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गीता में परमात्मा प्राप्ति के सन्देश

Swatantra Vaartha  Wed, 11 Aug 2010, IST

गीता में परमात्मा प्राप्ति के सन्देश

मनुय को ऐसे चिंतन आर ऐसे विचार से अपने को दूर रखना चाहिए, जिससे उसकी अपनी आथा में भटकाव हो जाए। मनुय इस दुनिया में उस परमामा को ा करने के लिए आया है, जिसे ा कर लेने के बाद फिर कुछ ा करने की इछा नहीं रह जाती।

अयय परमामा को ा करने के लिए मनुय के भीतर कानकान से गुण होने चाहिए उसी को भगवान श्रीकण ने गीता सदेश के मायम से मानव मा के लिए दे दिया है। उस अयय पद को ज्ञानी य ा करता है। जो मूढ य होता है, वह ससार में भटक जाता ह। आर उसी भटके हए माग को सय मान लेता है। भटकन की यहीं तो कठिनाइ ह। वतुत आदमी पहले भटकन में, फिर अटकन में, उसके बाद लटकन में, फिर फटकन इन चार वतुआें में फस जाता है। आप विचार कर देखें कि कोइ य चिंतन के ारा, किसी को भावित करने का यन करने लगे तो अपने गथों के ति भी कइ बार श्रा का अभाव हो जाता है।

भगवान ने गीता में कहा कि बुमािन मनुय को कमा] में आस रखने वाले अज्ञानियों की बु में भम अथात कमा] में अश्रा उप नहीं करनी चाहिए। श्रालुआें में बुभेिद उप नहीं करना चाहिएलेकिन समाज में बहत बार ऐसे बुमािन लोग भी आ जाते है, जो परपरा का निरतर विरोध करते ह। सनातन से माय परपराआें के ऊपर, अपनी बु से हार करते ह। उनमें कुछ श्रे हो, उसे अवय लेना चाहिए, किंतु अपनी आथा में कहीं भटकाव हो जाए, ऐसे चिंतन, ऐसे वायाय, ऐसे विचार से अपने को दूर रखने का यन करना चाहिए।

मनुय ससार में आयाअयय पद अथात उस परमामा को ा करने के लिएजिसे ा कर लेनेे के बाद, फिर कुछ ा करने की इछा नहीं रहती। जीवन का सबसे बडा लाभ यही ह। इसे ा कर मनुय, जीवन के बडे से बडे सकट में भी विचलित नहीं होताा।

हम ससार में रहते हबडे यवथित, लेकिन छोटीमोटी घटनाए विचलित कर देती ह। भगवतगीता का सदेशमानव के जीवन में से, विचलन का अभाव कराने का सदेश ह। वह अविचल भाव से, जिसे गीता ने थितज्ञ कहा हससार की अनुकूूलता में, तिकूलता में, यिअयि में, सयोग में, वियोग में, मानअपमान मेअपने जीवन को चलाने का यन करें, यह श्रीमदभगवतगीता का दशन ह। उस अयय पद को ा करने के लिए , मनुय को कुछ छोडना पडेगा। बिना कुछ छोडे ा करना मुकिल ह। किसी य के मन में इछा हो कि म छत पर, अगासी, पर जाऊ, तो उसे किसी न किसी सीढी का योग करना पडता ह। जब वह सोपानों पर चलता ह, अगासी उसने देखी नहीं ह। दिखाइ नहीं पडती लेकिन सीढिया दिख रही ह।

किसी य ने कहा‘छत पर वदूय मणि हबहत चमक रही ह। वहा पहचने के बाद बहत ा होगा, जो कभी देखा नहीं होगा, सोचा नहीं होगा। लेकिन उस उ शिखर पर ले जाने वाली सीढियों में से थम सीढी चादी से मढी हइ थी। जब वह चढने लगा, तो विचार करने लगा कि ऊपर किसने देखा ह, यहा चादी तो लगी ह, उखाडकर ले जा सकते ह। वह कुछ देर तक बठा रहा कि यहा कोइ न हो, तो इसमें से ले जा सकते है।

दूसरे दिन, दूसरा याी आया। वह दूसरे सोपान पर चढा, तो देखा कि वण लगा हआ है। उस पर उसका आकषण जग गया। थम याी पहले, थोडे रजत के आकषण में आकषित होकर लाट गया। दशन करना था वदूय मणि का पहले भटका, फिर अटका, इसके बाद लग गया एक झटका आर घूमता ही रहा भटकाव में। कुछ हाथ लगा नहीं। जीवन भम में ही चला गया।

यही तो मनुय की कठिनाइ है कि जहा श्रा होती है, वहा भम हो जाता है आर जहा भम होना चाहिए, वहा श्रा हो जाती है। जगत में निवास करतेकरते जगत के मियाव का बोध होना चाहिए। योंकि अनेक ऐसे लोग हो गए, जिहें जगत के पदाथो को छोडते देखा ह। इस जगत में से उनका थान भी देेखा है।

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