब की महफिल थी, खानेपीने को एक से एक वादि पदाथ थे, तरहतरह के खेलतमाशे थे। देखकर आदमी चकरा जाए, ऐसी अनुपम आकषक चीजें थी।
राजा को मिलने आने वाले कितने ही नाचगाने में अटक गए, कितने ही सुरासुदरी में मत हो गए, कितने ही आचयजनक खेलों में मशगूल हो गए, कितने ही खानेपीने के आनद में डूब गए। इसे तरह समय बीतने लगा।
