अवेर्दका मार्ग है भक्तिमार्ग
‘सत’ भगवान की पराकति का वप है , जो सारे विवबाड में विमान है । सत परा है आर असत अपरा है । अपरा भगवान की जड कति है । जिससे सपूण जगत को धारण किया जाता है , वह भु की चेतन कतिपराकति हसत है , अथात हम भातिकवादजडता में लि होने वाले साधनों से भु के पराप चतय वप, आयामिकता की ओर चलें। गीता में भगवान कहते ह कि मुझसे भि दूसरा कोइ भी परम कारण नहीं है ।
यों ? योंकि यह सारा जगत सू में सू की मणियों के समान मुझमें ही गुथा हआ ह। बडा ही गूढ ह यह दशन ।(मा परतर नायकि#ादति धनजय। मयि सवमिद मणिगणा इव।)।
जब सब कुछ भगवान ही ह, तो फिर भगवान के सिवाय आर कुछ भी नहीं ह। परिवतनशील भी वे आर अपरिवतनशील भी वे। नाशवान भी वे, अविनाशी भी वे। सदसाहम। सत आर असत भी म ही ह की घोषणा के पीछे यही विवास छिपा पडा ह। इसमें विवेक से भी परे विवास की बात ह। जहा विवास ह, वहा सतअसत एक ही ह। सारी परमामा की लीला ह। मयु भी वे, अमत भी वे (अमतम च मयु च) यह भी एक सय ह आर यह भी विवास का ही विषय ह।
देखा जाए तो भगवान सत ही सत ह, अमत ही अमत ह यदि हम उनके यि ज्ञानी भ ह, उनके अनुप वय को बदलने के लिए तयार ह, उनके गुणों को, उनके बताए आदशा] को जीवन में उतारने के लिए सतत कतसकपित ह। भगवान भयाेिग की बात कर रहे ह एव ‘वासुदेव सवम इति’ तय को दोहरा रहे ह। यह हम पर ह कि हम उन पर कितना विवास थिर कर पाते ह। भमािग अۡत का माग हवेदात का माग है ।
दो साा ह ही नहीं। श्रीमदभावगत में भी भगवान कहते ह कि सत असत आर उससे परे जो कुछ भी हो सकता ह, वह म ही ह। हम भी एक ही साा को मानें। वामी रामसुखदास जी कहते ह कि दूसरी को मानने से मोह होता ह। रागेष भी पदा होता ह। असत से ेष, सत से राग। हम सदसाहम का मूल मम समझें, परमामा को यथाथ में वीकार करें।
यहा यह समझना जरी ह कि बिना ताप के हमारा जीवन नहीं ह। इसका महव उारी धुव के समीप रहने वालों से पहाडों पर घाटी में रहने वालों से पूछना चाहिए। भगवान सूयप में तपते ह तो धरती की सारी अशुयाेिं को तो मिटा ही देते ह, हमें जीवन देते ह, ाण देते ह आर सारी जडता को, आलय माद को दूर कर देते ह। ठडक की ठिठुरन में सूय का ताप जो उणता देता ह, शरीर को एक विलक्षण अनुभूति देता ह, यह वही समझ सकता ह, जिसने सूय से साक्षाकार किया हो। आयामिक शदावली में सूय का यान सवश्रे यान ह। यदि हम निय नियमित प से उगते हए सूय का , उसके काश का अपने रामरोम, कण कण, अणुअणु में पवि होने एव सारी काया, मन, अत करण के योतिमय होने का यान करें तो हमारी आमिक गति सुनिचित होगी। चाहे हम सूय को देख पा रहे हों या नहीं, पर बामुहत में किया गये यान की जबरदत भावोपादकता देखी जा सकती ह। यह यान सवश्रे ह, योंकि सूयप में साक्षात परमेवरवासुदेव हमारे भीतर वि हो रहे ह। उनकी किरणें हमारे अतर्लोक को दिय भामय बना रही ।
सूय ‘सु’ एव ‘इर’ इन दोनों शदों से मिलकर बना ह। सुदर ेरणाए देने के कारण यह शद ह। सवेरेसवेरे ताजगी, पविता, कषायकमषों से मु एव परमेवर के अपने अदर समाए होने की अनुभूति हमें दिन भर सजग ाणवान, ओजवान, सवितावान बनाए रखती ह। सविता का पसविता सव करने के कारण, बाड को जम देकर हम सबको, जड चेतन को पोषण देने के कारण यह विशेष नाम ह। ात काल का सूय ही सवितामय प ह। सविता के तीन वप ह। एक तो वह ह, जो यप हवज्ञानिक से यह हाइडोजन हीलियम की अत कियाआें की तिकियाआें के कारण जलता हआ आग का गोला ह। यह आधिभातिक प ह, जो हमें विटामिन ‘डी’ देता ह,फूल पायों में लोरोफिल का उपादन कर हमें पोषण देता ह, सारे जडचेतन जगत में ाण उसके इसी भाव के कारण ह। दूसरा प आदिदविक कहलाता ह।
सूय का यह प य से हजारों गुना भावी ह। यह विचारों का नियक ह, भावों का ेरक तथा गहों का अधिपति ह, जातक की आमा ह। योतिविज्ञान के सारे योग सूय के इसी प को लेकर चलते ह। तीसरा प आयामिक नाम से ह। यह विराट पुष की योति ह, अति मानसिक योति ह। यही वासुदेवश्रीकण परमब परमेवर काविराट पुष का वातविक वप ह। विराट पुष के प में इसकी उपासना हेतु छादोयोपनिषद एव ऋवेद में अगणित सू ह। सामूहिक मन के परिशोधन हेतु सूय का यान व गायी की उपासना एक सवश्रेठ उपचार ।
आज समूह मन को सुसकत बनाना ह तो हमें सूय के इसी प की उपासना , यानधारणा का चलन बढाना होगा। इसमें महती सामय छिपी पडी ह। कामविकार, मनोरोग, दुविचार सूय की श के वेश मा की यानधारणा से दूर हो जाते ह यह एक सियोग ह। जब भगवान कहते ह कि म सूयप में तपता ह तो वतुत उनकी कपा कणा हम पर बरसती ह। अलगअलग ऋतुआें में उसका वप अलग होता ह। ऋतुचया का पालन करते हए हम सविता देवता के तेज के अवतरण की भावना करके तो देखें। जब भगवान श्रीराम ‘आदिय दय’ का रहय जानकर रावण वध कर सकते ह, पाडव आदि श्रीकण की ेरणा से ऋषि धाय से सूर्योपासना की दीक्षा लेकर न केवल तिकूलताआें का सामना करते ह, वरन कारवों पर, अनीति पर विजय भी पा करते ह तो हम यों नहीं कर सकते!
वय काशित एकमेव (एक सत) मा सूय ही ह। ऋषियों ने कहातद एक, तत सय। वेदों के अनुसार सूय सय के अधिपति, आलोक दाता , रचियता,सविता, सविता ह, पूषा (पुदािता) ह तथा अतेरणा की फुरणा देने वाले ह। सूय को वि, बाण श्रे, दीकािरी , रनसमान भाववाला, विशाल, ज्ञान का अधिपति हमारे वेद थापित करते ह। ऋवेद कहता ह मही देवय सवितु परुिति महान ह सविता देवता की तुति। आगे ऋषिगण अपनी ऋचाआें में कहते ह कि जो रचयिता ह, सय के प में तुय ह, मानव का पोषक ह, मनुय को अह भाव से निकाल कर विवयापी बना देता ह, सीमित से असीम कर देता ह, वह सविता ह।
सूय के वण, मि, भग एव अयमा ये चार नाम भी दिए गए ह। सूय से मधु बरसता ह, जो हमारे अयन मडल की परतों से छनछनकर हमें गायी म की साधना के मायम से ा होता ।
सूयसाधना को इसीलिए मधुवाि कहा गया ह। ‘षु’ धातु से सविता बना ह। इसका अथ हनिचोडना, क्षरित करना। सारा आयामिक काश सूय के मायम से हम तक क्षरित हो पहचता ह। हम सूय की तुति, उपासना, यान, धारणा ारा इस दियमधु का पान कर आमिक गति के कइ सोपान अनायास ही चढ सकते ह । सूय की किरणों से सोम बरसता ह, यह सय ह । इतना सब इसलिए बताया गया कि भु वय सूयप में ह, हमें ताप के साथ तेजस दे रहे ह। इस प में हम उनकी धारणा करें तो हमारा उार सहज ही हो जाएगा।
सूय के ताप से ही वषा बरसती ह। यदि सूय तपेगा नहीं, गीम के आतप से सही वातावरण नहीं बनेगा तो वषा समय पर नहीं होगी। हो सकता ह, वषा यूनतम हो आर सारी धरती पर ाहािहि मच जाए। सूय के ताप आर वषा का बरसना दोनों ही भु की कियाए एव उनके प भी ।
यह वषा ाण देती ह आर वनपतियोंजीव मा के लिए बरसती ह। इससे सरिताए अभिपूरित हो जाती ह। जीव मनुयमा के लिए जल की पूति उतनी ही जरी ह, जितनी कि वास ाणवायु। एक पकार से भु की कणा ही , कपा ही उनकी इस वषा प में बरसती ह । साथ में पजय भी लाती ह। यह पजय जल नहीं,जल के साथ आने वाला ाण ह, जो अन में सतोगुण को वि करता ह। यह पयजय यज्ञीय जीवनशली अपनाने पर यज्ञादि कार्यो के ारा बरसता ह।
सूय के तपने में असतुलन एव वषा के चक में अनियमितता, अतिव या अनाव, पजय का न बरसना मनुय की पदा की गइ परिथितिया ह, जिहोंने आज की युग विभीषिकाआें को जम दिया ह। भु की, उनके अनुशासन की अवज्ञा का परिणाम कुछ भी अनिकारी हो सकता ह। वे ही अमत हाण सजीवनी दाता ह एव वे ही मयु भी ह, अथात उहें यदि अनुशासित प में जीवन में उतारा न गया तो वे मयु दाता भी ह। वे ही सत भी ह आर असत भी ह। उनकी पराकति के वप से जुडें, उनकी चेतनामय अभिय यह विव ह। इसे आर भी सुदर बनाए, यही हमारा कतय ह।
